- अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

क्या आपने कभी सोचा है कि कोई इंसान चाय की दुकान से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े सितारों में से एक कैसे बन जाता है? क्या कभी आपने महसूस किया है कि जिस शख्स को आज पूरी दुनिया पहचानती है, उसके पैरों में एक वक्त ऐसे भी चप्पलें नहीं हुआ करती थीं? ये कहानी है उस शख्स की, जिसने नाम से लेकर तकदीर तक, सब कुछ खुद लिखा। ये कहानी है आप-हम जैसे एक आम लड़के की, जिसने अपनी मेहनत, हिम्मत और होशियारी से खुद को ‘शाहरुख खान’ बना लिया।
ये कहानी सिर्फ एक स्टार की सफलता की कहानी नहीं है। ये उस जुनून, उन संघर्षों और उन छोटे-छोटे पलों की कहानी है, जिन्होंने मिलकर एक ‘बादशाह’ को गढ़ा। तो आइए, चलते हैं उस दिल्ली की गलियों में, जहाँ ये सफर शुरू हुआ था।
वो नाम जो पिता की मोहब्बत था
शाहरुख खान का नाम आज दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका पहला नाम ‘अब्दुल रहमान’ रखा गया था? ये नाम उनकी नानी की पसंद था। लेकिन उनके पिता, ताज मोहम्मद खान, को ये नाम पसंद नहीं आया। वो चाहते थे कि उनके बेटे का नाम उनकी बेटी ‘लालारुख’ के नाम से मेल खाए। और इस तरह, स्कूल में दाखिले के वक्त, ‘अब्दुल रहमान’ का नाम बदलकर ‘शाहरुख खान’ कर दिया गया। ये सिर्फ एक नाम का बदलाव नहीं, बल्कि एक नई पहचान की शुरुआत थी।
माता-पिता की वो फिल्मी लव स्टोरी
शाहरुख के माता-पिता की मुलाकात की कहानी तो किसी बॉलीवुड फिल्म जैसी ही है। एक दिन, इंडिया गेट पर, ताज मोहम्मद अपने दोस्तों के साथ बैठे थे कि अचानक एक तेज रफ्तार कार एक डिवाइडर से टकरा गई। कार चला रही युवती, लतीफ फातिमा, बुरी तरह घायल हो गईं। ताज मोहम्मद ने तुरंत उन्हें अस्पताल पहुँचाया और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपना खून भी दिया। इस दौरान दोनों एक-दूसरे के करीब आए। मुश्किल ये थी कि लतीफ फातिमा की सगाई पहले से ही एक क्रिकेटर से तय हो चुकी थी। लेकिन ताज मोहम्मद ने हार नहीं मानी। उन्होंने लतीफ फातिमा के पिता से सीधे कहा कि वो उनसे ही शादी करेंगे। कुछ उठा-पटक के बाद, प्यार की इस जिद के आगे सबको झुकना पड़ा। ये वही जिद और जुनून था, जो आगे चलकर शाहरुख की भी पहचान बना।
पिता की चाय की दुकान और जिंदगी के पहले सबक
शाहरुख के पिता ताज मोहम्मद एक स्वतंत्रता सैनानी थे। लेकिन वर्तमान राजनीति से दूर होकर उन्होंने दिल्ली के रशियन कल्चरल सेंटर के सामने एक छोटी-सी चाय की दुकान खोल ली, जो बाद में छोटे-भटूरे के रेस्टोरेंट में तब्दील हो गई। आठ साल की उम्र से ही शाहरुख इस दुकान पर वक्त बिताया करते थे। जब शाहरुख सिर्फ 15 साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद, स्कूल से आकर, शाहरुख ने खुद अपने पिता के उस रेस्टोरेंट को संभाला। यहीं पर उन्होंने लोगों से बातचीत करना, मेहमाननवाजी करना और जिम्मेदारी निभाना सीखा। ये वो प्रैक्टिकल क्लासेज थीं, जो किताबों में कहीं नहीं मिलती थीं।
जीवन की पहली कमाई: सिर्फ 50 रुपये!
आज शाहरुख एक फिल्म के करोड़ों रुपये लेते हैं, लेकिन उनकी जिंदगी की पहली कमाई थी महज 50 रुपये! ये कमाई उन्होंने मशहूर गायक पंकज उदास के एक कॉन्सर्ट में सपोर्टिंग स्टाफ के तौर पर काम करके की थी। उनकी जिम्मेदारी थी दर्शकों के टिकट चेक करना और उन्हें उनकी सीटों तक पहुँचाना। उस वक्त क्या किसी ने सोचा होगा कि यही लड़का एक दिन खुद करोड़ों दर्शकों के दिलों पर राज करेगा?
