कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी (या देवोत्थान एकादशी) के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के शयन (योगनिद्रा) के बाद जागते हैं, और इसी के साथ विवाह जैसे सभी मांगलिक कार्य पुन: शुरू हो जाते हैं। देवउठनी एकादशी पर ही तुलसी विवाह की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें माता तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम (विष्णु का एक रूप) से कराया जाता है।
एकादशी कब है : तिथि और शुभ मुहूर्त
एकादशी की तिथि (2025 के अनुसार)
- देवउठनी एकादशी तिथि आरंभ : शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025 को रात्रि 10 बजकर 53 मिनट से।
- एकादशी तिथि समाप्त : शनिवार, 1 नवंबर 2025 को रात्रि 10 बजकर 45 मिनट पर।
पूजा का शुभ मुहूर्त
- चूंकि एकादशी तिथि का उदय (सूर्य उदय) शनिवार, 1 नवंबर को हो रहा है, इसलिए व्रत और तुलसी विवाह शनिवार, 1 नवंबर 2025 को ही मनाया जाएगा।
- देवउठनी एकादशी/तुलसी विवाह 1 नवंबर 2025 (शनिवार) 7 प्रात: काल: 06:33 से 07:54 बजे तक, संध्या काल : 05:43 बजे से 07: 20 बजे तक
दो दिन के पर्व का असमंजस कैसे खत्म होगा?
कई बार एकादशी तिथि दो दिन तक चलती है, जिससे भक्तों में यह असमंजस पैदा होता है कि व्रत किस दिन रखा जाए। इस स्थिति को समाप्त करने के लिए शास्त्र सम्मत नियम हैं-
- व्रत का नियम : हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत उदय तिथि के अनुसार रखा जाता है। यदि एकादशी तिथि सूर्योदय के समय मौजूद है, तो उसी दिन व्रत रखा जाता है।
- समाधान : चूँकि 31 अक्टूबर को एकादशी तिथि रात में शुरू हो रही है, और 1 नवंबर (शनिवार) को सूर्योदय के समय उपस्थित है, इसलिए एकादशी का व्रत और मुख्य पूजा 1 नवंबर 2025 को ही की जाएगी।
- पारण (व्रत खोलने) का नियम : एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है।
- पारण का समय : 2 नवंबर 2025 (रविवार) को सुबह 06:34 बजे के बाद।
- इस वर्ष (2025) 1 नवंबर, शनिवार को देवउठनी एकादशी का व्रत और तुलसी विवाह करना सबसे उत्तम और शास्त्र सम्मत रहेगा।
तुलसी-शालिग्राम विवाह का महत्व
तुलसी और शालिग्राम का विवाह हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसे धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से पवित्र माना जाता है।
- श्री हरि की जागृति और विवाह का आरंभ : यह विवाह भगवान विष्णु के चार महीने की योगनिद्रा से जागने का प्रतीक है। इसके बाद से ही गृह प्रवेश, विवाह, मुंडन जैसे सभी मांगलिक और शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है।
- पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति : मान्यता है कि तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराने से भक्तों को कन्यादान के समान पुण्य मिलता है। इससे जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है।
- सुखी वैवाहिक जीवन : जिन दंपतियों को वैवाहिक जीवन में कठिनाई आती है या संतान सुख में विलंब हो रहा है, वे यदि श्रद्धा से यह विवाह संपन्न कराते हैं, तो उनके जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है।
- शालिग्राम और तुलसी का संबंध : तुलसी को माता लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है, जबकि शालिग्राम भगवान विष्णु का निराकार स्वरूप हैं। उनका विवाह प्रकृति और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है, जो सृष्टि के चक्र को आगे बढ़ाता है।
यह पर्व न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह शीतकाल के आगमन और नई फसल की तैयारी का भी संकेत देता है, जो भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है।








