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जनजातियों में सिकल सेल की पीड़ा समझा रही है सारिका

जनजातियों में सिकल सेल की पीड़ा समझा रही है सारिका

– कई बुद्धिजीवी भी सिकल सेल को सिर्फ समझते हैं साधारण एनीमिया
– सिकल सेल सिर्फ एनीमिया नहीं है, चलता है यह जन्म भर
इटारसी। विश्व सिकलसेल दिवस (World Sickle Cell Day) के अवसर पर आम लोगों में इस रोग के बारे में जागरूकता बढ़ाने नेशनल अवार्ड (National Award) प्राप्त विज्ञान प्रसारक सारिका घारू जनजातिबहुल ग्रामों में पहुंचकर इस रोग के फैलाव को रोकने के बारे में बता रही हैं।
सारिका ने बताया कि एक सरकारी रिपोर्ट (Government Report) के अनुसार भारत में सबसे अधिक सिकल सेल (Sickle Cell) से प्रभावित आबादी मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में है। 2007 में आईसीएमआर (ICMR) के अध्ययन के अनुसार यहां की एक करोड़ पचास लाख की जनजाति आबादी में से लगभग 10 से 33 प्रतिषत तक इस रोग की वाहक तथा लगभग 0.7 प्रतिशत रोगग्रस्त हैं। सारिका ने संदेश दिया कि इस रोग के बच्चों को स्कूल में बस्ते का बोझ कम करने, उन्हें पानी पीने, टॉयलेट जाने, अधिक मेहनत का काम न करने के लिये शिक्षकों एवं पालकों को प्रशिक्षित करने की अवश्यकता है। रोगी के प्रति सहानुभूति पूर्वक व्यवहार तथा काम का स्थान न अधिक गर्म न अधिक ठंडा हो यह ध्यान रखना चाहिये।
यह सामान्य एनिमिया (Anemia) नहीं है जिसे आयरन (Iron) देकर ठीक किया जा सके, यह जीवन भर चलने वाला जन्मजात रोग है। अत: इसका फैलाव रोकने के लिये विवाह के पूर्व सिकलसेल कुंडली मिलाना जरूरी है। सारिका ने आव्हान किया कि आज के दिन कुछ पल तो निकालिये इस रोग की पीड़ा को समझने के लिये।

क्यों मनाया जाता है विश्व सिकलसेल दिवस

सारिका ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा  (United Nations General Assembly,) ने 22 दिसम्बर 2008 को एक प्रस्ताव को अपनाया जिसमें सिकलसेल रोग को दुनिया की सबसे प्रमुख अनुवांशिक बीमारी में से एक के रूप में मान्यता दी। इसके बाद 19 जून 2009 से हर साल यह दिन विश्व सिकलसेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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AUTHORRohit

I am a Journalist who is working in Narmadanchal.com.

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