वो मोड़ जब मिल गया ‘सपना’
साल 1985 शाहरुख के जीवन का सबसे अहम साल साबित हुआ। इसी साल उनकी मुलाकात थिएटर के महान गुरु बैरी जॉन से हुई। बैरी जॉन ने शाहरुख के अंदर के जुनून को पहचाना और उन्हें एक्टिंग का सपना दिखाया। उन्होंने शाहरुख को अपने एक नाटक में एक्स्ट्रा के तौर पर लिया। ये वो पल था जब शाहरुख ने महसूस किया कि यही वो रास्ता है, जिस पर चलकर वो अपनी एक अलग पहचान बना सकते हैं।
टीवी के दिन: गलतियाँ और मौके
लोग अक्सर समझते हैं कि ‘फौजी’ शाहरुख का पहला टीवी शो था। लेकिन असल में उन्होंने पहले ‘दिल दरिया’ नामक एक शो साइन किया था। मगर प्रोडक्शन की देरी के चलते ‘फौजी’ पहले रिलीज हो गया और इस तरह यही उनका पहला टीवी शो बन गया। फिर आया ‘सर्कस’। दिलचस्प बात ये है कि ‘सर्कस’ में शाहरुख का रोल पहले किसी और एक्टर को ऑफर हुआ था, जिसने एक फिल्म के चक्कर में ये शो छोड़ दिया। शाहरुख ने ये मौका हाथोंहाथ लिया और यहीं से वो घर-घर में पहचाने जाने लगे। उस दूसरे एक्टर की वो फिल्म तो कभी बनी ही नहीं। किस्मत ने शाहरुख का साथ दिया, लेकिन उन्होंने किस्मत के हर मौके को अपनी मेहनत से चूमा भी।
फिल्मों का सफर: असफलताएँ और वो ‘बाज़ीगर’ वाला दांव
फिल्मों में भी उनका सफर एकदम आसान नहीं रहा। ‘दीवाना’ से शुरुआत के बाद कई फिल्में ऐसी आईं जो चल नहीं पाईं। लेकिन फिर आई ‘बाज़ीगर’। एक ऐसा रोल जो उस वक्त के हीरो के इमेज के बिल्कुल उलट था। कहा जाता है कि फिल्म देखने के बाद यश जौहर जैसे बड़े फिल्मकार ने शाहरुख से पूछा, “ये क्या कर दिया तुमने अपने करियर के साथ?” लेकिन जब फिल्म सुपरहिट हुई, तो वही यश जौहर शाहरुख के पास आए और बोले, “चल जाएगी तुम्हारी गाड़ी।” शाहरुख ने एक ऐसी ‘बाजी’ लगाई, जिसने उन्हें हमेशा के लिए जीत दिला दी।
दोस्ती और दिलदारी के किस्से
शाहरुख सिर्फ एक एक्टर ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन दोस्त भी हैं। करन जौहर से उनकी दोस्ती की शुरुआत एक टीवी शो ‘इंद्रधनुष’ के सेट पर हुई, जिसमें दोनों को ही काम करना था। आज ये जोड़ी बॉलीवुड की सबसे मजबूत दोस्तियों में से एक है।
लेकिन उनकी दिलदारी सिर्फ दोस्तों तक ही सीमित नहीं है। क्या आप जानते हैं कि शाहिद कपूर को एक्टिंग में आने का हौसला शाहरुख खान ने ही दिया था? एक इवेंट में शाहिद का डांस देखकर शाहरुख ने उन्हें एक्टिंग करने की सलाह दी। जब शाहिद ने अपनी दुबली-पतली काया को लेकर शर्मिंदगी जताई, तो शाहरुख ने कहा, “मैं भी तुम्हारी उम्र में ऐसा ही दुबला-पतला था। फिक्र मत करो, तुम अच्छा डांस कर लेते हो, अच्छी एक्टिंग भी सीख जाओगे।” ये छोटा-सा प्रोत्साहन ही शाहिद के लिए बहुत बड़ा सहारा बन गया।
निष्कर्ष: सपने वो नहीं जो आप देखते हैं, बल्कि वो हैं जिन्हें पूरा करने की जिद आप रखते हैं
शाहरुख खान की कहानी हमें यही सिखाती है कि कोई भी मुकाम रातों-रात नहीं मिलता। ये सफर छोटी-छोटी चाय की दुकानों, 50 रुपये की कमाई, असफलताओं और गलत फैसलों से होकर गुजरता है। लेकिन अगर आपमें सीखने, संभलने और फिर से उठ खड़े होने का हौसला है, तो मंजिल आपकी ही होती है।
उनकी कहानी सिर्फ पैसों और शोहरत की कहानी नहीं है। ये उस जज्बे की कहानी है जो एक लड़के को दिल्ली की गलियों से निकालकर दुनिया के सिनेमा के सबसे ऊँचे मुकाम पर पहुँचा देती है। तो अगली बार जब आप कोई मुश्किल सामने देखें, तो याद कर लीजिएगा उस लड़के को, जिसने 50 रुपये से अपना सफर शुरू किया था और आज करोड़ों के सपनों का बादशाह बन गया। क्योंकि हर शाहरुख के अंदर एक ‘बादशाह’ छुपा होता है, बस जरूरत है उसे जगाने की।








