सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति में समय की गणना बेहद वैज्ञानिक और सटीक है। अक्सर हम देखते हैं कि कुछ वर्षों में अचानक एक ऐसा महीना आ जाता है, जिसे ‘अधिक मास’, ‘मलमास’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है। एक आम व्यक्ति के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह अतिरिक्त महीना पंचांग में क्यों और कैसे जुड़ जाता है?
आइए, ज्योतिषीय गणना, तिथि और पौराणिक महत्व के आईने से समझते हैं इस विशेष महीने का पूरा गणित।
क्यों और कैसे आता है अधिक मास? (ज्योतिषीय गणना)
हिंदू कैलेंडर की रचना दो मुख्य गणनाओं के मेल से हुई है, सूर्य वर्ष (Solar Year) और चंद्र वर्ष (Lunar Year)। अधिक मास के निर्माण के पीछे इन दोनों के बीच का समय अंतराल ही मुख्य कारण है।
- सौर वर्ष : सूर्य एक राशि चक्र (12 राशियां) को पूरा करने में लगभग 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकंड (लगभग 365 दिन) का समय लेता है।
- चंद्र वर्ष : चंद्रमा की कलाओं पर आधारित चंद्र वर्ष में 12 महीने होते हैं, लेकिन एक चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का ही होता है।
- समय का अंतर : अगर आप ध्यान दें, तो सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिन, 1 घंटे और 14 मिनट का अंतर आ जाता है।
यदि इस अंतर को ठीक न किया जाए, तो हमारे त्यौहार और ऋतुओं का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा। उदाहरण के लिए, कुछ सालों बाद दीपावली गर्मी में और होली कड़ाके की ठंड में आने लगेगी। इसी अंतर को पाटने के लिए हर 32 महीने, 16 दिन और 4 घड़ी (लगभग 3 साल) के बाद चंद्र वर्ष में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। इसी को ‘अधिक मास’ कहते हैं।
पंचांग और तिथि का विशेष नियम : क्या है ‘संक्रांति’?
हिंदू पंचांग में अधिक मास की पहचान का एक अचूक नियम है, जिसे ज्योतिष में ‘संक्रांति’ कहा जाता है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना संक्रांति कहलाता है।
सामान्यत: हर चंद्र मास में एक बार सूर्य की संक्रांति (राशि परिवर्तन) अवश्य होती है।
मलमास की परिभाषा : जिस चंद्र मास के भीतर सूर्य की कोई भी संक्रांति नहीं होती (यानी सूर्य अपनी राशि नहीं बदलता), उस महीने को ‘अधिक मास’ या ‘मलमास’ घोषित कर दिया जाता है।
इसमें तिथियों की गणना सामान्य महीनों की तरह ही कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के रूप में होती है, लेकिन इस दौरान कोई नया चंद्र मास न मानकर चालू महीने को ही दो भागों में बांट दिया जाता है (जैसे- शुद्ध सावन और अधिक सावन)।
‘मलमास’ से ‘पुरुषोत्तम मास’ बनने की पौराणिक कथा
प्राचीन काल में इस अतिरिक्त महीने को ‘मलमास’ (मलिन मास) कहा जाता था क्योंकि इसमें सूर्य की संक्रांति नहीं होती। संक्रांति न होने के कारण इसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया, जिससे दुखी होकर इस महीने ने भगवान विष्णु की शरण ली।
भगवान विष्णु ने इस महीने के कष्ट को समझा और इसे अपना नाम ‘पुरुषोत्तमÓ प्रदान किया। तब से यह महीना ‘पुरुषोत्तम मासÓ कहलाया। भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि जो भी इस महीने में जप, तप, दान और पूजा करेगा, उसे अन्य महीनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होगा।
क्या करें और क्या न करें?
ज्योतिष शास्त्र और पंचांग के अनुसार, अधिक मास में ऊर्जा का प्रवाह अलग होता है, इसलिए क्रियाओं को दो भागों में बांटा गया है।
क्या न करें? (वर्जित कार्य)
- काम्य कर्म : विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत (जनेऊ) और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य।
- नया संचयन : नई संपत्ति या नए वाहन की खरीद (विशेष परिस्थितियों को छोड़कर)।
- नया व्यापार : किसी नए व्यवसाय या बड़े निवेश की शुरुआत।
क्या करें (पुण्य कार्य)
- नित्य कर्म : दैनिक पूजा-पाठ, संध्यावंदन और माता-पिता की सेवा।
आध्यात्मिक कार्य : श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण, महामृत्युंजय मंत्र का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ। - दान-पुण्य : दीपदान, वस्त्र दान, और भूखे जीवों को अन्न-जल देना।
निष्कर्ष : वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता का संगम
अधिक मास केवल एक काल-गणना का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह इंसानी जीवन को ठहरकर आत्मनिरीक्षण करने का अवसर देता है। जहां एक ओर यह पंचांग को ऋतुओं के अनुकूल बनाए रखने की खगोलीय शुद्धता (Astronomical Precision) है, वहीं दूसरी ओर यह सांसारिक भागदौड़ से दूर होकर ईश्वर की भक्ति में लीन होने का एक ‘बोनस महीना’ है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में अधिक मास को संन्यास, साधना और शुद्धि का सबसे उत्तम काल माना गया है।










