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अद्भुत डॉक्यूमेंट्री सतपुड़ा: ए टेल ऑफ सेवन हिल्स की स्पेशल स्क्रीनिंग आयोजित

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नर्मदापुरम। सतपुड़ा के प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक विशेषताओं एवं यहां मौजूद दुर्लभ वन्य प्रजातियों साहित वन्य संरक्षण एवं प्रबंधन पर आधारित अद्भुत डॉक्युमेंट्री सतपुड़ा: ए टेल ऑफ सेवन हिल्स की स्पेशल स्क्रीनिंग मिनाक्षी सिनेमा घर में आयोजित की गई।

स्क्रीनिंग के दौरान विधायक नर्मदापुरम डॉ सीतासरन शर्मा (MLA Narmadapuram Dr Sitasaran Sharma), क्षेत्र संचालक एसटीआर श्री एल कृष्णमूर्ति , कलेक्टर नर्मदापुरम श्री नीरज कुमार सिंह, पुलिस अधीक्षक डॉ गुरकरण सिंह, जिला पंचायत सीईओ श्री मनोज सरियाम, अपर कलेक्टर श्री मनोज सिंह ठाकुर, नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती नीतू यादव, श्री पीयूष शर्मा , श्री भूपेंद्र चौकसे , श्री सत्येंद्र फौजदार सहित मीडिया प्रतिनिधि एवं सभी विभागों के अधिकारी कर्मचारी उपस्थित रहे। सतपुड़ा पर बनी डॉक्यूमेंट्री को देखने के बाद सभी ने फिल्म की सराहना की।

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फील्ड डायरेक्टर एसटीआर श्री कृष्णमूर्ति ने कलेक्टर श्री नीरज कुमार सिंह (Collector Shri Neeraj Kumar Singh) को सतपुड़ा पर बनी इस डॉक्यूमेंट्री की विशेष स्क्रीनिंग के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि सतपुड़ा टाइगर रिजर्व प्रदेश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान होने के साथ ही अनेक अद्भुत विशेषताएं अपने में समाहित किए हुए।

इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से हम सतपुड़ा की ऐतिहासिक विशेषताओं, प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ही वन विभाग द्वारा वन संरक्षण एवं प्रबंधन के दिशा में वन विभाग द्वारा किए गए कार्यों को जान सकेंगे। श्री कृष्ण मूर्ति ने कहा कि वन संरक्षण के माध्यम से रोजगार सृजन करना एवं सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को देश का सबसे अच्छा टाइगर रिजर्व बनाना हमारा प्रमुख उद्देश्य हैं।

सतपुड़ा पर विशेष लेख

सतपुड़ा की वादियां और यहां के घने जंगल, कहते हैं जितना बड़ा यहां का क्षेत्रफल है उससे कहीं बड़ा यहां का इतिहास भी है। पंडित भवानी प्रसाद मिश्र ने कई सालों पहले कविता लिखकर इन जंगलों के रहस्यों की ओर इशारा भी किया था –

“सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से,
ऊँघते अनमने जंगल
झाड़ ऊँचे और नीचे
चुप खड़े हैं आँख भींचे;
घास चुप है, काश चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है;
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

क्या ही जादू किया होगा सतपुड़ा के इन जंगलों ने जो कवि ने अपनी कविता से हमेशा के लिए इन जंगलों को अमर कर दिया होगा। मध्य भारत के घने जंगलों में बसी एक ऐसी जगह है जिसका आपने नाम तो सुना होगा लेकिन जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। माना जाता है मध्य भारत के 7 सबसे ऊंचे शिखर यही होने के कारण इस पर्वत माला का नाम सतपुड़ा हुआ।

एक ऐसी जगह जहां आकर एहसास ही नहीं होता कि हम मध्य भारत के किसी जंगल या पहाड़ों के बीच हैं। 3 राज्यों मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में फैली इस विशाल पर्वतमाला के हर हिस्से में विविधता और सुंदरता का खजाना आज भी छिपा बैठा है।

