इटारसी। बीते दिवस, शिक्षा के प्रांगण जीनियस प्लानेट स्कूल में, ‘स्पीक मैके‘ के पावन मंच से, दिल्ली से पधारी नृत्यांगना सुश्री अभिशिकता मुकोपाध्याय ने केवल नृत्य नहीं किया, बल्कि काल और गति के दर्शन को मूर्तरूप दिया। यह आयोजन मात्र सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, अपितु शिक्षा और संस्कृति के समन्वय का एक दिव्य क्षण था।
दीप से दीप और भाव से भाव का मिलन
कार्यक्रम का आरंभ हुआ, जहां नृत्यांगना ने अपने हाथों से नहीं, बल्कि आत्मा के प्रकाश से सरस्वती पूजन हेतु दीप प्रज्वलन किया। यह कला के ‘आदि स्रोत’ के प्रति समर्पण था। स्कूल संचालक मो. जाफर सिद्दीकी और प्राचार्य मनीता सिद्दीकी ने ‘अतिथि देवो भव:’ की प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए इस देहधारी कला-साधिका का स्वागत किया।
ताल की यात्रा और समय का विमर्श
सुश्री अभिशिकता ने विद्यार्थियों को केवल ‘मुद्राएं’ नहीं सिखाईं, बल्कि मनुष्य के नौ रसों—प्रेम, हास्य, करुणा, क्रोध—के माध्यम से मानव अस्तित्व के रंगों से परिचय कराया। उन्होंने विद्यार्थियों को सिखाया कि कैसे ताल की एक थिरकन समय को विभाजित करती है, और कैसे देह ‘तोड़ो और ताल’ के माध्यम से अनंत शून्य में एक पैटर्न बुनती है।
जब उन्होंने ‘अर्धनारीश्वर’ की विधा को प्रदर्शित किया, तो यह केवल नृत्य नहीं था; यह शिव और शक्ति के द्वैत (Duality) का दर्शन था, जहां पुरुष और प्रकृति एक होकर ब्रह्मांड की रचना करते हैं। उनकी प्रस्तुति ‘यमुना किनारे नाचत कन्हैया’ में, उन्होंने दिखाया कि कैसे एक पदचाप से समूची प्रकृति, काल और प्रेम की कहानी बुनी जा सकती है। इस क्षण, स्कूल का सभागार शांत हो गया, क्योंकि वहां केवल नृत्य नहीं हो रहा था, बल्कि छात्र कथक के माध्यम से जीवन के दर्शन को सुन रहे थे।

इस दार्शनिक यात्रा के साक्षी बनने के लिए स्पीक मैके अध्यक्ष हेमंत शुक्ला ‘मधुभैया’ और समन्वयक सुनील बाजपेई उपस्थित थे। उन्होंने उस क्षण की पवित्रता को समझा, जब नृत्य केवल मनोरंजन न रहकर आत्मा की अभिव्यक्ति बन जाता है। समापन पर, स्मृति चिन्ह भेंट किया गया, जो भौतिक वस्तु न होकर, उस अविस्मरणीय अनुभव का एक छोटा सा प्रतीक था, जो कला ने ज्ञान के इस मंदिर में रोपित किया। यह कार्यक्रम एक मूक आह्वान था, कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि कला के माध्यम से जीवन की लय और सौंदर्य को भी समझे।








