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सिंधिया राजवंश रात्रि विश्राम नहीं करता उज्जैन में

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महाकाल से ही उज्जैन पहचाना जाता है – पं. विनोद दुबे

इटारसी। श्री दुर्गा नवग्रह मंदिर लक्कड़गंज में सावन मास में महाकाल ज्योर्तिलिंग का पूजन एवं अभिषेक मुख्य आचार्य पं. विनोद दुबे, पं. सत्येन्द्र पांडे एवं पं. पीयूष पांडे ने किया।
उज्जैन के क्षिप्रा तट पर स्थित विश्व विख्यात महाकाल ज्योर्तिलिंग अपनी खास विशेषताओं के लिए जाना जाता है। ग्वालियर का सिंधिया राजवंश आज भी महाकाल की नगरी में रात्रि विश्राम नहीं करता है और पूरी दुनिया के केवल महाकाल एवं कुंभ के कारण ही उज्जैन की पहचान है। भूगोल की कर्क रेखा भी इसी के पास से गुजरी है। आचार्य प.ं विनोद दुबे ने कहा कि सिंहासन बत्तीसी राजा विक्रमादित्य का आसन था। विक्रम संवत भी राजा विक्रमादित्य के नाम से जाना जाता है। उज्जैन ही एक ऐसा तीर्थ स्थल है जहां कृष्ण ने गुरू सांदीपनी के आश्रम में आकर शिक्षा ग्रहण की थी।
महाकाल ज्योर्तिलिंग को प्रतिदिन प्रातःकाल की आरती में ताजे शव की चिता की भस्म चढ़ाई जाती है जिसे भस्म आरती कहते हैं। आचार्य पं. विनोद दुबे ने कहा कि उज्जयिनी के नरेश चंद्रसेन पक्के शिव भक्त थे तथा उन्हें शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान था। महेश्वर के गण ने उन्हें एक चितामंणी भंेट दी थी जिस कारण देवता भी उनसे ईष्या रखते हैं। पं. दुबे ने कहा कि उज्जैन के आस-पास के राजाओं ने नरेश चंद्रसेन से इसीलिए मित्रता की क्योंकि चंद्रसेन को जीतना संभव नहीं था शिवजी का आशीर्वाद चंद्रसेन के साथ था।
पं. दुबे ने कहा कि उज्जैन के महाकाल की प्रमुख धार्मिक अवसरों पर सवारी निकाली जाती है खासकर सावन के प्रत्येक सोमवार को महाकाल की शाही सवारी निकाली जाती है। कुंभ के जो चार प्रमुख स्थान होते है उसमें भी महाकाल की विशेष सवारी निकाली जाती है।
पं. विनोद दुबे ने कहा कि मध्यप्रदेश में क्षिप्रा नदी के किनारे उज्जैन नगर वसा हुआ है जिसको इंद्रपुरी अमरावती या अवंतिका भी कहते है। उज्जैन निवासी शिव के उपासक एक ब्राम्हण के चार पुत्र थे। ब्रम्हा से वरदान प्राप्त एक दुष्ट दैत्यराज दूषण ने उज्जैन में आकर वहां के निवासी वैदिक र्ब्राम्हणों को बहुत प्रताड़ित किया परंतु शिवजी के ध्यान में लीन र्र्ब्राम्हण तनिक भी खिन्न नहीं हुए। दैत्यों के उत्पात से पीड़ित प्रजा ब्राम्हणों के पास आई वैदिक ब्राम्हणों ने प्रजाजनों को धीरज बंधाया और पुनः भगवान शिव की आराधना में लीन हो गये इसी समय ज्यांे ही दुष्ट दैत्य अपनी सेना सहित उन ब्राम्हणों पर झपटा तब ही पार्थिव मूर्ति के स्थान तक भयानक गर्जना के साथ धरती फटी और वहां गहरा गड्डा हो गया। जिसमें से शिवजी एक विराट रूप धारी महाकाल के रूप में प्रकट हुए उन्होंने एस दुष्ट को र्ब्राम्हणों के निकट न आने को कहा परंतु उस दुष्ट दैत्य ने शिव जी की आज्ञा नहीं मानी अतः शिवजी ने अपनी एक ही हुंकार से उस दैत्य को भस्म कर दिया। शिवजी को इस रूप में प्रकट हुआ देखकर ब्रम्हा विष्णु तथा अन्य देवताओं ने भगवान शंकर की वंदना की। पं. विनोद दुबे ने कहा कि रामजी के भक्त हनुमंत लालजी का भी उज्जेन से गहरा संबंध है जिस समय भगवान दुष्टों का संहार कर रहे थे उसी समस हनुमान जी भी उज्जैन आये और उन्होंने वहां के राजाओं को बताया कि भगवान भोलेनाथ के अलावा मनुष्य का उद्धार करने वाला अन्य कोई नहीं है।
उज्जैन नगरी संस्कृृति विघा की प्राचीन पीठ है तथा धर्म, ज्ञान और कला का अद्भुत संगम है लाखों श्रद्धालु सावन मास में भगवान शिव को प्रसन्न करने पवित्र नगरी उज्जैन आते है और धार्मिक लाभ प्राप्त करते है।
यजमान के रूप में गौहर पाल नामदेव एवं श्रीमती प्रतिभा नामदेव एवं गोपाल नामदेव रितिका नामदेव राधिका नामदेव ने महाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग का पूजन एवं रूद्राभिषेक किया। मुख्य आचार्य पं. विनोद दुबे, आचार्य पं. सत्येंद्र पांडेय एवं पं. पीयूष पांडेय पूजन एवं रुद्राभिषेक करा रहे हैं। आयोजन में सुनील दुबे शिक्षक, अमित मौर्य, नितिन अग्रवाल सहयोग कर रहे है। ।

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