प्रसंग-वश: श्री अग्रसेन जयंती पर एक चिंतन- चंद्रकांत अग्रवाल

प्रसंग-वश: श्री अग्रसेन जयंती पर एक चिंतन- चंद्रकांत अग्रवाल

धर्म क्षेत्र की वीभत्सताओं के मध्य श्री कृष्ण की प्रेरणा से ही अग्रसेन जी क्षत्रिय से बने थे वैश्य। आज देश मे राम राज्य के बाद समाजवाद के पहले प्रणेता माने जाने वाले अग्रकुल प्रवर्तक श्री अग्रसेन जी का पावन जयंती पर्व हैं। कोरोना के संक्रमण काल में जब देश भर में इस बार जयंती पर्व सांकेतिक रूप से ही मनाने की मजबूरी है पर श्री अग्रसेन जी के कृतित्व व व्यक्तित्व को आत्मसात करने में कहीं कोई बाधा आज भी नहीं है यदि हम आत्म चिंतन हेतु तैयार हों। महाभारत के युद्ध में अग्रसेन जी के पिताश्री ने भी अग्रसेन जी को अपने साथ रखकर पांडवों के पक्ष में अपने विशाल सेना के साथ युद्ध किया था। युद्ध के बाद भी जब क्षत्रियों की हिंसा से धरती जलती रही तो कहा जाता हैं कि श्रीकृष्ण की प्रेरणा से ही श्री अग्रसेन ने क्षत्रिय वर्ण छोडक़र वैश्य वर्ण को स्वीकार किया व धर्म एवंं भक्ति के मार्ग पर चलते हुए समाजवाद के सिद्धांत के साथ शांतिपूर्वक जीने का संदेश पूरे देश को दिया था। अत: अग्रवालों को बनिया मानकर कमजोर समझने की भूल भी किसी को नहीं करनी चाहिए। सबको यह याद रखना चाहिए कि ये अग्रवाल पहले क्षत्रिय हुआ करते थे। श्री कृष्ण महाभारत के युद्ध के प्रारंभ होने के बाद क्रमश: अन्यायियों की मदद में खड़े युद्ध नियमों को कदम कदम पर बदल डालते हैं।
राम कभी भी सत्य का त्याग नहीं करते और श्रीकृष्ण सत्यावादी धर्मराज युधिष्ठिर को देर तक औेर जोर देकर समझाते हैं कि धर्म के पक्ष में लड़ा जाने वाला यह युद्ध तब तक जीता नहीं जा सकेगा जब तक द्रोणाचार्य जैसे महारथी मारे नहीं जाते। युधिष्ठिर भी आड़े हुए हैं, ङ्क्षकंतु अंतत: वहीं आचरण करते हैं जिसे कृष्ण सुझाते हैं, यानी अद्र्ध सत्य बोलना। महात्मा गांधी शायद यह कभी न करते। पर कृष्ण कराते हैं और द्रोणाचार्य मारे जाते हैं। यह एक वीभत्स दृश्य था, जैसा कि महाभारत में चित्रित हैं। तो क्या वह यह भी मान लें कि धर्म का मार्ग कभी कभी ऐसी वीभत्सताओं से होकर भी गया हैं? या यह कि यह अपवाद स्थिति हैं, जो कभी कभी अनिवार्य हो उठती हैं। आज तो हम धर्म के मार्ग में ऐसी वीभत्सताएं कदम कदम पर बार बार देखने को विवश है। कलयुग में जीने की सजा हैं यह शायद, कृष्ण जैसी लीला पुरूषोत्तम इसी अपवाद स्थिति की कल्पना है, किंतु अनिवार्य सांस्कृतिक मांग की कल्पना भी हैं।

