अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

बॉलीवुड का सिनेमा हमेशा से मसाला, भावना और चमत्कारों का बाजार रहा है। इन्हीं चमत्कारों में सबसे दिलचस्प है डबल रोल का जादू। एक ही अभिनेता, एक ही फिल्म, और दो पूरी तरह से अलग किरदार। कभी जुड़वाँ भाई-बहन, कभी बाप-बेटा, तो कभी गरीब-अमीर।
लेकिन क्या आपने सोचा है कि बॉलीवुड ने इस कॉन्सेप्ट को कितना आगे बढ़ा दिया है? अमिताभ बच्चन ने एक फिल्म में अपने ही बाप और बेटे का रोल एक साथ किया। गोविंदा ने एक फिल्म में छह-छह किरदार निभा डाले। हेमा मालिनी से लेकर श्रीदेवी तक ने डबल रोल को आइकॉनिक बनाया।
तो चलिए, आज इस लेख में हम डबल रोल फिल्मों की यात्रा करेंगे, बल्कि यह भी जानेंगे कि बिना VFX के पुराने जमाने में यह कैसे होता था, और कैसे गोविंदा ने ‘हद कर दी आपने’ में सबको चौंका दिया।
भाग 1: तकनीकी जादू – फिल्मों में डबल रोल कैसे किये जाते हैं?
पर्दे पर एक ही अभिनेता को दो जगह देखना भले ही सहज लगे, लेकिन इसके पीछे घंटों की मेहनत और तकनीकी समझ होती है। पुराने ज़माने में यह कठिन था, आज VFX ने इसे आसान किया है।
तीन मुख्य तरीके:
1. बॉडी डबल (Body Double) – पुराना और भरोसेमंद तरीका
एक्टर के जुड़वाँ जैसे दिखने वाले स्टैंड-इन को दूसरे रोल में खड़ा कर दिया जाता था। कैमरा ऐसे एंगल पर होता कि चेहरा न दिखे। बाद में डबिंग से चेहरे का मिलान किया जाता। फिल्म ख़ुद्दार के कई सीन ऐसे ही बनाए गए।
2. स्प्लिट-स्क्रीन (Split Screen) – क्लासिक तरीका
कैमरा एक ही जगह फिक्स किया जाता। पहले एक्टर एक रोल में (जैसे बाएं तरफ) अपने डायलॉग बोलता। फिर कैमरे को हिलाए बिना, कपड़े और मेकअप बदलकर वही एक्टर दूसरा रोल (दाएं तरफ) करता। एडिटिंग में दोनों को जोड़ दिया जाता। सीता और गीता इसी तकनीक का बेहतरीन उदाहरण है।
3. डिजिटल VFX – आधुनिक और यथार्थवादी
ग्रीन स्क्रीन पर एक्टर पहले एक किरदार के रूप में परफेक्ट परफॉर्मेंस देता है। फिर बिल्कुल उसी टाइमिंग के साथ दूसरा किरदार। VFX आर्टिस्ट कंप्यूटर पर दोनों को मर्ज करते हैं। दबंग 2 और हद कर दी आपने में इसी तकनीक का इस्तेमाल हुआ।
महत्वपूर्ण: एक्टर को दोनों किरदारों के बोलने, चलने, आवाज़ और सांस लेने के तरीके में बिल्कुल अंतर लाना पड़ता है। सबसे मुश्किल होता है आँखों का कॉन्टैक्ट बैठाना, क्योंकि दूसरे एक्टर के खाली जगह पर होने का अंदाजा लगाना पड़ता है।
भाग 2: बॉलीवुड की 7 सबसे धमाकेदार डबल रोल (और मल्टी रोल) फिल्में
1. सीता और गीता (1972) – जब हेमा मालिनी ने पूरे बॉलीवुड को सिखाया सबक
अभिनेता: हेमा मालिनी
कहानी: अलग हुई जुड़वाँ बहनें – एक डरपोक सीता (आँखें झुकाकर रखना, सहमी हुई चाल), दूसरी दबंग गीता (सीधी नज़र, तेज़ कदम)।
