इटारसी। नगर के तृतीय अपर जिला न्यायालय के न्यायाधीश श्री आदित्य रावत की अदालत ने यूपी निवासी दो महिलाओं को एक नाबालिग का अपहरण करके उत्तरप्रदेश ले जाकर वहां रोककर रखने के आरोप में तीन-तीन वर्ष की सजा एवं अर्थदंड से दंडित किया है।
अपर लोक अभियोजक राजीव शुक्ला ने बताया कि 15 जून 2022 को अवयस्क बालिका अपने 8 वी कक्षा का रिजल्ट लेने मालवीय गंज इटारसी से फ्रेन्ड्स कन्या हायर सैकेंडरी स्कूल दिन में अपनी दोस्त अम्मू जो कि आरोपी सुनीता की छोटी बेटी है, के साथ गई थी जो रात तक वापस नहीं आइ। पिता ने सुनीता के घर पर फोन से पूछा जिसमें पता लगा था कि उसकी पुत्री को मीना ने अपने साथ कासगंज यूपी अपहृत करके अपने लड़के आलोक से जबरन उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी करने लेकर गई है। पिता ने उसकी पुत्री के मोबाइल पर फोन किया था जो बंद बता रहा था। तब उसने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
पुलिस बालिका को यूपी कासगंज से दोनों आरोपी सुनीता जाटव एवं मीनाबाई के चंगुल से वापस इटारसी लेकर आयी। बालिका ने पुलिस को बताया था कि आरोपी सुनीता ने अपनी दोस्त मीणा की सुरक्षा में बंद करके संदोष अवरूद्ध करके तीन माह तक अपने घर में ही रखा था। उसके साथ जलती हुई लकड़ी से आरोपी सुनीता ने मारपीट की थी। इस सेशन केस में राज्य सरकार की ओर से पैरवी करने वाले एजीपी राजीव शुक्ला एवं भूरे सिंह भदौरिया ने कोर्ट में 11 गवाह के कथन कराए थे।
न्यायाधीश आदित्य रावत ने प्रकरण की संपूर्ण परिस्थितियों को मद्दे नजर आरोपी सुनीता जाटव को धारा 368 में 3 साल की सजा एवं एक हजार रुपए के जुर्माने से तथा धारा 324 में 6 माह के कठोर कारावास की सजा एवं एक हजार रुपए के जुर्माने से दंडित किया है। दूसरी आरोपी मीना बाई को धारा 363 में 2 साल एवं धारा 366 में 3 साल की सजा से दंडित किया है। साथ ही दोनों धाराओं में एक एक हजार रुपए के जुर्माने से दंडित किया है। जुर्माना अदा नहीं करने पर तीन तीन माह तक का कारावास और भुगताया जाएगा। दोनों सजाए साथ साथ चलेगी। आरोपों सुनीता जाटव जेल में 41 दिन बंद रही थी तथा आरोपी मीना बाई भी जेल में 28 दिन बंद रही थी। इसलिए उनकी सजा की अवधि में निरोध की अवधि समायोजित की जाएगी। दोनों आरोपी को एक माह के लिए जमानत दी गई है।
कोर्ट की टिप्पणी
यायालय के कर्तव्य के संबंध में दांडिक विधि का यह सर्वोच्च उद्देश्य है कि पर्याप्त, युक्तियुक्त, आनुपातिक दंड दिया जाए जो कि अपराध की प्रकृति और गम्भीरता तथा जिस तरीके से अपराध किया गया है उसके अनुरूप हो। दंड इतना कम नहीं होना चाहिए कि वह समाज की आत्मा को आघात पहुंचाए। यह न्यायालय का पवित्र कर्तव्य है कि वह दंड अधिरोपित करते समय एक उचित संतुलन बनाए क्योंकि वह कम दंड एक अपराधी की हिम्मत बढ़ाता है जिसके परिणाम स्वरूप समाज कष्ट उठाता है।