कारागार में जनम लेकर गोकुल में लीलाएं कर, महाभारत के युद्ध का अविस्मरणीय नेतृत्व कर उन्होनें जीवन और समय को समझने और उससे व्यवहार करने की जो चाबी इस देश को दी हैं, वह आज भी पुरानी नहीं पड़ी है, न अप्रासांगिक सिद्ध हुई हैं। कलयुग में शायद और कारगर लगे और सिद्ध हो। कौरवों पर पांडवों की जीत पर कृष्ण का लौकिक और परलौकिक सर्वस्व दांव पर लगा हुआ है। कौरवों पर पांडवों की जीत अधर्म पर धर्म की जीत होगी। कृष्ण के संभवामि होने का अभीष्ट भी यही हैं कि दृुष्टों का विनाश और धर्म की स्थापना। इसकेअतिरिक्त पांडव उनके भक्त और शरणागत भी हैं । न में भक्ता: प्रणाष्यति का मिथ्या साबित नहीं होना चाहिए और यत: धर्म:तते जय: की भी रक्षा करनी है। कौरवों की शक्ति पांडवों से अधिक हैं अपनी जीत के प्रति पूर्ण आश्वस्त दुर्याेधन पांडवों से डरे हए धृतराष्ट्र से कहता हैं कि पांडवों के पास सिर्फ सात महारथी हैं पांच पांडव, सत्यकि और धृष्टद्युम्न। मेरे पास भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य,कर्ण, अश्वत्थामा, विकर्ण आदि सहित इक्कीस। पांडवों के पास सात अक्षौहिणी सेना है, मेरे पास ग्यारह। बलराम जी का कहना हैं कि गदा युद्ध में पृथ्वी पर मेरे समान कोई यौद्धा नहीं। पांडवों की तुलना में मेरी सेन्य शक्ति तीन गुना ज्यादा हैं।

देव गुरू बृहस्पति का कहना हैं कि जिसके पास शत्रु से तीन गुनी शक्ति हो उसे युद्ध से डरना नहीं चाहिए। दंभी दुर्याेधन के कथन में अतिशयोक्ति हो सकती हैं। लेकिन कृष्ण जानते हैं कि शक्ति संतुलन निर्णायक रूप से कौरवों के पक्ष में हैं। अपने से अधिक शक्तिशाली आततायी शत्रु से धर्मयुद्ध लडक़र विजय नहीं पायी जा सकती। इसके लिए बुद्धि और युक्ति की भी जरूरत हैं। अपराजेय, भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्याेधन से कैसे पार पाया जाये, इसे लेकर कृष्ण के मन में कोई नैतिक असमंजस नहीं। युद्ध के 18 दिन कृष्ण के लिए चरम सन्नद्धता, चिंता और आपद्धर्म के दिन हैं। उनकी दृष्टि बहुत साफ हैं। न्यायोचित उद्देश्य के लिए अनुचित साधन अपनाना अधर्म नहीं। पांडवों के साथ अब तक छल कपट करते आये दुर्याेधन को, सिर्फ उसी के तरीकों से परास्त किया जा सकता हैं। मरने से पहले भीम के गदा प्रहार से युद्ध भूमि में टूटी जंघाएं लिए दुर्याेधन कृष्ण पर आरोप लगाता हेैं। मेरे साथ कपट युद्ध करने के लिए पांडवों को आपने उकसाया।

आपकी आज्ञा से अर्जुन ने शिखंडी की ओट से भीष्म को मारा, द्रोण से अस्त्र रखवाने के लिए अश्वत्धामा के मरने की अफवाह पांडवों ने आपकी प्रेरणा से फैलायी। आपकी आज्ञा से अर्जुन ने रथ का पहिया निकालते हुए नि:शस्त्र कर्ण को मारा। आपके संकेत से भीम ने नाभि के नीचे गदा प्रहार कर मेरी जंघाएं तोड़ी। पांडवों ने मुझे युद्ध से नही अधर्म से पराजित किया। पांडव हतप्रभ होते हैं, क्योंकि दुर्याेधन के आरोपों में आंशिक सच हैं। लेकिन कृष्ण अविचलित हैं। उनका उत्तर होता हैं कि पांडवों ने जो किया, दुर्याेधन के अनुसार से अपनी प्राण रक्षा के लिए किया। हमारे पूर्वज देवता भी आततायी दानवोंं पर छल कपट से विजय पातेआये हैं। यहां वे विशेष रूप से वामन और बलि का उदाहरण देते हैं। दुर्याेधन पर आकाश से पुष्पवृष्टि होती हैं तो इसलिए नहीं कि उसका कथन आंशिक सत्य हैं, बल्कि इसलिए कि वह वीरोचित भाव से बिना किसी आत्दया के मृत्यु का वरण कर रहा हैं और इसीलिए भी कि उसके कथन में ईश्वर के बरक्स मनुष्य की स्वतंत्रता का उद्घोष हैं। कृष्ण के दबाव में युधिष्ठिर को कहना पड़ता अश्वत्धामा है तो लेकिन बाद में धीरे से जोड़ देते हैं, नरो व कुंजरोवा।

