समीक्षा: खिड़कियों से झांकते अपने-अपने एकांत

समीक्षा: खिड़कियों से झांकते अपने-अपने एकांत

विपिन पवार/ विख्‍यात ब्रिटिश लेखक एवं राजनेता ऑगस्टिन बिरेल ने कहा है कि ‘’बावर्चियों, योद्धाओं और लेखकों का आंकलन इस बात से किया जाना चाहिए कि वे क्‍या प्रभाव उत्‍पन्‍न कर पाते हैं ?’’

इस कथन के आलोक में डॉ. दामोदर खड़से के उपन्‍यास ‘’खिड़कियां’’ के बारे में यह तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह एक महाकाव्‍यात्‍मक उपन्‍यास है, जो पाठक के मन पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ता है। डॉ. खड़से मूलत: कवि है जिसकी झलक उपन्‍यास में यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होती है। खिड़कियां को एक मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक उपन्‍यास कहना समीचीन होगा। जैनेंद्र, इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय, कार्ल गुस्‍टाफ युंग, सिगमंड फ्रायड एवं नार्मन डिक्‍सन के बाद पहली बार मानव मन की परत-दर-परत खोलता एवं उसके भीतरी एकांत से परिचय कराता यह उपन्‍यास अपने समय का महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज है।

हम सबको अपने जीवन में कभी-न-कभी अकेलेपन का सामना करना पड़ता है। कभी हम भीड़ के बीच भी अकेले हो जाते है। ओशो ने कहा है कि ‘’भीड़ में रहकर भी अपने साथ होना बहुत बड़ी कला है।‘’ अकेलेपन एवं एकांत में बड़ा फर्क है। अकेलापन जहां ऊब, पीड़ा, अवसाद, क्षोभ तथा रूग्‍णता को जन्‍म देता है, वहीं एकांत को किस प्रकार जीवन जीने का सहारा बनाया जा सकता है, यह इस उपन्‍यास को पढ़कर जाना जा सकता है। उपन्‍यास के अंत में हमारी यह धारणा पुष्‍ट हो जाती है कि एकांत तो वरदान होता है यदि अकेलेपन को एकांत में बदलने की कला सीख ली जाए।

अकेलेपन के दुख को लेखक सकारात्‍मक ढंग से दूर करना चाहता है –‘’समय दुनिया के हर दुख को सहने और भूलने का सहारा बन जाता है। एक दुख के सामने वह दूसरी चुनौती रख देता है। मनुष्‍य अपने अतीत को ढ़ोकर बहुत आगे नहीं जा सकता। उसे अपने भविष्‍य के लिए नए वर्तमान गढ़ने होते है। दो मित्रों कथानायक अरूण प्रकाश एवं सूर्यकांत के माध्‍यम से कथा आगे बढ़ती है एवं पत्‍नी आस्‍था एवं पुत्री निष्‍ठा के चरित्र चित्रण में हमें डॉ. खड़से की उस उत्‍कृष्‍ट औपन्‍यासिक कला के दर्शन होते हैं, जिसके लिए ‘’बादल राग कार’’ डॉ. खड़से विख्‍यात है। प्रारंभिक बीस पृष्‍ठों में एक आम भारतीय उच्‍च मध्‍यवर्गीय दंपत्ति की सुगठित एवं रंजक कथा में हम डूब जाते हैं और हमें आघात तब लगता है जब उपन्‍यास के पूर्वार्ध में ही कथानायक अरूण प्रकाश विधुर होकर अपने अकेलेपन से जूझने लगते है। उपन्‍यास में आशा, निष्‍ठा और वैभव, ख्‍याति, सुचित्रा देसाई, नगमा, सिद्धार्थ और निधि, विजय प्रताप, अमरेंद्र, मीना, श्रीकृष्‍ण शर्मा और वरूण, राजेश, अनुपमा, अंकुश, साक्षी और अखिल के माध्यम से एकाकीपन की अनेक खिड़कियां खुलती है, जिससे अरूण प्रकाश को अपने एकाकीपन को एकांत में बदलने की प्रेरणा प्राप्‍त होती है। हालांकि य‍ादें तो पीछा नहीं छोड़ती लेकिन कितने ही मोड़ आएं, हर मोड़ पर यादों के पत्‍थर विगत का पुलिंदा थामे खड़े रहते हैं।

उपन्‍यास के कथानक में कमाल की कसावट है, अनेक अंतर्कथाओं की उपस्थिति के बावजूद भी मूल कथा के प्रवाह में किसी प्रकार की कोई रूकावट नहीं दिखाई देती। अपनी बारी के अनुसार पात्र आते हैं, और अपनी भूमिका का निर्वहन कर परदे के पीछे चले जाते हैं। संवाद जानदार है । जो लोग डॉ. खड़से से परिचित हैं वे जानते हैं कि डॉ. खड़से जिस प्रकार हमसे बातचीत करते हैं हूबहू उसी प्रकार लिखते भी है। कवि भवानी प्रसाद मिश्र के शब्‍दों में-

