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नर्मदा जयंती विशेष: आस्था और श्रद्धा के दो अद्भुत आयाम

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: पंकज पटेरिया –
पुण्य सलिला मां नर्मदा हमारी जीवन रेखा है। इन से अलग हमारा अस्तित्व ही नहीं। शुभा अशुभ प्रसंग की साक्षी,अन्नदा, जलदा, प्राणदा ओर अंत में मोक्ष प्रदान करने वाली मां सुखदा, के प्रति दो भक्त की आस्था और श्रद्धा के दो आयाम।बोनी बट्टा हो गई…  
यह है एक बुजुर्ग, तीन टांग की टूटी फूटी पान दुकान के मालिक रवि भैया उर्फ रवि ठाकुर, अदालत के पास पीपल के पास इनकी दुकान रही। एक दो ग्राहक आ गये, बहुत बड़ी बात। रोज का नियम सुबह उठकर पोस्ट ऑफिस नर्मदा घाट जाते, स्नानादि के बाद झोलदार पजामे में से दो अगरबत्ती निकालते और अपने तरीके से हाथ जोड़ नर्मदा जी से बातचीत शेली में प्रार्थना करते,अम्मा अब जा रहे, कल फिर आयेगे, बोनी बट्टा हो गई दुकान में नहीं तो नर्मदे हर। ८० बरस की उमर में आज भी रवि भैया लगड़ाते ४ किलो मीटर दूर नर्मदा मैया की आरती बिना नागा जाते हैं। मैंने उनसे पूछा था, रवि भैया कब तक चलेगा यह सब? बोले पंकज भैया जब तक मैया को चलाना होगा ओर नर्मदे हर बोल आगे चले गए।

नर्मदा माई
श्यामल काया, पोपला मुंह, श्वेत केश, कद कुल जमा साढ़े तीन, पौने चार फिट, सफेद धोती, एक झोला, एक पीतल का कमंडल, हाथ में लाठी। चाल ऐसी की अच्छा खासा जवान आदमी भी पीछे रह जाए। ठिकाना नर्मदा जी मार्ग स्थित बिहारी का ओटला, बारह महीना यही उनका दिन रैनबसेरा रहता। रिश्ते नाते सब नर्मदा जी से, लोग भी इन्हे नर्मदा मांई बुलाते। शहर दो घर जहाँ उन्हे बुलाया जाता था। एक श्री दादा कुटी निवासी मेरे बहनोई टी पी मिश्रा, मेरी कीर्ति शेष बहन को वें जीजी बाई कहती, दूसरा घर रखा राजा मोहल्ला की सरोज बहन उनके भाई नमो शुक्ला।रु कती वे कहीं नहीं थी। ज्यादा जोर दो तो बढ़ बढ़ाते कहती बा मेरी महतारी है ना ! नर्मदा माई गरिया ई मोए। एक घर इटारसी रेलवे ऑफिस में केशियर रहे राजोरिया बाबू का भी था, उनके घर भी आती थी।
एक दिन मैंने उनसे पूछा था माई कितनी है तुम्हारी उम्र ? जब मुल्क में लड़ाई छिड़ी थी,13 साल की उम्र में शादी हो गई थी। आदमी मर गांवों, परकम्मा बालो की जमात में भाग आई। जाने कौन से युद्ध की बात करती थी। पर कहती थी उंगली से 90 ऊपर तीन। आप कहां कहां परिक्रमा कर आई, बोली चार बार नर्मदा की, पांच बार उत्तरकाशी, गंज बार मथुरा वृंदावन, सारे कुंभ सपर लए। खाना पीना सब वा मताई देते है। भुनसारे जैसे ही नहा धोकर बाहर आत हूं, मेरो कमंडल में चाय डाल गुर्जा से कूद खेल मे लग जाएँ। दोई टेम रोटी दे जात, कपड़ा लत्ता दे दे, उधारी भी अटके पे, दे दे। मैं जीजी बाई से लेके दे दू। भिक्षा कभी न ही मांगती। अब कहां गई कोई नहीं जानता। मेरे बड़े भाई इटारसी निवासी केशव प्रसाद पटेरिया होशंगाबाद सर्विस के लिए आते जाते थे। मेरी भांजी इन्ना बताती है कि, अंतिम बार केशव मामा को रेलवे स्टेशन पर मिली थी। मामा जी पठानकोट से इटारसी लौट रहे थे तब बोली मैंह बैठा दें। भाई साहब ने जगह देख कर ट्रेन में बैठा दिया और और कहीं जगह देख कर डिब्बे में खड़े हो गए। इटारसी आने पर उन्होंने पूरी गाड़ी खोज डाली। प्लेटफार्म भी लेकिन नर्मदा माई कहीं नहीं मिली? आज भी जब तक नर्मदा माई की याद आ जाती है मन ही मन नर्मदा जी के दर्शन हो जाते। नर्मदे हर नर्मदे माई।

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