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भाषणों का शोर, समस्याओं की मार और तवा के जल में बहते दावे

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इटारसी की कृषि उपज मंडी में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव ने क्षेत्र की कृषि राजनीति और धरातल की कड़वी सच्चाई के बीच के फासले को एक बार फिर उजागर कर दिया है। कहने को तो यह आयोजन कृषक चेतना और सम्मान का प्रतीक था, लेकिन प्रशासनिक अव्यवस्था, जनप्रतिनिधियों की बेरुखी और वास्तविक किसानों की अनुपस्थिति ने इसे महज एक औपचारिक और राजनीतिक मंच बनाकर छोड़ दिया।

मंच से सांसद और किसान नेता दर्शन सिंह चौधरी द्वारा देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर कृषि उपेक्षा का आरोप लगाना राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इतिहास और धरातल के तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता। नर्मदापुरम से हरदा तक जिस तवा बांध के पानी से आज किसान साल में तीन फसलें लेकर समृद्ध हो रहा है, वह कांग्रेस शासनकाल की दूरदर्शिता का ही परिणाम है। राजनीतिक बहसों में नेहरू की आलोचना करना आसान है, लेकिन यह सच स्वीकारना ही होगा कि आज क्षेत्र में जो हरित क्रांति दिख रही है, उसकी नींव दशकों पहले रखी जा चुकी थी—ना कि यह किसी नए जनप्रतिनिधि के आने के बाद का चमत्कार है।

कार्यक्रम की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि जिस ‘बलराम जयंती’ पर अन्नदाता का सम्मान होना था, वही किसान मूंग तुलाई, खाद की किल्लत, बिजली कटौती और नहरों के सूखे पड़े टेल-एंड्स को लेकर सड़कों पर संघर्ष कर रहा था। वेयरहाउसों के बाहर हफ्ते भर से कतारों में खड़े किसानों के दर्द पर मंच पर बैठे लोक निर्माण मंत्री, स्थानीय सांसद, राज्यसभा सांसद और विधायकों ने चुप्पी साधे रखी। जब धरातल पर किसान 5-6 घंटे बिजली और बायोमेट्रिक सत्यापन की जटिलताओं से जूझ रहा हो, तब एसी कमरों में तैयार किए गए आंकड़े और मंच से दिए गए बड़बोले भाषण जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम करते हैं।

पिछले दिनों हुई किसानों की पदयात्रा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि किसान अब महज कागजी दावों और राजनीतिक नारेबाजी से बहलने वाला नहीं है। केवल भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों की उपस्थिति में आयोजित कार्यक्रम को ‘किसान महोत्सव’ का नाम देना लोकतंत्र और कृषक समुदाय—दोनों के साथ छलावा है। प्रशासनिक अव्यवस्था का आलम यह था कि मीडिया की उपेक्षा हुई और जिले के शीर्ष अधिकारी अग्रिम पंक्तियों के बजाय राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच बैठने को मजबूर दिखे।

सरकारों और जनप्रतिनिधियों को यह बुनियादी बात समझनी होगी कि जोर-जोर से नारे लगाने से जमीनी समस्याएं नहीं छिपतीं। किसान को भाषण नहीं, बल्कि अपनी उपज की समय पर तुलाई, खाद-पानी-बिजली की सुचारू आपूर्ति और एमएसपी की कानूनी गारंटी चाहिए। जो सत्ता किसानों की इस बुनियादी चीख को अनसुना करेगी, उसे आने वाले समय में इसके गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

Rohit Nage

रोहित नागे वरिष्ठ पत्रकार एवं समाचार संपादक हैं, जिन्हें प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में तीन दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक किया है तथा लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। अपने पत्रकारिता जीवन में उन्होंने दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राज एक्सप्रेस, पीपुल्स समाचार, नवभारत सहित अनेक प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में रिपोर्टर, उप-संपादक, ब्यूरो प्रमुख एवं न्यूज़ इंचार्ज के रूप में कार्य किया है। वे Narmadanchal.com के रिपोर्टर, उप-संपादक, एवं न्यूज़ इंचार्ज के रूप में कार्य कर रहे हैं और नर्मदांचल क्षेत्र की निष्पक्ष, तथ्यपरक एवं जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। वर्तमान में वे मध्य प्रदेश की राजनीति, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय समाचारों पर विशेष रूप से लेखन एवं संपादन कार्य कर रहे हैं।

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