कृष्ण युधिष्ठिर का मनोविज्ञान समझते हेैं। वे जानते हैं कि बाद मे वे जरूर कोई ऐसे ढंग से बात कहेगें। अत: पहला वाक्य समाप्त होते ही शंख फंूक देते हैं। युधिष्ठिर का नरो व कुंजरोवा शंख के तुमुलनाद में डूब जाता हैं। इसके बाद द्रोण साधारण सैनिकों के लिए सर्वथा वर्जित पांडवी सेना का ब्रह्मास्त्र से वध करते हैं तो उसमे घोर कर्म पर आकाश में अनेकों ऋषि प्रकट होकर भत्र्सना करते हैं ओर अपने को पांडवों का अपराधी मानते हुए द्रोण पश्चाताप से भरे हुए शस्त्र रख देते हैं और समाधिस्थ हो रथ में ही प्राण त्याग देते हैं। इसके बाद धृष्टद्युम्न जिनका सिर काटता हैं, वह जीवित द्रोण सिर न होकर निष्प्राण द्रोण का सिर होता है। युधिष्ठिर से झूठ बोलने का आग्रह करते हुए कृष्ण, यहां एकभिन्न सूत्र देते हैं, यदि झूठ बोलने से किसी की प्राण रक्षा होती हेै,ंतो वह सत्य से भी बडक़र धर्म हैं। अत: विजय उन्हीं की होगी, इसी तरह फलित हो सकता था। भीष्म शिखंडी के बाणों से नहीं मरे,अर्जुन के बाणों से मरे।

धृष्टद्युम्न ने भी जीवित द्रोण का नहीं, उनके शव का वध किया। कृष्ण ने वही किया जो नियति द्वारा बहुत पहले निर्दिष्ट हो चुका था, जो द्रोण ने स्वयं चाहा था और जो उनका कर्म फल था। महाभारत के ऐसे विलक्षण कृष्ण का आगे क्या हुआ? उन्होंनें पांडवों को विजय, राज्य और धन तो प्राप्त करा दिया, परंतु क्या वह सब टिक पाया? कृष्ण अपने जीवन के उत्तराद्र्ध में क्या पूरे संतोष समाधान के साथ मृत्यु के सम्मुख जा पाये? इन प्रश्नों के जो उत्तर महाभारतकार ने दिये हैं वे सब नकारात्मक हैं। महाभारत के युद्ध में पांडवों ने जिस पद्धति से सभी कौरव वीरों को मार दिया था। अश्वत्धामा ने उसी पद्धति से पांडव वीरों की हत्या की। युद्ध के बाद कौन बचे हैं? पांच पांडव, द्रौपदी और कुंती, धृतराष्ट्र और गांधारी, युयुत्सु और उत्त्रा का गर्भ और अंत में कृष्ण। कुल मिलाकर बारह व्यक्ति बचे होंगें शायद। युद्ध के समापन पर युद्ध भूमि पर शवों का ढेर लग गया था। सभी मृत वीरों की पत्नीयां उनकी छाती पर सिर रखकर विलाप कर रही थी।

गांधारी की बंद आंखों को यह करूण दृश्य बह़ुत साफ दिखलाई दे रहा था। इसी समय कृष्ण को गांधारी से मिले शाप का प्रभाव कहे अथवा कृष्ण का कर्म फल, गांधारी ने जो कहा, वैसा ही घटित हुआ। यादव कुल का सर्वनाश शराब में नशे के कारण हुआ। पहली शरारत शैलेय सत्यकि ने की ओर कृतवर्मा भडक़ उठा। विषय था, महा भारत युद्ध में धर्म अधर्म का और मूल्यवान स्यमंतक मणि की चोरी का कृतवर्मा महाभारत युद्ध में अश्वत्धामा की सहयोगी था। गहरी नींद सो रहे द्रोपदी के पुत्रों को मारते समय उसने अश्वत्धामा की सहायता की थी, इसलिए सत्यकि उसे दोष दे रहा था। दुर्याेधन ओर कृष्ण एक दूसरे के दोषों को गिन रहे थे। यह प्रसंग भी वैसा ही था। इसमें कौन दोषी और कौन निर्दाेष यह कैसे सावित कर सकेंगे? परंतु शराब का नशा जैसे जैसे चढ़ता गया वैसे वैसे उनका झगड़ा बढ़ता गया। यह झगड़ा जब स्यमंतक मणि की चोरी के पुरोन प्रकरण तक आया, तब सत्यभामा रोने लगी। सात्यकि कृतवर्मा में युद्ध शुरू हुआ और कौरव कुल के विनाश की ही भांति कृष्ण के यादव कुल का भी विनाश हो गया। कृष्ण ने इसमेें शौर्य का प्रदर्शन किया परंतु उनका शौर्य कुल विनाश के लिए अधिक कारणी भूत शामिल हुआ।

