अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक , ब्लॉगर

सुरों की रानी, आशा भोसले (8 सितंबर 1933 – 12 अप्रैल 2026) ने 92 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह दिया है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस महान गायिका ने 12,000 से अधिक गीतों को अपनी आवाज़ दी और दशकों तक संगीत जगत पर राज किया। उनके निधन से भारतीय संगीत के स्वर्णिम युग के एक और अध्याय ने अपनी समाप्ति की घोषणा कर दी है।
सुरों की मल्लिका: एक संक्षिप्त परिचय
आशा गणपतराव भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को प्रसिद्ध मंगेशकर परिवार में हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक जाने-माने रंगमंच कलाकार और शास्त्रीय गायक थे, जिन्होंने उन्हें कम उम्र से ही संगीत की शिक्षा दी। वह लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं। उनके करियर की शुरुआत 1943 में हुई और उन्होंने आठ दशकों में 20 से अधिक भारतीय भाषाओं में 12,000 से अधिक गीत गाए।
आशा भोसले ने अपने करियर में दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, सात फिल्मफेयर पुरस्कार, और 2008 में भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त किए। 2000 में, उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च पुरस्कार है। 1997 में उन्हें दो ग्रैमी पुरस्कारों के लिए भी नामांकित किया गया था।
आशा-पंचम की अप्रतिम जोड़ी
आशा भोसले का नाम संगीतकार आर. डी. बर्मन (पंचम दा) के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। उनकी पहली मुलाकात 1950 के दशक के अंत में हुई थी। आशा जी ने एक बार एक साक्षात्कार में बताया था, “उस लड़के ने मुझसे ऑटोग्राफ मांगा, कहा कि उसने रेडियो पर मेरा मराठी नाट्य संगीत सुना था”। उनकी पेशेवर साझेदारी जल्द ही एक गहरे व्यक्तिगत बंधन में बदल गई, और 1980 में दोनों ने शादी कर ली।
साथ में, उन्होंने ऐसे कालजयी गीत बनाए जो आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं – ‘दम मारो दम’, ‘चुरा लिया है तुमने’, ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘मेहबूबा मेहबूबा’ और ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’। पंचम दा ने आशा जी की आवाज़ की बहुमुखी प्रतिभा को समझा और उन्हें कैबरे, पॉप और रॉक लय के साथ प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे उन्होंने पारंपरिक पार्श्वगायन की सीमाओं को तोड़ा।
जब आशा जी ने सुदेश भोसले को ढूंढा
यह किस्सा प्रसिद्ध मिमिक्री कलाकार और गायक सुदेश भोसले ने एक पॉडकास्ट में बताया था।
उनके अनुसार, कहानी है वर्ष 1986 के आसपास की। उस समय मेरा ऑर्केस्ट्रा, ‘मेलडी मेकर्स’, मुंबई में छोटे-मोटे शो करता था। हम उन संगीतकारों में से थे जो किसी भी समय, जितनी भी रिहर्सल करने को कहो, बिना किसी शिकायत के करते थे। हमें किशोर दा (किशोर कुमार) का साथ भी मिला हुआ था, जिनके साथ हम पिछले कई वर्षों से काम कर रहे थे। हमारे पास 500 गाने कंठस्थ थे। एक दिन आशा जी ने हमारे मैनेजर विजय देसी से कहा कि वह हमारा ऑर्केस्ट्रा सुनने आना चाहती हैं। उन्हें अच्छे संगीतकारों की जरूरत थी जो उनके साथ सहयोग कर सकें। किशोर दा ने ही उन्हें हमारे बारे में बताया था।
वह ऐतिहासिक शो
वह दिन मुंबई के शम्मुखानंद हॉल में एक निजी शो का था। हाउसफुल शो था। लाइटें बुझीं और शो शुरू हुआ। हर गाने के बाद, आशा जी, जो अपनी बहू और बेटी के साथ चुपके से ऑडियंस में बैठी थीं, अपने सहायक को भेजकर अलग-अलग वाद्य यंत्रों के टुकड़े बजवाने लगीं। वह हर संगीतकार को परख रही थीं।