क्यों खास है? यह पहली बार था जब किसी हीरोइन ने डबल रोल को इतनी शिद्दत से किया। गीता का डायलॉग – “तुझे अपनी औकात पता नहीं है बिच्छू” – आज भी ट्रेंड करता है। हेमा मालिनी ने खुद कहा था कि दोनों रोल के बीच स्विच करने के लिए उन्हें एक घंटे का समय चाहिए होता था। स्प्लिट-स्क्रीन तकनीक का बेहतरीन उदाहरण।
2. ख़ुद्दार (1982) – अमिताभ बच्चन का दो ध्रुवी अभिनय
अभिनेता: अमिताभ बच्चन
कहानी: एक भाई ईमानदार सिपाही (विक्रम सिंह), दूसरा बदमाश गैंगस्टर (गंगा सिंह)।
क्यों खास है? अमिताभ ने एक ही फिल्म में अच्छाई और बुराई के चरम को छुआ। फिल्म का क्लाइमेक्स जहाँ दोनों आमने-सामने होते हैं, वह सीन बॉलीवुड इतिहास का मास्टरपीस है। इस फिल्म में बॉडी डबल का कुशलता से उपयोग किया गया।
3. आखरी रास्ता (1986) – अमिताभ बच्चन का ट्रिपल धमाका
अभिनेता: अमिताभ बच्चन
कहानी: एक क्राइम थ्रिलर जहाँ अमिताभ ने तीन रोल किए –
• रोल 1: दादा (बुजुर्ग, गरजती आवाज़)
• रोल 2: बेटा (मिडिल एज एक्शन हीरो)
• रोल 3: पोता (छोटी सी उपस्थिति)
क्यों खास है? सोचिए, एक सीन में अमिताभ बूढ़े बाप के रूप में गुस्सा कर रहे हैं और अगले सीन में उसी के बेटे के रूप में दौड़ लगा रहे हैं। जहाँ वह अपने ही साथ सीन कर रहे हैं, वहाँ स्प्लिट-स्क्रीन और बॉडी डबल दोनों का जादू देखने को मिलता है। यह फिल्म सिखाती है कि डबल रोल का मतलब सिर्फ जुड़वाँ नहीं, बल्कि एक ही परिवार की अलग-अलग पीढ़ियाँ भी हो सकती हैं।
4. चालबाज़ (1989) – श्रीदेवी की बहुरूपिया कला
अभिनेत्री: श्रीदेवी
कहानी: दो एक जैसी लड़कियाँ – एक शरारती (मंजू), एक सीधी-सादी (अंजू) – पहचान बदल-बदल कर गुंडों को चकमा देती हैं।
क्यों खास है? श्रीदेवी का कॉमेडी टाइमिंग और एक्सप्रेशन गजब का था। एक सीन में वह रो रही हैं, दूसरे में ठहाके लगा रही हैं। इस फिल्म ने दिखाया कि डबल रोल एक्शन और ड्रामा तक सीमित नहीं, बल्कि कॉमेडी और थ्रिल में भी धमाल मचा सकता है।
5. फैमिली नंबर 1 (1999) – गोविंदा की कॉमेडी का अनोखा नमूना
अभिनेता: गोविंदा
कहानी: दो जुड़वाँ – एक ड्राइवर (मुरली – नोच-खसोट वाली चाल, गंदा कुर्ता), दूसरा मालिक (गोपी – स्टाइलिश सूट, ठसक भरा अंदाज़)।
क्यों खास है? गोविंदा ने दोनों रोलों में बॉडी लैंग्वेज पूरी तरह बदल दी। मुरली ज़मीन पर पैर घसीटते चलता है, गोपी अकड़कर। एक ही एक्टर के दो अलग-अलग चलने के तरीके देखना मज़ेदार है। यह स्प्लिट-स्क्रीन का शानदार उदाहरण है।
6. हद कर दी आपने (2000) – गोविंदा ने बनाया रिकॉर्ड – एक फिल्म में छह रोल
अभिनेता: गोविंदा
रोल्स की लिस्ट (तैयार हो जाइए):
1. राजू – गरीब मगर ईमानदार हीरो
2. प्रिंस – राजू का जुड़वाँ अमीर भाई (छड़ी घुमाता, नाक ऊंची करके बोलता)
3. बंटी – एक बच्चा! (गोविंदा मुंह बनाकर बच्चे जैसी हरकतें करते हैं)
4. मामा जी – बुजुर्ग रिश्तेदार (सफेद बाल, लाठी, धीमी आवाज़)
5. डॉन – गैंगस्टर (काले चश्मे, गर्दन झटकते हुए)
6. अंडरकवर एजेंट – अंत में एक ट्विस्ट वाला किरदार
क्यों है यह बॉलीवुड का सबसे अनोखा मामला?
