-चंद्रकांत अग्रवाल :
रंग खूं कें थे सिसकियों की थी बोली।
धमाकों से कश्मीर में यूँ जली थी होली।।चार कांधों पर लौटे प्रियतम सुबह के गए।
चूडिय़ों संग पल भर में स्वप्न सभी टूट गए।।
नयनों का सावन बोला लौट आ हमजोली।
मन के वृंदावन में, प्रेम की जली होली।।
भैया लाने गए थे सखी रंग और गुलाल।
लौटे मौत की पिचकारी से होकर लाल-लाल।।
बहन बोली उठाएगा कौन अब मेरी डोली।
उमंगों के गांव में राखियों की जली होली।।
सिसक उठी ममता दूध जम गया स्तनों में।
आंख का तारा जा मिला गगन के सितारों में ।।
जाऊँगी किसके कांधो पर अब माँ बोली।
विश्वासों के घाट पर, सपनों की जली होली।।
नैतिकता, सेवा जैसे शब्द किताबी हुए।
नेता पाखंडी , झूठे यश के खिताबी हुए।।
स्वार्थ की मंडी में, सत्य की लगी बोली।
नफरत की राजनीति में सदभाव की जली होली।।
हर जंग में हर धर्म के बन्दे शहीद हो गए।
देश प्रेम के बीज जमी में पर वे बो गए।।
आएगा आगे बोलो अब कौन, माँ भारती बोली।
अधिकारों के कुरूक्षेत्र में कर्तव्यों की जली होली।।

चंद्रकांत अग्रवाल (Chandrakant Agrawal)
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