रोहित नागे, इटारसी, 9424482883

भारतीय संगीत के आकाश का वह सबसे चमकदार सितारा आज टूटकर अनंत में विलीन हो गया, जिसने सात दशकों तक अपनी आवाज़ से करोड़ों दिलों को धड़कना सिखाया। सुरों की जादूगरनी, ‘वर्सेटाइल क्वीन’ आशा भोंसले का रविवार को निधन संगीत के एक ऐसे स्वर्णिम अध्याय का अंत है, जिसकी भरपाई सदियों तक संभव नहीं होगी। आशा ताई केवल एक पार्श्व गायिका नहीं थीं, वे संघर्ष, जीवटता और निरंतर नवाचार का एक जीवंत दर्शन थीं। आइए, उनके जीवन के उन पन्नों को पलटते हैं जो उन्हें एक ‘लीजेंड’ बनाते हैं।
दीदी की छाया और अपनी जमीन की तलाश
1933 में सांगली के एक संगीतकार परिवार में जन्मी आशा जी का बचपन से ही संघर्षों से नाता रहा। पिता दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर आई। संगीत की दुनिया में तब उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर का एकछत्र राज था। एक जैसी आवाज और एक ही क्षेत्र होने के कारण आशा जी के लिए अपनी पहचान बनाना हिमालय चढऩे जैसा था।
शुरुआती दौर में उन्हें ‘रिजेक्टेड’ गाने मिले। उन्होंने उन गानों को चुनौती की तरह लिया। जहां लता जी की आवाज में ‘पवित्रता’ और ‘ठहराव’ था, वहीं आशा जी ने अपनी आवाज में ‘खनक’, ‘अदा’ और ‘ऊर्जा’ को पिरोया। उन्होंने साबित किया कि संगीत का एक ऐसा कोना भी है जहां सिर्फ उनकी हुकूमत चलेगी।
गायकी का बहुरंगी कैनवास : आवाज़ का ‘लोच’ और विविधता
आशा जी की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी अनुकूलन क्षमता।
- कैबरे और रॉक : ‘पिया तू अब तो आजा’ और ‘दुनिया में लोगों को’ जैसे गानों के जरिए उन्होंने पश्चिमी संगीत को भारतीय रंग में रंगा। उनकी सांसों का उतार-चढ़ाव दुनिया भर के गायकों के लिए आज भी शोध का विषय है।
- शास्त्रीय और गजल : ‘इन आंखों की मस्ती के’ (उमराव जान) के जरिए उन्होंने उन आलोचकों के मुंह बंद कर दिए जो उन्हें सिर्फ ‘कैबरे क्वीन’ समझते थे।
- पॉप और मॉडर्न : 90 के दशक में जब संगीत बदल रहा था, तब उन्होंने ‘रंगीला रेÓ और ‘कहीं आग लगे लग जावेÓ जैसे गानों से नई पीढ़ी को भी अपना दीवाना बना लिया।
सुरों से परे : एक साहसी उद्यमी का चेहरा
आशा भोंसले का व्यक्तित्व केवल माइक तक सीमित नहीं था। वे एक कमाल की ‘बिजनेस वुमन’ भी थीं। उन्हें खाना बनाने का इतना शौक था कि उन्होंने इसे विश्वस्तरीय ब्रांड बना दिया। दुबई, कुवैत, बर्मिंघम और मैनचेस्टर जैसे शहरों में उनके ‘Asha’s’ रेस्टोरेंट भारतीय स्वाद के प्रतीक बन गए। वे अक्सर कहती थीं, ‘अगर मैं गायिका न होती, तो एक रसोइया होती।’ यह उनके स्वावलंबी होने का सबसे बड़ा प्रमाण था।
व्यक्तिगत तूफानों के बीच अडिग ‘आशा’
आशा ताई का जीवन सिनेमाई पर्दे से कहीं ज्यादा उतार-चढ़ाव भरा रहा। 16 साल की उम्र में घर से भागकर गणपत राव भोंसले से शादी करना और फिर तीन बच्चों के साथ उस रिश्ते से बाहर निकलना—एक अकेली महिला के लिए उस दौर में बहुत बड़ी बात थी। बाद में राहुल देव बर्मन (पंचम दा) के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत को नई ऊंचाइयां दीं, लेकिन पंचम दा का साथ भी वक्त ने जल्द छीन लिया। अपनी बेटी वर्षा और बेटे हेमंत को खोने का दुख किसी भी इंसान को तोड़ सकता था, लेकिन आशा जी ने अपने आंसुओं को सुरों में बदल दिया। उन्होंने सिखाया कि ‘काम’ ही सबसे बड़ा मरहम है।
एक दार्शनिक विरासत : जो कभी ओझल नहीं होगी
आशा जी का जाना भारतीय संस्कृति के एक ‘मल्टी-डाइमेंशनल’ व्यक्तित्व का अवसान है। उन्होंने 20 से अधिक भाषाओं में 12,000 से ज्यादा गीत गाकर ‘गिनीज बुक’ में अपना नाम दर्ज कराया। उन्हें पद्म विभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार जैसे शीर्ष सम्मान मिले, लेकिन उनका असली सम्मान वह ‘आशा’ है जो वे हर निराश दिल में अपने गानों के जरिए जगाती थीं।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो उनकी यादों को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके शब्द और सुर ही काफी हैं।
वे उस चांदनी की तरह हैं जो सूरज ढलने के बाद भी रात को रोशन रखती है। आशा भोंसले एक युग थीं, एक आंदोलन थीं और एक ऐसी आवाज़ थीं जिसे वक्त की कोई भी दीवार कैद नहीं कर सकती। वे हर उस प्रेमी की धड़कन में रहेंगी जो गुनगुनाएगा, और हर उस कलाकार की प्रेरणा बनेंगी जो संघर्ष से सफलता का रास्ता तलाशेगा।