लगभग डेढ़ सौ साल पहले सन 1862 में कप्तान जेम्स फॉरसिथ जो सतपुड़ा के जंगलों में स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे को ढूंढते हुए आए थे। वहीं वे पहुंचे सतपुड़ा के बीच बसे पचमढ़ी गांव में। यूं कहें तो पचमढ़ी हमेशा से सतपुड़ा के घने जंगल के बीच बसा हुआ था पर यह कहना गलत नहीं होगा कि पचमढ़ी को दुनिया के सामने लाने का काम कप्तान जेम्स फॉरसिथ ने किया।

कप्तान जेम्स फॉरसिथ को यहां की आबोहवा इतनी रास आई कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार को यहां पचमढ़ी में छावनी बनाने का सुझाव दिया। बस फिर क्या था कुछ ही समय में यहां पर अंग्रेज भी बस गए। वैसे तो पचमढ़ी का अपने आप में भी एक अलग ही इतिहास रहा है। और यहां बने ब्रिटिश काल के यह घर आज भी उस कॉलोनियल काल की याद दिलाते हैं।

आज मध्यप्रदेश ही नहीं पूरे भारत से न जाने कितने ही लोग यहां पचमढ़ी की वादियों में और यहॉं के इतिहास में खोने आते है। सुबह पनार पानी से जंगल की शुरुआत जहां घूमने का एक अलग ही रोमांच होता है। यहां पनार पानी में ही बनी एक नर्सरी, जो कई किस्म के औषधीय पौधे के साथ-साथ यहां मिलने वाली तितलियों के लिए भी उतनी ही जानी जाती है।

पचमढ़ी हिल स्टेशन के इतने लोकप्रिय होने के पीछे आबोहवा तो है ही, साथ ही साथ पर्यटकों को लुभाने के लिए बी फॉल ,सिल्वर फॉल, हांडी खोह, रिछ गढ़ न जाने कितने ही ऐसे दृश्य जो आज भी अपनी अविश्वसनीय सुंदरता से बरबस ही लोगों को अपनी सुंदरता का कायल बना लेते हैं।

पचमढ़ी का इतिहास महाभारत से भी जुड़ा माना जाता है। जिसका सबूत यहां बनी पांडव गुफा देती है। पर कुछ लोगों का मानना है कि यह गुफाएं बौद्ध भिक्षु ध्यान के लिए भी उपयोग किया करते थे। इन्हीं पहाड़ों में जगह-जगह में 1500 से 10000 साल तक पुरानी रॉक पेंटिंग्स भी देखने मिलती हैं। जो यहां का एक लंबा इतिहास आज भी अपने आप में समाए बैठी हैं।

फिर बड़ा महादेव के दर्शन और चौरागढ़ की चढ़ाई के बाद की थकान शाम को धूपगढ़ की ठंडी हवाओं के बीच सूर्यास्त देखते ही निकल जाती है। यह सब पचमढ़ी में ही मुमकिन है और यह बात पचमढ़ी के जंगलों को बहुत खास और भारत के जंगलों से बहुत अलग बनाती है। काफी कम लोग ही जानते होंगे कि भारत के वन विभाग की शुरुआत सतपुड़ा के जंगलों से ही हुई थी।

1862 के लगभग सतपुड़ा के जंगलों में भारत के पहले वन विभाग का निर्माण हुआ। पचमढ़ी में स्थिति है बायसन लॉज जो आज भी म्यूजियम के तौर पर पर्यटकों को आज भी सतपुड़ा का इतिहास बताती है, किसी जमाने में वन विभाग का दफ्तर हुआ करती थी। उन गुजरे दिनों में वन विभाग का काम बस जंगल से लकड़ी काटने का हुआ करता था। और अपने उपयोग के लिए सागौन एवं बांस के पेड़ ही लगाया करते थे।

जो उस समय रेलवे ट्रैक के स्लीपर के साथ-साथ पानी के जहाज बनाने के काम आया करते थे। सतपुड़ा के जंगल में सैर करते वक्त अगर आपको गिट्टी की रोड मिल जाए, तो आश्चर्य मत कीजिएगा क्योंकि यही सड़क जंगलों को भागड़ा स्टेशन से जोड़ती थी जहां से कभी सागौन और बांस का निर्यात भी हुआ करता था। और फिर पचमढ़ी से कुछ ही दूरी पर स्थित है बोरी अभ्यारण, जहां अंग्रेजो के द्वारा लगाए गए पेड़ लगभग 100 सालों से भी ज्यादा पुराने माने जाते हैं।

