- अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

बॉलीवुड की ‘डांसिंग डिवा’ माधुरी दीक्षित। नाम सुनते ही आँखों के सामने तेज़ाब का गीत ‘एक दो तीन….’और हम आपके हैं कौन का ‘माई नी माई मुडेर पे तेरे बोल रहा है कागा…’, तैरने लगता है । लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस सुपरस्टार के बनने की कहानी उतनी ही फिल्मी है जितनी उनकी कोई ब्लॉकबस्टर फिल्म? और इस कहानी का सबसे अहम किरदार न कोई डायरेक्टर है, न कोई प्रोड्यूसर – बल्कि एक ऐसा शख्स है जिसने पर्दे के पीछे रहकर माधुरी की किस्मत का सितारा चमकाया। नाम है रिक्कू राकेशनाथ। आज का यह लेख, उसी रोमांचक, संघर्षमयी और चालाकी भरी कहानी पर आधारित है – जो खुद रिक्कू ने एक इंटरव्यू में बयान की थी। तो बन जाइए उस दौर के यात्री, जब माधुरी महज़ एक ‘स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस’ थीं।
वो पहली मुलाकात – एक हेयरड्रेसर बनी भाग्य का सूत्रधार
साल 1984 के आसपास। माधुरी दीक्षित मुंबई के चांदीवली स्टूडियो में एक टीवी शो ‘पेइंग गेस्ट’ की शूटिंग कर रही थीं। उन दिनों वो एक संघर्षशील अभिनेत्री थीं, जिनके पास कोई बड़ी फिल्म नहीं थी। स्टूडियो में उनकी हेयरड्रेसर थीं – खातून। यही खातून बनी उनकी किस्मत की पहली कड़ी। खातून उससे पहले सलमा आग़ा की हेयरड्रेसर हुआ करती थीं। और सलमा आग़ा के ज़रिए उनकी मुलाकात रिक्कू राकेशनाथ से हुई, जो उस वक्त एक मैनेजर/सेक्रेटरी के तौर पर काम कर रहे थे। खातून ने रिक्कू से कहा, “एक लड़की है – बेहद टैलेंटेड, चेहरा शानदार, बस थोड़ा सा मौका चाहिए।”
रिक्कू एक दिन चांदीवली स्टूडियो पहुंचे। वहाँ माधुरी अपने सीन की शूटिंग कर रही थीं। बस कुछ देर उन्हें परफॉर्म करते देखा और रिक्कू दंग रह गए। आत्मविश्वास, बॉडी लैंग्वेज, चेहरे के भाव – सब कुछ असाधारण। शूटिंग खत्म होते ही उन्होंने माधुरी से उनके घर का नंबर ले लिया।
मराठी सिंपल फ़ैमिली और फोन पर पहली डेट
एक दिन रिक्कू को माधुरी ने फोन किया और वह उन्हें अपने घर बुलाया। रिक्कू पहुंचे तो सबसे पहले उन्होंने माधुरी की माँ से मुलाकात की और संकोच में चाय पी। बाद में एक इंटरव्यू में रिक्कू ने कहा – “उस दिन मुझे लगा कि ये एकदम आम मराठी परिवार है। कोई दिखावा नहीं, कोई अभिनय नहीं। बिल्कुल सिंपल।” उसी दौरान खातून ने माधुरी का परिचय बड़े फिल्मकार सुभाष घई से भी करवाया। घई उस वक्त ‘कर्मा’ फिल्म बना रहे थे और एक छोटे डांस सीक्वेंस के लिए किसी डांसर एक्ट्रेस की जरूरत थी। माधुरी ने वो डांस सीन शूट भी किया – लेकिन कर्मा के फाइनल एडिटिंग में वो सीन हटा दिया गया।
हालाँकि, सुभाष घई उनके टैलेंट से इतना प्रभावित हुए कि उन्हें लगा – “इस लड़की को छोटे से रोल में दिखाना उसके साथ अन्याय होगा।” उन्होंने माधुरी को अपनी अगली फिल्म ‘उत्तर-दक्षिण’ में लीड हीरोइन के तौर पर लिया। यहाँ तक कि घई ने कई अन्य डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स को भी माधुरी का नाम सिफारिश के तौर पर दिया।
