इटारसी।
क्या यह वक्त प्रयोग करने का है?, या ये समझें कि इसके माध्यम से हम कफ्र्यू की ओर बढ़ रहे हैं। प्रशासन के प्रयास नाकाफी हैं। प्रशासन की कार्यप्रणाली बता रही है कि करीब चार दिन तक कोशिशों के बावजूद आमजन सही रास्ते पर नहीं आया और आदेशों का लगातार उल्लंघन कर रहा है तो प्रशासन ने हथियार डाल दिये। उसके कार्यप्रणाली से लगता है कि अधिकारियों ने सोच लिया है कि नहीं मान रहे तो जाओ। हम भी कुछ नहीं करते। क्योंकि जो प्रयास हो रहे, महज रस्म अदायगी से अधिक प्रतीत नहीं हो रहे हैं। एक दिन लाठियां भांजी, इसके बाद कुछ नहीं। अफसर कुछ घंटे बाजार में रहते हैं, उनके जाते ही मैदानी अमला भी घर की ओर रवानगी डाल देता है, जबकि अफसरों को थोड़े-थोड़े अंतराल पर अपने अमले को आकर जांचना भी चाहिए। यदि हम बदले नहीं तो तस्वीर में बदल जाएंगे।
दो दिन तीन घंटे की सुबह 6 से 9 बजे की ढील में भीड़ को नियंत्रित नहीं कर पाने वाला प्रशासन समय बदलकर भी सफल नहीं हो सका। केवल सब्जी मंडी में होने वाली भीड़ तीसरे दिन नहीं हुई। लेकिन, जिन फुटकर सब्जी विक्रेताओं को मोहल्लों में जाना था, वे भारतीय स्टेट बैंक चौराह से सूरजगंज चौराह तक रोड के दोनों ओर दुकान लगाकर बैठ गये। इन दुकानों पर भी ग्राहकों की भीड़ जुटने लगी और यह रोड भीड़भरा हो गया। हालात बदले नहीं बल्कि उनका स्थान बदल गया। सब्जी मंडी से नगर पालिका कार्यालय के इर्दगिर्द और पुराना फल बाजार, तुलसी चौक। नगर पालिका का राजस्व अमला मार्किंग करके ही प्रसन्न है, कुछ हद तक इसमें सफलता मिली। लेकिन, शेष स्थानों पर क्या?
कहावत है, लातों के भूत बातों से नहीं मानते। जैसा व्यवहार शहर के कुछ लोग दिखा हरे हैं, उससे लगता है कि प्रशासन के हाथ में डंडा होना ही चाहिए। यदि निषेधाज्ञा में बाजार की सूरत-ए-हाल नहीं बदले तो निश्चित मानो, शहर कफ्र्यू की ओर जाएगा। जयस्तंभ के आसपास बाजार में दुकानों के सामने मार्किंग तो हो गयी, लेकिन जिन दुकानों को नहीं खुलना चाहिए, वे भी खुलीं और प्रशासन इनको बंद कराने की जेहमत ही नहीं उठा रहा है। ऐसे में एकदूसरे को देखकर दूसरी दुकानें भी खुलेंगी और पूरा बाजार ही खुल जाएगा। अधिकारियों की कार्यप्रणाली ऐसी लगती है कि वे खुद को इस शहर का मान नहीं रहे हैं, बस रस्म अदायगी हो रही है। शहर का सबसे ज्यादा जलील होने वाला दुकानदार का व्यवहार ऐसा है जैसे उसके घर में बिना दुकान खुले चूल्हा ही नहीं जलता है। कमला नेहरु पार्क के पास जैन जनरल स्टोर, सुबह 6 बजे से बराबर खुल जाता है। इसको देख आज संस्कृत पाठशाला के पास एक गिफ्ट की दुकान महेश वाच एंड गिफ्ट सेंटर खुल गया। सामने मोबाइल की कई दुकानें खुल गयीं। इन दुकानदारों का कहना है कि खुद प्रशासन ने अनाउंस कराके सुबह 8 से 11 बाजार खोलने की अनुमति दी है। जब यह कहा कि यह केवल अति आवश्यक चीजों के लिए है तो जवाब देते हैं, ठीक है, कोई बंद कराने आया तो बंद कर देंगे। अब यदि हमारे शहर के दुकानदारों और ग्राहकों का ऐसा व्यवहार और सोच नहीं बदली तो कोरोना जैसे घातक वायरस से जीतना मुश्किल हो जाएगा। अभी इसका शहर में प्रवेश नहीं हुआ है, यदि एक बार हो गया तो इस तरह के लोगों के कारण हमारी हार निश्चित है। जीतना है, तो खुद को बदलना होगा और सरकार के निर्देशों पर अमल करना होगा। उम्मीद है, लोग समझेंगे और हम जीतेंगे।
गांवों में लोग समझ रहे
गांव के पुराने लोगों में से ज्यादातर स्कूल भी नहीं गये होंगे, लेकिन वे समझते हैं कि परिवार के लिए जिंदगी की कीमत क्या है? खुद की चिंता नहीं है, आप मौत से नहीं डरते हैं। लेकिन, यह विचार करें कि आप खुद की चिंता नहीं भी कर रहे हैं तो परिवार के प्रति भी लापरवाह हैं। क्योंकि बाहर आकर वायरस के वाहक बनेंगे और उसे अपने घर ले जाकर परिवार के सदस्यों के शरीर में मेहमान बना देंगे। खुद के जीवन की चिंता नहीं है, परिवार की जान जोखिम में क्यों डालते हैं। यह बात गांव के लोग बखूबी समझ रहे हैं। केसला ब्लाक के पथरोटा, केसला और चौकीपुरा से आयी तस्वीरें बता रही हैं कि गांव का प्रशासन शहर के प्रशासन से ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर रहा है।
क्या यह प्रयोग करने का वक्त है? बदले नहीं तो तस्वीर बनोगे


Rohit Nage
Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.
For Feedback - info[@]narmadanchal.com