कृष्ण ने बलराम के अंत को निकटता से देखा ओर वह निाश हो गये। ऐसी निराश अवस्था में बगैर मनको संतुलित रखने का अन्य कोई उपाय उपलब्ध नही होने के कारण वह योगस्थ बैठ गये। उधर हस्तिनापुर में क्या हुआ? विदुर और कुंती तथा धृतराष्ट्रऔर गांधारी वन में चले गये। वहां विदुर मति भ्रम की अवस्था में गुजर गया। जो शेष थे उन्होनें दावाग्नि में आत्महत्या कर ली। महाभारत के युद्ध में बच गय उतरा के पेट का गर्भ आगे परीक्षित के रूप में बड़ा हुआ। पांडवों ने उसे राज गददी पर बैठाया और वे भी द्रौपदी के साथ वन की ओर निकले। भयावह श्रम से वह एक के बाद एक धराशाई होते गये। इसक ा वर्णन महाभारतकार ने अतिशय तन्मय होकर किया हैं। युधिष्ठिर द्वारा द्रौपती को दिया गया दूषण और भीम का द्रोैपदी पर प्रेम इनसे मनुष्य की दो प्रवृत्तियां स्पष्ट हो जाती हैं। अर्जुन का उत्तराधिकारी हस्तिनापुर का तो कृष्ण का उत्तराधिकारी इंद्रप्रस्थ का राजा हुआ। परंतु उन्हें भी सुख प्राप्त नहीं हो सका।

परीक्षित को खंडव वन के मूल स्वामी तक्षक ने मार दिया और उसका लडक़ा जनमेजय निरंतर प्रतिशोध और हिंसा के चक्र में भयभीत जीवन जीता रहा। उत्तर दिशा की ओर से जब नये नये वंश के राजाओं के आक्रमण हुए तब इन दोनों राज्यों को छोडऩा पड़ा इस कारण महाभारत काल के सभी क्षत्रिय कुल अपनी रक्षा हेतु इधर उधर भागने लगे। पुरानी स्थिति, पुरानी व्यवस्था, पुराना धर्म और नीति नई पस्थिति के सम्मुख कमजोर साबित हुए। धीरे धीरे वह नष्ट भी होती गयी। महाभारत केवल एक राजकुल के अंत का ब्यौरा देने वाला इतिहास काव्य नहीं हैं,वह मानव विकास क्रम में दीर्घ काल तक अस्तित्व में रहे कुल समाज के युग के अंत का ब्यौरा देने वाला एक इतिहास काव्य हैं, इसलिए वह युगांत हैं। अग्रसेन जी के क्षत्रिय से वैश्य बनने की सामाजिक व राष्ट्रीय जरूरत का मर्म भी हमें तभी समझ में आ सकता हैं। आज अग्रसेन जयंती हैं और अग्रसेन जी के क्षत्रिय से वैश्य बनने का इतिहास युग पुरूष श्री कृष्ण की एक और अलौकिक लीला का ही प्रतिफल था यही बताने के लिए आज मुझे महाभारत युद्ध के बाद का वृतांत विस्तार से बताना पड़ा।

श्री कृष्ण की प्रेरणा से ही अग्रसेन जी ने माँ लक्ष्मी की कठोर साधना की और उनसे अपने कुल के लिए सदैव उनकी कृपा दृष्टि का वरदान पाया। जिससे कारण ही आज देश भर में निवास कर रहे लगभग चार करोड़ अग्रवाल प्राय: आर्थिक रूप से इतने सक्षम हैं कि देश में भरे जाने वाले कुल आयकर का 24 प्रतिशत, कुल दान राशि का 62 प्रतिशत, योगदान अग्रवालोंं का ही हैं। देशभर में संचालित हैं। देश के विकास में 25 प्रतिशत योगदान अग्रवालों का ही हैं। देश भर में अग्रवालों द्वारा ही लगभग 50 हजार हिंदू मंदिरों का संचालन हो रहा हैं। देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले शेयर मार्केट के लगभग 50 प्रतिशत ब्रोकर अग्रवाल हैं। देश भर के लगभग सभी प्रमुख दैनिक अखबारों के मालिक भी अग्रवाल ही हैं। एक क्षत्रिय राजा को वैश्य बनाकर मेरे श्रीकृष्ण ने सचमुच आज के भारत पर कितना बड़ा उपकार किया यह उपरोक्त आंकड़ों से सहज ही समझा जा सकता हेैं। जय श्री कृष्ण, जय श्री अग्रसेन।

चंद्रकांत अग्रवाल(Chandrakant Agrawal)

 

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