बताया पारंपरिक खेती के फायदे
इटारसी। ग्राम पंचायत जमानी के सभागार में आज जाने-माने जैविक एवं पारंपरिक खेती विशेषज्ञ और बुंदेली साहित्यकार बाबूलाल दाहिया ने एक किसान गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि देश में हरित क्रांति आई थी, भुखमरी मिटाने लेकिन अंधाधुंध रसायनों के प्रयोगों और बढ़ती लागत ने उल्टे परिणाम देने शुरू कर दिए हैं। किसानों की आत्महत्या उन्हीं इलाकों में हुई जहां उत्पादन लागत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के (कीटनाशक नींदानाशक) जहर के रूप में फैलाए गए जाल में किसान फंसे। जहां आज भी पारंपरिक खेती होती है, वहां कोई किसान आत्महत्या करके नहीं मरा। हमारे ही प्रदेश का मंडला जिला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। उत्पादन तो बढ़ा लेकिन लागत बेतहाशा बढ़ गई। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे पारंपरिक और जैविक खेती अपनाकर ही अपनी माली हालात सुधार सकते हैं। उन्होंने जानकारी देते हुए बतलाया कि उनके पास धान की लगभग 150 देशी प्रजातियां गेहूं की 15 उड़द, मूंग, चना, ज्वार, मक्का, कोदो कुटकी और सब्जियों की अनेकों प्रजातियां उपलब्ध हैं। वे किसानों को यह बीज बोने के लिए सवाए बिजाई पर उपलब्ध कराते हैं वे इन बीजों को बेचते नहीं है। इस अवसर पर उन्होंने अपने साथ लाए धान के पौधे किसानों को दिखाते हुए कहा कि इन देशी पौधों ने सूखा भी सहन कर लिया और अतिवृष्टि भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। उन्होंने धान पर किए शोधों के प्रणेता डॉ रिछारिया, जो होशंगाबाद जिले के ही नंदरबाड़ा गांव के रहने वाले थे उनको याद किया. इस अवसर पर लगभग 10 -15 किसानों ने इसी वर्ष से जैविक खेती अपनाने का संकल्प लिया। इस अवसर पर डॉ केएस उप्पल, बाबा मायाराम एवं बड़ी संख्या में किसान उपस्थित थे।
जैविक खेती वाले किसान नहीं करते आत्महत्या
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