विस्थापन का विरोध करने जेसीबी के सामने आयी महिलाएं

विस्थापन का विरोध करने जेसीबी के सामने आयी महिलाएं

इटारसी। सतपुड़ा के जंगलों में ग्राम जमानी और बाबईखुर्द के अंतर्गत वन विभाग की भूमि पर बसे ग्राम छीतापुरा और मांदीखोह की महिलाओं ने शुक्रवार को वन विभाग की जेसीबी को रोककर यहां अन्य ग्रामीणों को बसाने का विरोध किया। विभाग ने यहां ग्राम झालई के कुछ परिवारों को बसाने की कवायद प्रारंभ की थी। जेसीबी से भूमि को समतल करके सफाई की जा रही थी, जिसका महिलाओं ने विरोध किया। सूचना पर पथरोटा थाना प्रभारी प्रज्ञा शर्मा, रेंजर एचके पाल और जमानी के समाजसेवी हेमंत दुबे की समझाईश पर मामला शांत हुआ। ग्रामीणों को बताया कि यह केन्द्र की योजना के अंतर्गत हो रहा है और यदि आपने विरोध किया तो आप पर शासकीय कार्य में बाधा का मामला दर्ज हो जाएगा। आखिरकार महिलाएं शांत हुईं।


ताकू प्रूफ रेंज से विस्थापित गांव सांकई और झालई के लोगों को 45 वर्ष गुजर जाने के बाद फिर अपने लिए सुविधाओं के लिए लडऩा पड़ रहा है। दरअसल, जहां इनको बसाया गया है, उसके आसपास केन्द्र सरकार की योजना के अंतर्गत दो अन्य गांवों को बसाया जा रहा है। ऐसे में 45 वर्ष पूर्व बसाये गये गांव के लोगों के सामने निस्तार की भूमि की बड़ी समस्या आ जाएगी। पूर्व से बसे ग्रामीण इसी बात का विरोध लंबे समय से कर रहे हैं। गुरुवार को भी जब वन विभाग ग्राम झालई के करीब आधा दर्जन शेष रहे परिवारों को बसाने के लिए जमीन तैयार करने पहुंचा तो ग्रामीण महिलाओं ने जेसीबी के सामने खड़े होकर विरोध किया और जमीन पर नये ग्रामीणों को नहीं बसाने को कहा। इनकी दलील थी कि इनकी निस्तार की भूमि है, वे यहां किसी को नहीं बसाने देंगे।

ये है मामला
करीब 45 वर्ष पूर्व जब सीपीई का ताकू प्रूफ रेंज बनाया जा रहा था तो वहां से विस्थापित किये गये छीतापुरा और मांदीखोह के ग्रामीणों को जमानी और बाबईखुर्द ग्राम पंचायत के आसपास बसाया गया था। उस वक्त यहां निस्तार के लिए बहुत भूमि थी। इसके बाद केन्द्र सरकार की नयी विस्थापन योजना के अंतर्गत टाइगर रिजर्व से विस्थापित गांवों को सरकार ने काफी सुविधायें मुहैया करायी हैं। इस योजना में ग्राम माना को जमानी पंचायत और सांकई और झालई को ग्राम पंचायत बाबईखुर्द के अंतर्गत भूमि पर बसाया जा रहा है। ग्राम झालई के करीब आधा दर्जन परिवार शेष रहे थे जिनको बसाने के लिए उस भूमि पर तैयारी की जा रही थी, जिस पर अब तक छीतापुरा और मांदीखोह के ग्रामीण निस्तार कर रहे थे। इसभूमि पर नये ग्रामीणों के आने पर उनके सामने निस्तार की समस्या आने की आशंका में ये ग्रामीण महिलाएं विरोध कर रही हैं।

जमानी पंचायत की दूरदर्शिता
केन्द्र की योजना के अंतर्गत जब नये गांवों को बसाने के लिए वन विभाग ने पंचायतों से एनओसी मांगी थी तब ग्राम पंचायत जमानी ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए ग्रामीणों के निस्तार के लिए करीब सौ एकड़ भूमि छुड़वा ली थी। लेकिन, ग्राम पंचायत बाबईखुर्द ने ऐसा नहीं किया। ग्रामीणों को जहां निवास करते हैं, अपने रोजगार, रोजमर्रा की जरूरतों के लिए खाली भूमि की जरूरत होती है। आदिवासी ग्रामीणों को जंगलों में रोजगार के लिए महुआ बीनना, मवेशियों के चारागाह और अन्य जरूरतें होती हैं। इसके लिए भूमि छोड़ी जाती है। ग्राम पंचायत बाबईखुर्द के अंतर्गत जो भूमि अब तक थी, जिसका मांदीखोह और छीतापुरा के ग्रामीण निस्तार के लिए उपयोग कर रहे थे, उस पर वन विभाग इन लगभग आधा दर्जन परिवारों को बसा रहा है। अपने निस्तार की भूमि खत्म होते देखकर इन दोनों गांव की महिलाएं लंबे समय से इस कार्य का विरोध कर रही हैं।

इनका कहना है…!
सांकई गांव के करीब छह-सात परिवारों को बसाने के लिए जमीन पर सफाई आदि कार्य प्रारंभ किया था। कुछ महिलाएं विरोध करने आयीं तो हमने एसडीएम को सूचना दी। उन्होंने पथरोटा थाने से पुलिस भेजी। थाना प्रभारी ने समझाईश दी तो महिलाएं मान गयीं हैं। यह तो केन्द्र की योजना है, इसमें हम स्थानीय स्तर पर कुछ नहीं कर सकते।
एचके पाल, रेंजर बोरी विस्थापन

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