‘’जिस तरह हम बोलते है उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।’’
भाषा में कहीं कोई कृत्रिमता या दिखावा नहीं।

डॉ. खड़से ने अपने इस उपन्‍यास में नदी विषयक अनेक कविताओं का खूब इस्‍तेमाल किया है। नदी पर उनके अनेक कविता संग्रह आ चुके हैं – अतीत नहीं होती नदी, नदी कभी नहीं सूखती…………..एक कथा संग्रह भी है……………………आखिर वह एक नदी थी।

वह रात
नदी की रात थी
हर कलकल
शब्‍दों में ढलकर
कविता सी बहती रही
रात भर निरंतर

सागर में रहकर भी
नदी
कभी-कभी केवल नदी होती है

उपन्‍यास में लेखक ने कुछ अनूठे एवं उल्‍लेखनीय उपमानों, प्रतीकों एवं बिम्‍बों का प्रयोग किया है, जैसे- पिघलती उमर, अतीत की नदी में सारे वर्ष बह जाते हैं, कविता कभी डूबती नहीं, रचनाकार के व्‍यक्तित्‍व में संघर्ष की एक लंबी नदी बह रही है, कविता भीतरी पिघलता सीसा है और ठंडी हवा के झोकों की तरह मनुष्‍य को जीवित बनाए रखने का प्राणवायु भी देती है। उपन्‍यास में लेखक ने इंदौर एवं मुंबई के अलावा अमेरिका के भूगोल, इतिहास, समाज, जीवन, संस्‍कृति एवं सौंदर्य का जीवंत चित्रण किया है, लगता है कि लेखक के साथ हम भी अमेरिका में लंबा समय बीता आए हैं ।

कथा विकास के क्रम में लेखक ने स्‍वाभाविक रूप से कुछ ऐसे वाक्‍य लिख दिए हैं, जो स्‍वतंत्र रूप से सुभाषित/सूक्ति का रूप ग्रहण कर लेते हैं, जैसे –कला, साहित्‍य और संगीत में सराहना खाद-पानी का काम करती है। जीवन का हर दिन विशिष्‍ट होता है, सक्रिय जितना हो, उतना अच्‍छा । हर जीवन एक कहानी है और हर कहानी एक जीवन बयान करती है। किसी व्‍यक्ति से संवाद अच्‍छा लगता है तो वह व्‍यक्ति भी भाने लगता है। उम्र के साथ जिंदगी खत्‍म नहीं होती, जिंदगी के साथ उम्र खत्‍म होती है…….आदि।

लेखक का मानना है कि सबसे अच्‍छी रचना वही है, जिसमें रचनाकार का प्रतिबिंब दिखता हो तथा श्रेष्‍ठ वह है, जिसमें पाठक अपना प्रतिबिंब पाता हो इस कृति में जहां मैंने पल-प्रतिपल कवि, कहानीकार, उपन्‍यासकार, अनुवादक, व्‍याख्‍याता, संपादक, हिंदी अधिकारी, पति, पिता एवं मित्र डॉ. दामोदर खड़से के दर्शन किए हैं तो मुझे लगातार यह महसूस होता रहा है कि यह मेरी अपनी कहानी है। इस दृष्टिकोण से यह उपन्‍यास श्रेष्‍ठत्‍व को प्राप्‍त कर जाता है। मेरा अपना मानना है कि सबसे अच्‍छी कृति वह होती है, जिसके अंत के बारे में हम जरा-सा भी पूर्वानुमान न लगा पाए और इस कसौटी पर यह उपन्‍यास पूरी तरह खरा उतरता है।

‘एकांत’ पत्रिका के संपादक अरूण प्रकाश का परिचय जब कवयित्रि साक्षी से होता है तो साहित्यिक निकटताएं बढ़ती जाती है और जब साक्षी के पति का देहांत हो जाता है, तो साक्षी का एकांत अरूण प्रकाश के एकांत में समाहित हो जाता है, लेकिन क्‍या अरूण प्रकाश और साक्षी का विवाह हो पाता है ? यह जानने के लिए तो आपको यह रोचक उपन्‍यास पढ़ना ही होगा ।

उपन्‍यास का प्रस्‍तुतिकरण, साज सज्‍जा, कागज एवं बाइडिंग आदि उत्‍कृष्‍ट है लेकिन मुखपृष्‍ठ को और अधिक आकर्षक बनाया जा सकता था। मुद्रण में प्रूफ एवं वर्तनी की अनेक अशुद्धियां हैं, एक स्‍थान पर तो अर्थ का अनर्थ हो गया है, एनजाइंग के स्‍थान पर एनजायनिंग हो गया है। मूल्‍य कुछ अधिक है।

विपिन पवार (Vipin Pawar)

 

 

 

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