वो फर्जी चालाकी भरा विज्ञापन
रिक्कू उन दिनों अनिल कपूर का काम भी देख रहे थे। उन्होंने अनिल के भाई और प्रोड्यूसर बोनी कपूर से माधुरी के बारे में बात की। फिर एक दिन बोनी और रिक्कू सुभाष घई के ऑफिस पहुंचे। वहाँ एक मीटिंग हुई और एक मास्टरस्ट्रोक खेला गया। इन तीनों ने तय किया कि स्क्रीन मैगज़ीन में एक विज्ञापन (पेड आर्टिकल) दिया जाएगा। उस विज्ञापन में लिखा होगा कि – “एफ.सी. मेहरा, यश चोपड़ा, शशि कपूर, अशोक ठकेरिया जैसे बड़े प्रोड्यूसर्स माधुरी के साथ फिल्म बनाने जा रहे हैं। वो एक उभरता हुआ सितारा है।” लेकिन सच ये था कि उस वक्त इनमें से कोई भी प्रोड्यूसर माधुरी के साथ कोई फिल्म नहीं बना रहा था। ये एक केवल हाइप क्रिएट करने वाला फर्जी दावा था। लेकिन इसने काम कर दिखाया – इंडस्ट्री में माधुरी का नाम एक नए अंदाज में गूंजने लगा।
‘अबोध’ की फ्लॉप और पोर्टफोलियो का जादू
1984 में माधुरी की पहली फिल्म ‘अबोध’ आई। यह राजश्री प्रोडक्शन्स की फिल्म थी, लेकिन यह बुरी तरह फ्लॉप रही। माधुरी और रिक्कू ने फैसला किया कि वो खुद थिएटर में जाकर यह फिल्म नहीं देखेंगे। रिक्कू को डर था कि अगर माधुरी का काम उन्हें निराश कर गया, तो वो उनका सेक्रेटरी बने रहने पर सवाल उठाने लगेंगे। लेकिन असली मास्टरप्लान शुरू हुआ अबोध के फ्लॉप होने के बाद। रिक्कू ने उस वक्त इंडस्ट्री के टॉप फोटोग्राफर्स – जैसे जे.पी. सिंघल, राकेश श्रेष्ठ, जयेश सेठ – से माधुरी का एक बेहतरीन पोर्टफोलियो बनवाया। यह पोर्टफोलियो बाद में कई डायरेक्टर्स को दिखाया गया और इसने माधुरी की छवि को ‘ग्लैमरस और टैलेंटेड’ के तौर पर स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
वह एपिसोड – जहां एक विज्ञापन में ऊपर-नीचे ने तय कर दी किस्मत
माधुरी के करियर का टर्निंग पॉइंट थी ‘तेज़ाब’। लेकिन यह फिल्म उन्हें कैसे मिली – इसकी कहानी रोमांचक है।
रिक्कू ने उस वक्त माधुरी को टी रामा राव की फिल्म ‘खतरों के खिलाड़ी’ में साइन करवाया, जिसमें धर्मेंद्र, संजय दत्त, चंकी पांडे और नीलम थे। फिल्म के अखबारी विज्ञापन में माधुरी का नाम सबसे नीचे लिखा गया था। रिक्कू को यह गुस्सा दिला गया। उनका तर्क था – “माधुरी को संजय दत्त (जो कि सेकेंड लीड हैं) के अपोजिट रखा गया है, तो उसका नाम ऊपर होना चाहिए।”
टी रामा राव ने कहा – “नाम सीनियोरिटी के हिसाब से लगाए गए हैं। नीलम इस मामले में सीनियर हैं।”
रिक्कू ने चुनौती स्वीकार कर ली। वह पहुंचे रमेश बहल के पास – जिन्होंने नीलम की डेब्यू फिल्म ‘जवानी’ बनाई थी। रमेश बहल ने उन्हें ‘जवानी’ की रिलीज़ डेट का लिखित पत्र दे दिया। फिर रिक्कू पहुंचे राजश्री प्रोडक्शंस के ऑफिस और उन्होंने ‘अबोध’ की रिलीज़ डेट का लिखित पत्र भी ले लिया। तथ्य यह था कि ‘अबोध’ (1984 में ही रिलीज़) ‘जवानी’ से पहले रिलीज़ हुई थी। यानी माधुरी नीलम से सीनियर थीं। रिक्कू ने यह सबूत टी रामा राव के सामने रख दिया। नतीजा – माधुरी का नाम नीलम से ऊपर लिखा गया। और यहीं से एंट्री होती है ‘तेज़ाब’ की।
