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कहानी: भारत में विवाह एक सामाजिक समझौता है…

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परिवार: भारत में विवाह एक सामाजिक समझौता है जिसमें दो परिवार आपस में मिलते हैं ना कि केवल दो व्यक्तियों का मिलन होता है फिर विवाह उपरांत यह कैसी विडंबना है कि वर और वधु दोनों ही एकाकी रहना चाहते हैं वह एक दूसरे के परिवार के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाते हैं।

प्रमोद और मानसी की शादी को कई साल होने को आये लेकिन सालों बाद भी उनका झगड़ा परिवारों को लेकर होता रहता था ।प्रमोद के घर में उसके पिताजी ,मां, भाई ,भाभी और उनके तीन बच्चे थे। भाई की आमदनी अधिक ना होने के कारण आर्थिक रूप से हमेशा प्रमोद से मदद लेते रहते थे उनकी मदद लेने के साथ ही घर में झगड़ा शुरू हो जाता था।

प्रमोद – इस बार भाई का फोन आया है उसने 70000 रुपए मांगे हैं।बेटी की फीस भरनी है।
मानसी- 70000 !
पेड़ पर उगते हैं क्या पैसे?
प्रमोद – अरे बेटी की फीस भरनी है ।
मानसी – फीस भरनी है अगर वह इतनी फीस नहीं दे सकते तो इतना महंगा पढ़ाने की जरूरत क्या है ?
प्रमोद – हां अब तुझसे पूछ कर वह पढाएगा उसे पता है मैं देख सकता हूं तो मैं दूंगा ।
मानसी – और कल को हमारे बच्चे बड़े होंगे तो हमारे बच्चों की फीस कौन भरेगा।
प्रमोद- यह हमारे तुम्हारे क्या होता है ?

और उन लोगों का झगड़ा फिर से शुरू हो गया उनके बच्चे जोकि अब समझदारी की सीमा पर पहुंच चुके थे वह इस झगड़े को हमेशा समझने की कोशिश करते रहते थे आखिर उनका बेटा मोनू बीच में बोल ही पड़ा ।

मोनू- मम्मी क्यों आप पापा से इतना झगड़ा करती हो? वह कहीं वैसा फालतू तो खर्च नहीं कर रहे हैं।घर में ताऊ जी और दादी की मदद यदि पापा नहीं करेंगे तो कौन करेगा ?

मानसी समझाती है उसे कि जो भी मैं यह झगड़ा कर रही हूं यह तुम दोनों की भलाई के लिए कर रही हुं क्योंकि मैं नहीं चाहती कि आगे तुम लोगों के भविष्य के लिए हमारे पास कुछ ना बचे पर बेटे का तर्क भी जायज था वह बोला तो क्या मैं भी बड़ा होकर केवल अपना परिवार देखूं आप लोगों को ना देखूं।

उसे डांट दिया मानसी ने – बहस करता है जाकर चुपचाप अपनी पढ़ाई क्यों नहीं देखता?
और सब जन अपने अपने कमरों में चले गए।

अभी थोड़े दिन बीते ही थे कि एक दूसरा हंगामा शुरू हो गया फोन आया कि बाबू जी की तबीयत खराब है तुम लोग जल्दी से आ जाओ ।कोरोना का समय है इस समय ने सबको बहुत झटके दिए सबका जाना संभव नहीं है तो यह तय हुआ कि केवल प्रमोद ही जाएगा लेकिन मानसी का झगड़ा बदस्तूर जारी था।

मानसी – आखिर क्यों जब भैया हैं वहां पर तो तुम्हें जाने की क्या जरूरत है?
प्रमोद- तो अब मेरे बाबूजी को देखने के लिए मुझे तुझसे पूछना पड़ेगा।
मानसी – अरे मैं तुम्हारी भलाई के लिए कह रही हूँ। बीमारी फैल रही है अगर तुम्हें कुछ हुआ तो हम क्या करेंगे?
प्रमोद – ठीक है और वहां जो मेरे बाबूजी परेशान हैं उसका क्या ?

फिर वापस से बेटा बीच में आता है और वह मानसी को समझाता है कि – पापा सही है और आप गलत हो आप क्यों पापा को उनके घर पर नहीं जाने दे रही हैं मानसी बोली अपने बेटे से – काश तुम लोग मुझे समझते तुम लोग नहीं समझ सकते जो मैं चाहती हूं वह कभी नहीं समझ सकते इस बार बेटे ने भी अपनी सीमा पार कर दी वह बोला कि – मैं आपको वैसे ही नहीं समझ सकता जैसे आप बाबा ,दादी और पापा को नहीं समझ पाए असल में आप बहुत स्वार्थी हो और मुझे आपसे कभी भी कोई मतलब नहीं रखना ।
मानसी बहुत ज्यादा परेशान हो गई उसकी समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कर रही है। दिमागी रूप से वह थक चुकी थी और प्रमोद अपने घर के लिए रवाना हो गया घर जाकर प्रमोद को पता चला की पिताजी की हालत वाकई बहुत खराब है और दूसरी ओर भाई की नौकरी भी चली गई है ।भाई की तबीयत भी ठीक नहीं है ।3 दिन से लगातार बुखार आ रहा है जब डॉक्टर ने कहा कि कोरोना टेस्ट करना पड़ेगा तो कोरोना टेस्ट करने पर वह कोरोना पॉजिटिव आए और उनको अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा ।एक अस्पताल में बाबूजी भर्ती थे और दूसरे अस्पताल में भाई ।वह दोनों अस्पतालों के बीच में अकेला जूझता रहा उधर से पत्नी का फोन आता पत्नी घबराई हुई थी कि कहीं प्रमोद को कोरोना ना हो जाये ।उसकी परेशानी अलग थी, प्रमोद की परेशानियां अलग। ऐसा लगता पति-पत्नी होते हुए भी वे दोनों एक दूसरे की परेशानी को समझ कर भी समझना नहीं चाह रहे थे ।

तीन दिन बाद भाई का ऑक्सीजन लेवल इतना ज्यादा डाउन हो गया कि डॉक्टर उसको संभाल नहीं पाए और सुबह 4:00 बजे उसका देहांत हो गया अपने पीछे वह अपने तीन बच्चे छोड़ गया प्रमोद के सहारे।

प्रमोद का दुख असहनीय था ।पिता को बिना बताए उसने भाई का अंतिम संस्कार किया। जब पिता को हॉस्पिटल से घर लाए तो उनके पास उनका बड़ा बेटा नहीं था। अब पूरा सहारा उनका केवल उनका छोटा बेटा प्रमोद ही था ।हारा थका प्रमोद भी अपने घर वापस आया ।

मानसी के पास भी अब कोई शब्द नहीं है उसने स्वीकार किया कि उसके केवल 2 बच्चे नहीं हैं अब 5 बच्चे हैं और वह पांचों बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरीके से निभाने की कोशिश करेगी काश यही सच उसने पहले से ही स्वीकार कर लिया होता।
इस कठिन समय ने छिपे हुए चेहरों को उजागर कर दिया जो भावनाएं वर्षों से दबी पड़ी थीं वे सामने आ गई।

मानसी असल में हृदयहीन नहीं थी खाली भविष्य को लेकर आशंकित थी लेकिन अब वह समझ गई थी कि यह पूरा परिवार उसकी ही जिम्मेदारी है और उसने परिस्थितियों को हृदय से स्वीकार कर दिया।

MINAKSHI

मीनाक्षी ” निर्मल स्नेह “
खोपोली ( महाराष्ट्र )

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