यात्रा वृतांत: श्रीनाथ धाम से हुआ आगाज, मीरा के गिरधर गोपाल पर विराम

प्रसंग-वश- चंद्रकांत अग्रवाल। वैष्णव सम्प्रदाय के पीठाधीन देव श्रीनाथ जी का धाम, उदयपुर राजस्थान से 49 किलोमीटर दूर जिस स्थान पर स्थित है, वहां अब नाथद्वारा नाम से एक शहर विकसित हो गया है। पुष्टि मार्ग अर्थात कृपा के मार्ग के परमगुरु श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा अपने प्रभु के अलौकिक दर्शन व सानिध्य से पोषित इस भक्तिमार्ग व भक्ति योग के अनुयायियों के लिए अपने नाथ का यह धाम स्थापित किया गया, जिसे बाद में उनके पुत्र विठ्ठलनाथ जी ने श्रीनाथ धाम के रूप में प्रतिष्ठित किया। श्री विग्रह 7 वर्ष के बाल कृष्ण का है। चूंकि मेरा परिवार भी पुष्टिमार्गीय वैष्णव है, लिहाजा ट्रैन द्वारा चित्तोडगढ़़ आने के तुरन्त बाद रात 3 बजे ही हम अपनी गाड़ी से नाथद्वारा के लिए रवाना हो गए, ताकि श्रीनाथजी के दिव्य मंगला दर्शन हो सकें।पुष्टि मार्ग के इतिहास के अनुसार कलयुग में 1549 में श्रीनाथ जी ने वल्लभाचार्य जी को दर्शन दिए व गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की प्रेरणा दी। प्रभु प्रतिमा का मूल चेहरा व हाथ गोवर्धन पर्वत से ही उभरा था।

सर्वप्रथम श्रीनाथजी की दिव्य व अलौकिक प्रतिमा का प्राकट्य गोकुल में ही हुआ था। फिर औरंगजेब के हमलों से बचाकर वल्लभाचार्य जी उनको उत्तरप्रदेश से राजस्थान ले गए व जिस स्थान पर प्रभु प्रेरणा हुई, वहीं बन गई नाथद्वारा की यह हवेली , जिसकी सुरक्षा तब मुस्लिम काल में आततायियों को दूर रखने उदयपुर के तत्कालीन सत्रहवीं शताब्दी में मेवाड़ के राणा राजसिंह के 1 लाख सैनिक करते थे। 20 फरवरी 1672 को मन्दिर हवेली का निर्माण पूर्ण हुआ।

श्रीनाथ जी मन्दिर में सत्रहवीं शताब्दी से लेकर आज तक भी कई चमत्कार होते देखे गए हैं। मुगल बादशाह नादिर शाह ने जब प्रतिमा में लगे अरबों के हीरों को प्राप्त करने गलत नीयत से मन्दिर में प्रवेश करना चाहा तो 9 सीढिय़ां चढ़ते ही वह अंधा हो गया। बाद में आत्मग्लानि होने पर जब उसने उन 9 सीढिय़ों को अपनी पलकों से साफ किया तब जाकर उसकी आँखों की रोशनी वापस आई। आज भी अम्बानी जैसे कई बड़े उद्योगपति घराने कोई भी कार्य प्रारम्भ करने के पूर्व श्रीनाथ जी को मत्था टेक करके आते हैं। अम्बानी परिवार द्वारा यहां बनाकर फिर मन्दिर ट्रस्ट को सौंपने वाले आलीशान धीरज धाम के एक सूट , बड़े कमरे में ही मैंने सपरिवार 9 घण्टे बिताए।

