रितेश राठौर, केसला। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। एसडीओ फॉरेस्ट अनिल विश्वकर्मा और उनके स्टाफ पर दो ग्रामीणों को कथित तौर पर अवैध रूप से बंधक बनाकर थर्ड डिग्री टॉर्चर देने और बिजली के झटके लगाने के गंभीर आरोप लगे हैं। हमारा गांव संगठन ने इसे वन विभाग का जंगल राज करार देते हुए दोषियों पर तत्काल कार्यवाही की मांग की है।
31 मार्च से 2 अप्रैल तक दी गई यातनाएं
शिकायत के अनुसार, ग्राम भोबदा निवासी रामचरण चौहान और चिचवानी निवासी डोरीलाल लविष्कार को 31 मार्च से 2 अप्रैल तक वन विभाग की कस्टडी में रखा गया। पीडि़तों का आरोप है कि इस दौरान लकड़ी बेचने का झूठा अपराध कबूल कराने के लिए उन पर दबाव बनाया । जब उन्होंने मना किया, तो उन्हें बिजली के झटके लगाए गए और जातिसूचक गालियां देते हुए बेरहमी से मारपीट की गई। पीडि़तों ने बताया कि अंतत: उनसे कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करवाकर उन्हें कोर्ट में पेश किया गया।
मामले में प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद पीडि़तों का मेडिकल लीगल सर्टिफिकेट कराया गया है, जिसमें शरीर पर गंभीर चोटों के निशान पाए गए हैं। हमारा गांव संगठन के प्रदेश संयोजक दुर्गेश धुर्वे ने बताया कि मेडिकल रिपोर्ट से वन विभाग की बर्बरता स्पष्ट हो चुकी है। आवेदन और मेडिकल प्रक्रिया में देरी के कारण पीडि़त पक्ष पुलिस अधीक्षक कार्यालय नहीं पहुंच सका, लेकिन अब संगठन गांव-गांव बैठक कर बड़ी रणनीति तैयार कर रहा है।
संगठन और पीडि़तों की प्रमुख मांगें
- दोषियों पर केस दर्ज हो : मेडिकल रिपोर्ट और पीडि़तों के बयान के आधार पर एसडीओ और उनके साथियों पर एससी-एसटी एक्ट, अवैध प्रताडऩा और मारपीट की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की जाए।
- झूठा मुकदमा खारिज हो : बिना किसी तथ्य और जब्ती के आदिवासियों पर दर्ज किए गए लकड़ी चोरी के मुकदमे को तुरंत निरस्त किया जाए।
इस घटना के बाद से ही पूरे क्षेत्र में आदिवासी समाज और स्थानीय ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही प्रशासनिक कार्यवाही नहीं हुई, तो वे आंदोलन को उग्र रूप देंगे। स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने कानून को हाथ में लेकर इस तरह की प्रताडऩा कैसे दी।