भाई साहब, जहाँ दो रोल करने में एक्टर के पसीने छूट जाते हैं, वहाँ गोविंदा ने छह अलग-अलग वेशभूषा, छह अलग-अलग चाल, छह अलग-अलग आवाज़ और छह अलग-अलग मूड के साथ परफॉर्म किया। फिल्म के क्लाइमेक्स में जब ये सारे किरदार एक साथ दिखते हैं, तो दर्शक हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं। उस ज़माने में VFX उतने उन्नत नहीं थे, फिर भी एडिटिंग और गोविंदा की मेहनत ने इसे संभव बनाया। बॉलीवुड में किसी एक्टर द्वारा एक फिल्म में सबसे अधिक रोल करने का रिकॉर्ड आज भी गोविंदा के नाम है। ‘हद कर दी आपने’ ने वाकई हद कर दी थी!
सिर्फ दो नहीं, बल्कि तीन, छह और पूरा परिवार
बॉलीवुड ने दिखा दिया कि वह चीन के ब्रूस ली या हॉलीवुड के एडी मर्फी (जिन्होंने ‘द नट्टी प्रोफेसर’ में सात रोल किए) से कम नहीं है।
- अमिताभ बच्चन (आखरी रास्ता): एक ही फिल्म में तीन पीढ़ियाँ।
- गोविंदा (हद कर दी आपने): एक फिल्म में छह अलग-अलग इंसान।
ये फिल्में बताती हैं कि डबल रोल कोई जुगाड़ नहीं, बल्कि अभिनय और तकनीक का संगम है। एक्टर को अगर कला आती है, तो वह स्क्रीन पर पूरा खेल खड़ा कर सकता है।
डबल रोल करना इतना मुश्किल क्यों होता है?
1. टाइमिंग का खेल: एक सीन को दो बार बिल्कुल उसी गति और भाव से करना पड़ता है। अगर पहली बार में नज़र दाएं गई और दूसरी बार में बाएं, तो सीन फेल।
2. आवाज़ का अंतर: एक किरदार की आवाज़ भारी, दूसरे की पतली। गोविंदा ने ‘हद कर दी आपने’ में 6 अलग-अलग टोन में डायलॉग बोले थे।
3. बॉडी लैंग्वेज: एक किरदार सीधा चलता, दूसरा कुबड़ा होकर। एक तेज़ बोलता, दूसरा हकलाकर।
4. मेकअप और कॉस्ट्यूम: हर रोल के लिए अलग मेकअप में 1-2 घंटे लग जाते हैं।
मजेदार तथ्य: फिल्म ‘हद कर दी आपने’ के सेट पर गोविंदा को एक ही दिन में 4-5 बार मेकअप और पोशाक बदलनी पड़ती थी। एक सीन के लिए वह बच्चे की तरह तो दूसरे सीन के लिए बूढ़े मामा की तरह तैयार होते थे।
निष्कर्ष
तो दोस्तों, बॉलीवुड में डबल रोल की परंपरा ‘सीता-गीता’ से लेकर’हद कर दी आपने’ तक – हर दशक में नए रंग बदलती रही है।
डबल रोल सिर्फ चमत्कार नहीं है – यह मेहनत, कला और टेक्नोलॉजी का संगम है। अगली बार जब आप कोई डबल रोल फिल्म देखें, तो जरा सोचिएगा कि उस एक सीन को बनाने में कितने घंटे लगे होंगे, कितनी बार एक्टर को री-टेक करना पड़ा होगा।