उस रात मैं जो कर रहा था, वह कुछ अलग था। मैं अमित जी की नकल करूं, मैं रफी साहब का गाना गाऊं, किशोर दा, हेमंत दा, एसडी बर्मन की आवाज़ की नकल करूं। मैंने एक के बाद एक नकलें कीं और हर बार ‘वन्स मोर’ की मांग होती रही।
बाद में पता चला कि आशा जी तालियाँ बजा रही थीं और खूब हँस रही थीं। इंटरवल से पहले ही वह चली गईं। हम सबको लगा कि शायद वह ग्रीन रूम में आएंगी और हम आशीर्वाद लेंगे, लेकिन वह तो जा चुकी थीं।
एक अविश्वसनीय सुबह: पंचम दा का फ़ोन
इंटरवल के बाद हमारा उत्साह कुछ कम हो गया था, लेकिन हमारे मैनेजर ने आकर बताया, “जाते वक्त आशा जी ने तुम्हारे बारे में पूछा – ये लड़का कौन है?” मुझे विश्वास नहीं हुआ। सोचा, शायद मजाक कर रहे हैं।
सुदेश भोसले पॉडकास्ट में कहते हैं, उसके बाद हमारे एल्बम में आशा जी ने चार गाने गाए। रिकॉर्डिंग के दौरान मैंने उनके पैर छुए और नमस्कार किया। उन्होंने मुझे पहचाना और कहा, “अरे हाँ। उस दिन तुमने एसडी बर्मन और अमिताभ बहुत अच्छा किया था।”
फिर उन्होंने मुझसे वही एसडी बर्मन का गाना दोबारा सुनाने को कहा। मैं डर के मारे काँप रहा था। मैंने आँखें बंद कर लीं और भगवान का नाम लिया। और फिर गाना शुरू किया – “ओ रामा रे, ओ रमा, झोली में बिठाई के, कहाँ लाए झूठे सजना के द्वार…” (फिल्म ‘अमर प्रेम’ का गीत)।
गाना खत्म हुआ तो मैंने आँख खोली। आशा जी अपने हाथों से चेहरा ढके बैठी थीं। हाथ हटाया तो दोनों आँखों से आँसू बह रहे थे। मराठी में बोलीं, “तुमने तो ऐसा गाया कि मुझे लगा सचिन दा (एसडी बर्मन) सामने खड़े हैं।” मैं हैरान रह गया।
पंचम दा का आशीर्वाद
उन्होंने रिकॉर्डिंग करवाई और अगले दिन सुबह 7 बजे मेरे पास फ़ोन आया। पंचम दा के ऑफिस से। पंचम दा ने बुलाया था! मैं फटाफट पहुँचा। उनके म्यूजिक रूम में पंचम दा, आशा जी, मन्ना दा, बसु दा – पूरी टीम बैठी थी।
पंचम दा ने कहा, “बेवकूफ, तुम मेरे बाप की आवाज़ में गाते हो!” फिर उन्होंने बताया कि आशा जी ने जब नहाते समय मेरी कैसेट लगाई, तो उन्हें लगा कि उनके पिताजी (एसडी बर्मन) बाथरूम के बाहर खड़े होकर गा रहे हैं। और पिताजी को गुजरे कई साल हो चुके थे। आधे तौलिये में बाहर निकले थे, कि कौन है? आशा जी बोलीं, “आपके पिताजी का एक नया लड़का है।”
पंचम दा ने तुरंत फैसला किया – 10 दिन बाद बैंकॉक में शो है, और तुम हमारे साथ चल रहे हो।
सुन मेरे बंधु रे
बैंकॉक में ‘आशा भोसले, आर. डी. बर्मन और सुदेश भोसले’ के नाम से शो हुआ। जब मैंने ‘सुन मेरे बंधु रे’ गाया, तो पंचम दा ने मुझे गले लगा लिया और कहा, “बॉम्बे जाकर पहला गाना तुम्हारे साथ रिकॉर्ड करूंगा।”
वापस आकर 1988 में फिल्म ‘जलजला’ से मेरा बॉलीवुड में पहला ब्रेक मिला। और उसके बाद जब तक पंचम दा थे, हर शो में मैं शामिल था। आशा जी आज भी हर शो में मुझे अपने साथ ले जाती हैं। वह कहती हैं, “तू रहेगा तो मैं कंफर्टेबल रहूंगी।”
निष्कर्ष
आशा भोसले सिर्फ एक गायिका नहीं थीं; वह एक संस्था थीं, एक ऐसी कलाकार जिसने सात दशकों तक भारतीय संगीत को नई दिशा दी। 12 अप्रैल 2026 को ब्रीच कैंडी अस्पताल में कार्डियक अरेस्ट और मल्टी-ऑर्गन फेल्योर से उनका निधन हो गया। उनकी आवाज़ ने जितने दिलों को छुआ, उतनी ही गहराई से उन्होंने नए प्रतिभाओं को भी संवारा। सुदेश भोसले उनके इसी स्नेह और समर्पण के प्रतीक हैं – एक ऐसा कलाकार जिसे आशा जी ने पहचाना, प्यार दिया और उसका करियर बनाया। उनके जाने से संगीत की दुनिया में जो रिक्ति आई है, उसे कभी नहीं भरा जा सकता। उनकी मखमली आवाज़ और उनके अमर गीत सदियों तक हमारे बीच जीवित रहेंगे।
आशा भोसले की पुण्यात्मा को कोटि-कोटि नमन!










