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ऐसी होती है पर्यावरण मित्र होली, बीस वर्ष से है जुनून

ऐसी होती है पर्यावरण मित्र होली, बीस वर्ष से है जुनून

इटारसी। नर्मदापुरम (Narmadapuram) जिले के ग्राम सुपरली निवासी किसान योगेन्द्रपाल सिंह सोलंकी (Yogendrapal Singh Solanki) विगत दो दशक से पर्यावरण एवं वनों को बचाने के लिए पर्यावरण मित्र होली (Environment friend Holi) का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

इस अभियान में छह वर्षों तक भोपाल (Bhopal) के रोशनपुरा चौराहे पर होलिका दहन (Holika Dahan) किया गया, साथ ही मुंबई मैराथन (Mumbai Marathon) में दो वर्ष तक गोबर निर्मित होली की लकड़ी के साथ मैराथन की। इसके अलावा इटारसी से भोपाल, बाड़ी बरेली, रायसेन से भोपाल तक ढाई सौ किलोमीटर की होली मैराथन भी की।
अब वे अपने गांव में ही गोबर से निर्मित लकड़ी की होली (Holi) जलाते आ रहे हैं। वे स्वयं गोबर और कृषि अवशेष से इस लकड़ी का निर्माण करते हैं और गांव के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। श्री सोलंकी बताते हैं कि इस तरह की होली में पशुधन के गोबर एवं फसल के अवशिष्ट नरवाई या कचरा के मिश्रण से लकड़ी बनायी जाती है जिससे होली का निर्माण किया जाता है।

ऐसा है उनका आकलन

योगेन्द्रपाल सिंह सोलंकी का अनुमान है कि देश में छह लाख गांव एवं पंद्रह हजार शहर हैं। शहरों में एक ही दिन में 20 लाख होलिका उत्सव होते हैं तो एक होली में पांच से दस क्विंटल लकड़ी जलेगी तो करोड़ों टन लकड़की एक दिन में खाक हो जाती है। इतनी लकड़ी के लिए करीब डेढ़ सौ हेक्टेयर भूमि के वन नष्ट होते हैं, इसलिए प्रतिवर्ष वनभूमि का क्षेत्रफल घट रहा है।

शासन से है ये अपेक्षा

श्री सोलंकी की शासन से अपेक्षा है कि होली की उनकी गोबर की लकड़ी वाली विधि को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए ताकि वनों का विनाश रोकने की पहल की जा सके। इस वर्ष वे नर्मदापुरम के संगठनों को भी लकडिय़ां देंगे और कुछ गांवों को भी स्वयं द्वारा निर्मित लकडिय़ां देने वाले हैं।

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AUTHORRohit

I am a Journalist who is working in Narmadanchal.com.

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