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विश्व साइकिल दिवस विशेष : पहियों पर घूमती जिंदगी, पर्यावरण की सांसें और सेहत का ‘सत्य’

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  • ‘जब आप पैडल मारते हैं, तो आप सिर्फ आगे नहीं बढ़ते, बल्कि आप इस धरती को थोड़ा और जीने का वक्त देते हैं।’

इटारसी। आज ‘विश्व साइकिल दिवस’ है। सन् 2018 में जब संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन की नींव रखी थी, तब उद्देश्य सिर्फ एक सवारी को बढ़ावा देना नहीं था, बल्कि इंसानी वजूद को यह याद दिलाना था कि तकनीकी विकास की अंधी दौड़ में हमने अपनी सेहत और इस नीले ग्रह दोनों को दांव पर लगा दिया है। वैश्विक ऊर्जा संकट और बढ़ते प्रदूषण के इस दौर में, साइकिल महज एक माध्यम नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक मुकम्मल दर्शन बन चुकी है।

हमारे शहर इटारसी के कुछ जागरूक नागरिकों ने इस दर्शन को सिर्फ समझा नहीं, बल्कि अपनी सांसों में उतारा है। वे रोज पैडल मारकर न सिर्फ अपनी कैलोरी बर्न कर रहे हैं, बल्कि इस शहर की आबोहवा में घुलते जहर को भी कम कर रहे हैं। आइए मिलते हैं इटारसी के इन ‘इको-वॉरियर्स’ से, जिनकी जिंदगी साइकिल के दो पहियों के सहारे समाज को नई राह दिखा रही है।

आस्था और फिटनेस का अनूठा संगम : सौरभ दुबे (38 वर्ष)

38 साल के युवा सौरभ दुबे ने साइकिलिंग को अपनी आध्यात्मिक और शारीरिक यात्रा का हिस्सा बना लिया है। पिछले 56 हफ्तों से उनका एक नियम कभी नहीं टूटा—हर मंगलवार साइकिल उठाकर कीरतपुर स्थित 11 मुखी हनुमान जी के दर पर पहुंच जाना।
साइकिल यात्रा : आना-जाना मिलाकर कुल 26 किलोमीटर।
उपलब्धि : नियमित साइकिलिंग से उन्होंने अपना 15 किलो वजन कम किया है। वे सलकनपुर, तिलक सिंदूर, नर्मदापुरम और आंवली घाट जैसे दूरस्थ धार्मिक स्थलों की यात्रा भी पैडल मारकर कर चुके हैं।

70 पार भी थमा नहीं जुनून : ‘साइकिल बाबा’ चंदवानी 71 वर्ष

उम्र महज एक आंकड़ा है, इसे साबित किया है इटारसी के 71 वर्षीय किशन चंदवानी ने। वे रोज 30 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं। आसपास के ग्रामीण इलाकों में बच्चे उन्हें प्यार से ‘साइकिल बाबा’ कहते हैं। जब वे अपनी साइकिल पर एक छोटा सा स्पीकर लगाकर, पुराने नगमे गुनगुनाते हुए सड़कों से गुजरते हैं, तो मानो ठहर चुकी जिंदगी में फिर से रवानगी आ जाती है।

एक नज़र

  • कार्बन फुटप्रिंट : एक कड़वा सच (प्रति किलोमीटर उत्सर्जन)
  • कार : 153 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड
  • बाइक : 46 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड
  • साइकिल : 00 ग्राम (पूर्णत: इको-फ्रेडली)

35 साल से ‘ग्रीन कम्यूट’ के प्रणेता : शिक्षक सोलंकी

भीलाखेड़ी के शिक्षक बृजमोहन सिंह सोलंकी पिछले 35 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण का लाइव पाठ पढ़ा रहे हैं। वे रोज गांव से इटारसी (लगभग 15 किमी) साइकिल से आते-जाते हैं। उनका गणित सीधा और गहरा है, ‘मोटरबाइक और कारें धरती का दम घोंट रही हैं। साइकिल शून्य कार्बन उत्सर्जन के साथ चलती है। पर्यावरण सुधरेगा, तो हमारा अस्तित्व बचेगा, और स्वास्थ्य लाभ तो इसमें बोनस है।’

82 की उम्र में योग और साइक्लोथॉन का जज्बा : गुप्त

रिटायर्ड शिक्षक और योगाचार्य रामवल्लभ गुप्त (82 वर्ष) इस उम्र में भी युवाओं को मात देते हैं। वे नियमित ई-साइकिल चलाते हैं और कई साइक्लोथॉन (साइकिल रैलियों) में शहर का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। श्री गुप्त का मानना है कि उनकी इस दीर्घायु और स्फूर्ति के पीछे साइकिल का सबसे बड़ा योगदान है।

क्यों जरूरी है पैडल मारना?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट भी साइकिल के इस जीवन-दर्शन पर मुहर लगाती है। आँकड़े बताते हैं कि रोज 30 मिनट साइकिल चलाने से हृदय रोगों का खतरा 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है। जब पैरों से पैडल चलते हैं, तो दिमाग में अवसाद कम होता है और मानसिक शांति मिलती है। यह खराब कोलेस्ट्रॉल और शुगर लेवल को नियंत्रित करने का सबसे सस्ता और प्रभावी नुस्खा है।

वैश्विक ईंधन संकट के इस दौर में, जहां सड़कें वाहनों के शोर और धुएं से कराह रही हैं, वहां साइकिल की चेन की सरसराहट एक उम्मीद की तरह है। इटारसी के ये नायक हमें सिखाते हैं कि प्रकृति से जुडऩे के लिए हमें बहुत बड़े बदलावों की जरूरत नहीं है, बस गैरेज में खड़ी उस साइकिल की धूल झाडऩे और एक पैडल मारने की देर है।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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