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Hartalika Teej: पार्वती ने शिवजी को पाने के लिए किया था ये व्रत

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इटारसी। 9 सितंबर, गुरुवार को हरतालिका तीज और वराह जयंती मनाई जाएगी। भाद ये दिन शिवजी, देवी पार्वती और भगवान विष्णु की पूजा के लिए खास है। इस दिन तीज होने से महिलाएं सौभाग्य, समृद्धि और पति की लंबी उम्र की कामना के लिए शिवजी के साथ देवी पार्वती की पूजा और व्रत करेंगी। साथ ही इस दिन रोग-दोष और परेशानियों से मुक्ति के लिए भगवान विष्णु के शक्तिशाली वराह अवतार की पूजा भी की जाएगी। ये व्रत, इसमें रातभर जागरण के साथ की जाती है शिव-पार्वती की पूजा हिंदू पंचांग के मुताबिक हरतालिका तीज व्रत हर साल भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की तीसरी तिथि यानी तृतीया को मनाई जाती है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की रेत से बनाई मूर्तियों की पूजा करती हैं।

पार्वती जी ने किया था यह व्रत
इस व्रत को सबसे पहले पार्वती जी ने किया। जिससे उन्हें भगवान शिव पति के रूप में मिले थे। देवी पार्वती ने भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि पर हस्त नक्षत्र में शिवजी की अराधना की थी। इसीलिए इस तिथि को ये व्रत किया जाता है। सहेली को अलि और आलि कहा जाता है। सहेलियों ने पार्वतीजी का हरण किया इसलिए इसको हरतालिका व्रत कहते हैं, तभी से इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए और कुंवारी कन्याएं मनचाहे वरदान के लिए इस तीज का व्रत करती आ रही हैं। सखियां ये जानकर उन्हें घने जंगल में ले गईं वहां गुफा में पार्वती ने शिवलिंग बनाकर उपासना और अर्चना की उससे शिवजी प्रसन्न होकर देवी पार्वती के सामने प्रकट हुए और उन्हे पत्नी रूप में अपनाने का वचन देकर अदृश्य हो गए।

शिव-शक्ति और विष्णु पूजा का दिन
9 सितंबर को हरतालिका तीज (Haritalika teej) होने से भगवान शिव और देवी पार्वती की विशेष पूजा की जाएगी। इस दिन सुहागन महिलाएं सौभाग्य, समृद्धि और पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखेंगी। इसी दिन विष्णुजी के तीसरे अवतार यानी भगवान वराह की पूजा की जाएगी। गुरुवार, भगवान विष्णु का दिन होने से इसका महत्व और बढ़ जाएगा।

हरतालिका तीज
इस दिन महिलाएं निराहार रहकर शाम के समय स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण कर पार्वती और शिव की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजन की संपूर्ण सामग्री से भगवान शिव एवं पार्वती का पूजन करती हैं। सुहाग की पिटारी में सुहाग की सारी वस्तुएं रखकर माता पार्वती को चढ़ाने का विधान इस व्रत का प्रमुख लक्ष्य है। जिसके फलस्वरूप स्त्रियां को सौभाग्य प्राप्त होता है और माता पार्वती के समान सुख पूर्वक पति रमण करके शिवलोक को प्राप्त करती हैं।

इस व्रत की कथा
दक्ष कन्या सती, जब पिता के यज्ञ में योगा अग्नि में समा गई थीं। उसके बाद वो ही मैना और हिमवान की तपस्या के फलस्वरुप उनकी पुत्री के रूप में पार्वती नाम से फिर प्रकट हुईं और लगातार भगवान शिव के ही चिंतन में लगी रहीं। उन्होंने सालों तक निराहार रहकर यानी बिना कुछ खाए-पीए कठिन तप किया। तभी उन्हें पता चला कि उनका विवाह किसी ओर के साथ तय हो गया है। ये सुनकर वो दुखी हुईं, तब उन्होंने अपनी सखियों को शिव के प्रति अपना अनुराग बताया।

पूजा विधि
इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर नहाने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती को साक्षी मानकर व्रत और पूजा का संकल्प लें। दिनभर नियम से निर्जला व्रत रखें। हरतालिका तीज की पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल से शुरू की जाती है। इसे रात का पहला प्रहर भी कहते हैं। इसमें भगवान शिव और माता पार्वती की रेत से बनी मूर्ति को स्थापित करने के बाद पूजा करें। भगवान शिव-पार्वती पर पूजा की सभी सामग्री चढ़ाएं। शिवजी को खासतौर से बिल्वपत्र और देवी पार्वती को सुहाग की सभी चीजों अर्पित करें। व्रत कथा सुनकर आरती करें व रात्रि जागरण की परंपरा भी है।

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