एन. चंद्रा उर्फ़ चंद्रशेखर नरवेकर – पुराने दोस्त ने बढ़ाया हाथ
राजश्री के ऑफिस में रिक्कू की मुलाकात अपने पुराने दोस्त चंद्रशेखर नरवेकर से हुई। आप उन्हें एन. चंद्रा के नाम से जानते हैं – फिल्म ‘तेज़ाब’ के डायरेक्टर। वे उस वक्त गुलज़ार साहब के असिस्टेंट हुआ करते थे। उस दिन एन. चंद्रा ने रिक्कू को बताया कि वे अनिल कपूर को लेकर एक फिल्म बना रहे हैं और उनके अपोजिट कोई नई हीरोइन लेंगे। रिक्कू ने तुरंत माधुरी की तस्वीरें दिखाईं। एन. चंद्रा उन्हें नहीं पहचानते थे। उन्होंने माधुरी का कोई काम देखने की इच्छा जताई। रिक्कू ने राजश्री से रिक्वेस्ट की कि एन. चंद्रा को ‘अबोध’ की कुछ क्लिप्स दिखाई जाएं। लंच ब्रेक में वो क्लिप्स लगाई गईं। माधुरी का डांस देखकर एन. चंद्रा इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत उन्हें ‘तेज़ाब’ में साइन कर लिया। अनिल कपूर को जब पता चला तो उन्होंने कहा – “वो अच्छी दिखती है, लेकिन कैबरे डांसर जैसी बिल्कुल नहीं लगती।” लेकिन बाद में अनिल ने भी माना कि माधुरी में गजब का टैलेंट हैं। ऑडिशन हुआ, जिसमें बाबा आज़मी कैमरा संभाल रहे थे। माधुरी पास हो गईं। और फिर 1988 में तेज़ाब रिलीज़ हुई – और उस साल का सबसे बड़ा ब्लॉकबस्टर साबित हुई।
असली सुपरस्टार कौन था? माधुरी या रिक्कू?
तेज़ाब के बाद माधुरी का सितारा इतना चमका कि हर तरफ सिर्फ ‘माधुरी-माधुरी’ हो गई। लेकिन यह मत भूलिए कि वह सब संभव हुआ रिक्कू राकेशनाथ की रणनीति, जिद और स्मार्टनेस की वजह से। अगर उस दिन रिक्कू खतरों के खिलाड़ी के विज्ञापन में नाम ऊपर कराने के लिए न भिड़ते, तो शायद एन. चंद्रा से उनकी मुलाकात नहीं होती। अगर वह पोर्टफोलियो नहीं बनवाते, तो शायद माधुरी को कोई और फिल्म सुपरस्टार बनाती – लेकिन कहानी कुछ और ही होती। रिक्कू ने यह पूरी कहानी पत्रकार पैट्सी एन. को एक इंटरव्यू में बताई थी। और यह हमें सिखाती है कि सफलता के पीछे सिर्फ टैलेंट ही नहीं, बल्कि सही लोगों का सही समय पर मिलना और उस मौके को पहचानने वाली चतुराई भी जरूरी होती है।
निष्कर्ष
माधुरी दीक्षित के अंदर टैलेंट था, जुनून था, चेहरा और डांस था – इसमें कोई शक नहीं। लेकिन लाखों टैलेंटेड लोगों में से कुछ ही सुपरस्टार बन पाते हैं। उनमें से एक माधुरी हैं, क्योंकि उन्हें रिक्कू राकेशनाथ जैसा कोई मिला – जिसने उनकी हर एक्टिंग पर विश्वास किया, हर छोटी-बड़ी बात के लिए संघर्ष किया, और उनकी किस्मत को एक पोर्टफोलियो, विज्ञापन और जिद से नई दिशा दी। आज माधुरी भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित अभिनेत्रियों में से एक हैं। और इस सफर के एक अहम हिस्से में, पर्दे के पीछे, खड़ा था एक शख्स – रिक्कू राकेशनाथ।
दोस्तों, किस्मत उनका साथ देती है, जो मेहनत और सही मौके को पहचानना जानते हैं।