कपिल मुनि को बिंदु सरोवर से प्राप्त श्री द्वारिकाधीश की एक अन्य दिव्य चतुर्भुज स्वरूप प्रतिमा को बाद में महाप्रभु वल्लभाचार्य जी द्वारा श्री दामोदरदास जी से प्राप्त कर कांकरोली में विराजित किया गया। नाथद्वारा यात्रा के उपरांत हमने उसी कांकरोली में श्री द्वारिकाधीश जी के दिव्य राजभोग दर्शन किये।
कांकरोली से फिर हम रवाना हुए माउंट आबू के लिए। अधिकांश लोग इसे एक हिल स्टेशन के रूप में मौज मस्ती की सैर गाह के रूप में ही जानते हैं। पर ऐसा नहीं है। यह स्थान एक बड़ा आध्यात्मिक चेतना का केंद्र भी है। क्योंकि यहीं भगवान विष्णु के अवतार श्री दत्तात्रेय जी का जन्म व साधना का अध्यात्म शिखर है, तो माँ का शक्तिपीठ भी। माउंट आबू स्थित श्री कात्यायनी शक्ति पीठ में काफी ऊंचाई पर पर्वत शिखर पर माँ अर्बुजा देवी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। इस भव्य मंदिर को राजस्थान व आसपास के प्रदेशों में माँ वैष्णो देवी जैसी उच्च श्रद्धा, प्रतिष्ठा का स्थान प्राप्त है, ऐसा ज्ञात हुआ।

राजस्थान से सटी गुजरात की सीमा पर बांसकांठा में 1200 वर्ष पुराना माँ अम्बा का एक ऐसा शक्तिपीठ मन्दिर है, जहां श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार हुआ था तो श्री राम ने भी शक्ति प्राप्त की थी। यहां माँ के यंत्र जिसे लोग श्री यंत्र भी कहते हैं, की पूजा होती है। इसे इस तरह सजाया जाता है कि ऐसा लगता है कि मानों माँ का कोई दिव्य स्वरूप स्थापित है। नवरात्र उपरांत एकादशी पर भी माँ के हजारों भक्त कतारबद्ध हो बड़े ही अनुशासन व प्रेम से दर्शन कर रहे थे। अपन ने भी पहली बार माँ के ऐसे दिव्य अलौकिक दर्शन किये, जिनको सिर्फ आंखों से नहीं देखा जा सकता, बल्कि आपकी माँ के प्रति प्रेम ब भक्ति से ही माँ के सानिध्य सौभाग्य का अहसास हो पाता है। मुझे लगा कि यहां भक्ति, आस्था व प्रेम के चरम के धरातल पर खड़े होकर ही सार्थक दर्शन सम्भव हैं।

गुजरात में सिरोही – पिंडवाड़ा रष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 14 पर ग्राम विरवाड़ा से दक्षिण दिशा में, सभी शक्तिपीठ में प्रथम माना जाने वाला विश्वविख्यात दाता अम्बा जी आदि स्थल है। जहां माँ आरासुरी की पूजा साधना एक नाभि कमल चक्र के स्वरूप में होती है। प्राचीन मंदिर जो आज भी पहाड़ी के उतंग शिखर पर है , जाया त्रिशूल की पूजा होती है। यहीं से माँ अम्बिका बाद में अपनी मुख्य आराधिका व साधिका के वृद्ध हो जाने व पर्वत शिखर पर चढऩे में असमर्थ होने पर पहाड़ी की तलहटी में एक श्याम रंग के यंत्र रूप में दर्शन दिए थे, जिसका उल्लेख कल मैंने विगत दिनों सोशल मीडिया पर अम्बा जी के मंदिर का जिक्र करते हुए किया था। अर्बुदारण्य प्रदेश के आरासुर नामक पर्वत शिखर पर माँ

