झरोखा : फिर आई बहार साहित्य की बगिया में
Then came the garden of literature outside

झरोखा : फिर आई बहार साहित्य की बगिया में

पंकज पटेरिया –
सूबे में दशकों तक काबिज रही हुकूमत और उनकी नौकरशाही से प्रदेश का साहित्य चेहरा लंबे समय तक पीला पीला उदास और बीमार सा लगने लगा था। साहित्य अकादमी जैसी जगहों पर अलग तरह के शासन और प्रशासन का दबदबा था और खूब फल फूल रहा था। भाई भतीजेवाद का कारोबार, पुरस्कार, सम्मान सब पहले से तय होते थे, यहां तक की किन की किताबें छपना है यह भी सुनिश्चित रहता था। वरिष्ठ साहित्यकार जो साहित्य को पूजा, अरदास की तरह साधना रहे थे उनकी कोई पूछ परख नहीं थी। विरोध पक्षपात के स्वर उभरने के पहले ही उनकी भ्रूण हत्या करवा दी जाती थी।
ईश्वर की कृपा जनसेवा और राष्ट्र सेवाभावी लोगो की सक्रियता से परिवर्तन की हवा आई। फिजा बदली और प्रदेश की बागडोर ईमानदार जनता के प्रति प्रतिबद्ध लोगों ने संभाली। उसी के अनुरूप नए शासक प्रशासक ने साहित्य अकादमी जैसे महत्वपूर्ण संस्थान का कार्यभार संभाला और ऐसी ताजी हवा का झोंका आया कि साहित्य की शक्ल सूरत खिलने लगी। प्रदेश के जिलों सहित छोटे-छोटे नगर, कस्बे तक प्रतिभाओं से सीधे जुड़ कर उन्हें मंच देकर प्रकाश में लाने का अहम काम किया जाहिर है। बिना किसी शक के इसका श्रेय संपादक साहित्य सेवी डॉ विनायक दवे को जाता है। पद संभालते ही उन्होंने उपेक्षा के अबूझमाड़ में घुट रहे साहित्यकारों की पूछ परख की और उनसे सीधे भेंटकर उनके गिरे मनोबल को स्नेह संबल दिया। बरसों से प्रकाशन के पुरस्कार की घोषणा की। 4 साल से रुके प्रकाशन और पुरस्कारों को विभिन्न विधाओं के लिए पथ प्रशस्त किया और सीधे-सीधे सभी साहित्यकारों से विभिन्न विधाओं में अपनी प्रकाशित पुस्तक की प्रविष्टि भेजने के लिए आग्रह किया। पहली कृति के प्रकाशन का आमंत्रण भी दिया। नतीजन पतझड़ समाप्त हुआ और बसंत बहार आ गई और आकर्षक बन गई साहित्य की सूरत।


पंकज पटेरिया (Pankaj Pateriya)
वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार
ज्योतिष सलाहकार
9893903003
9340244352

(नोट: झरोखा की इस सीरीज की किसी कड़ी का बगैर संपादक अथवा लेखक की इजाजत के बिना कोई भी उपयोग करना कानूनन दंडनीय है। सर्वाधिकार सुरक्षित हैं।)

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