अम्बिका के भुवनमोहन नाम का यह शक्तिपीठ है, जहां माँ सती के परम पावन ह्रदय का एक भाग गिरा था, अत: उसी अंग की पूजा आज भी होती है। करीब 300 सीढिय़ों से चढ़कर न जाने वालों के लिए करीब 30 उडऩखटोले भी यहां हैं, जिनमें बैठकर जाना भी अपने आप में एक अदभुद अनुभव था मेरे लिए तो, सभी के लिए होता होगा। हिन्दू धर्म में साकार प्रतिमा स्वरूप की उपासना के आलोचक कान खोलकर सुनें, हिंदू धर्म में शिव के बाद शक्ति की पूजा उपासना भी त्रिशूल, यंत्र आदि निराकार शक्ति स्वरूपों में होती है। हर साल करोड़ों माँ के भक्त यहां आकर माँ की ममता का अलौकिक अहसास महसूस करते हैं। मूलत: तो हमारी अपने भीतर की आत्म शक्ति के जागरण की साधना होती हैं, मातृ शक्ति की सभी पूजा साधनाएं।

माउंट आबू स्थित श्री प्रजापिता ब्रम्हकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय संस्था के हेड क्वार्टर इंटरनेशनल पीस हॉल में एक टाइम क्लॉक लगी हैं जिसके अनुसार अगले 15 वषों बाद भारत व विश्व में युग परिवर्तन हो जाएगा। हम सब कलयुग में रहकर ही उस युग परिवर्तन के साक्षी बनेंगे या फिर प्रलय जैसा कुछ होगा, यह तो उनको भी नहीं पता। मेरे सवाल करने पर उन्होंने कहा कि हम भी आपकी तरह ही अपने अपने चिंतन से ज्ञान के क्षेत्र में विद्यार्थी ही हैं। विस्तार से कभी लिखूंगा अपने कॉलम में।
नाथद्वारा से प्रारम्भ हुई यात्रा का अंतिम पड़ाव पापांकुशा एकादशी के दिन मीरा के गिरधर गोपाल माने जाने वाले,नानी बाई का मायरा भरने यह रुप धारण करने वाले सांवलिया सेठ के सानिध्य का था। लोक कथा में कहा जाता है कि संत दयाराम की जमात ने मीरा बाई के बाद प्राप्त दिव्य प्रतिमा को औरंगजेब के आततायी सैनिकों से बचाने बांगुड

भादसोडा के एक खुले मैदान में एक वट वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर पधरा दिया था। कालांतर में सन 1840 में मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नामक ग्वाले को स्वप्न आया तो तदनुसार उसे यहां खुदाई में एक जैसी 4 प्रतिमाएं मिलीं। सभी बहुत मनोहारी थीं। सबसे बड़ी मूर्ति भादसोड़ा में प्रसिद्ध संत पुराजी भगत की प्रेरणा से मीरा बाई के मेवाड़ परिवार के भींडर ठिकाने की तरफ से वर्तमान सांवलिया सेठ मन्दिर में विराजित किया गया। मंझली मूर्ति वहीं प्राकट्य स्थल पर पधरा दी गई तो सबसे छोटी मूर्ति भोलाराम गुर्जर ने अपने घर के परिंडे में विराजित कर दिया तो चौथी मूर्ति निकालते वक्त ही खण्डित हो गई थी।

सांवलिया सेठ कहने के पीछे कारण यह कि श्री कृष्ण के इस स्वरूप को सेठों के सेठ के रूप में माना जाता है। इस मंदिर में सेवा प्रार्थना से, प्रभु के सानिध्य से कई साधारण लोग सेठ बन गए, विदेशों में सफल बिजनेसमैन बनकर बस गए। जिन्होंने सांवलिया सेठ को मानसिक संकल्प कर अपना बिजनेस पार्टनर बना लिया व ईमानदारी से अपनी आय का तय हिस्सा मन्दिर संचालन समिति को देने लगे। जिसके कारण अब वहां अक्षरधाम जैसा भव्य मंदिर परिसर बनकर तैयार हो रहा है। करीब 1 किलोमीटर से भी अधिक लम्बाई है मन्दिर की। सांवरिया का चरणामृत व तुलसी दल गर्भ गृह से पाकर सार्थक हुए अपने दर्शन।

चंद्रकांत अग्रवाल (Chandrakant Agrawal)

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