इन पेड़ों से निकले रेशे ऐसा आभास दिलाते हैं मानो यह पेड़ जीवित हैं और काफी उम्रदराज हो गए है। ब्रिटिश सरकार द्वारा 1865 में बोरी को रिजर्व फॉरेस्ट का भी दर्जा मिला था जो बोरी के जंगलों को भारत का सबसे पहला रिजर्व फॉरेस्ट बनाता है। और आज लगभग डेढ़ सौ साल बाद भी यह अनछूआ जंगल संरक्षित और अनछुआ ही है, और ना जाने कितने ही अनदेखे जीवो का घर भी है।

बोरी के घने जंगलों में बसा ये फॉरेस्ट हाउस कई दशकों पहले वरिष्ठ अधिकारी श्री कुलकर्णी का घर हुआ करता था। श्री कुलकर्णी ने यहां रहते हुए बोरी के जंगलों का वर्किंग प्लान तैयार किया, उन्होंने अपना आधा जीवन इन जंगलों और यहां रह रहे लोगों के नाम कर दिया। कहते हैं उनके मरने के बाद उनकी अस्थियां भी उनकी इच्छानुसार यहां बोरी की जंगली नदी में ही बहाई गई थी।

यह इच्छा उनका इस जगह के लिए प्रेम ही था जो आखिरी वक्त तक उनके साथ रहा और अब इस फॉरेस्ट हाउस को कुलकर्णी हाउस के भी नाम से जाना जाता है। यहां आकर आज भी अतीत में होने का आभास होता है। क्योंकि भारत का पहला फॉरेस्ट कैंप भी यही कुलकर्णी हाउस के पास बसा हुआ है जो अंग्रेजों द्वारा सन 1862 के आसपास बनाया गया था।

बहुत कुछ देखा है और सहा है इन सतपुड़ा के जंगलों ने। जंगलों के बीच ही बनी खदान पास ही बने तवा डैम के निर्माण के वक्त उपयोग में आया करती थी। वक्त बदला और आज यह खदान जंगली जानवरों का घर बन चुकी है। तवा नदी पर बांध बन जाने से सतपुड़ा का काफी क्षेत्रफल पानी के अंदर आ जाने से जंगलों को काफी नुकसान भी हुआ। पर जैसे हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं।

जहां मॉनसून के मौसम में सतपुड़ा के जंगलों का काफी क्षेत्रफल पानी में आ जाता है, जो ठंड में दूर देशों से आए पक्षियों को आसरा भी देता है, वहीं गर्मियों में उतरते पानी में उभरती जमीन शाकाहारी जीवो के लिए बड़े-बड़े घास के मैदान भी लेकर आती है । ऐसे विशाल मैदान शायद ही किसी राष्ट्रीय उद्यान में देखने को मिलते होंगे।

कोर क्षेत्र में बसे गांवों की 10,000 से भी ज्यादा जनसंख्या और लगभग इतनी ही संख्या में मवेशी सतपुड़ा के वन्य प्राणी रहवासियों के प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती थी। जहां घने जंगलों में सालों से बसे गांव में रह रहे लोगों को छोटी से छोटी चीजें मिल पाना भी मुमकिन नहीं हो पाता था और ना ही प्राथमिक शिक्षा प्राप्त हो पाती थी। समय बदला और समय के साथ लोगों की सोच भी बदली।

सन् 2000 में सतपुड़ा के जंगलों को टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद गांवों के विस्थापन कार्य को और गति मिली। कई सालों की मेहनत के बाद लगभग 49 गांव को जंगल से बाहर बसाया गया और इसी के साथ न जाने कितने लोगों की जिंदगी बदली। जंगल के भीतर सभी गांव को जंगल से बाहर एक अच्छी जगह विस्थापित कर दिया गया। इसे लगभग 10000 हेक्टेयर से भी ज्यादा मैदानी इलाका इन जंगलों को मिला।

जिससे बड़े-बड़े घास के मैदानों का निर्माण हुआ। जंगल के बाहर बसे इन गांवों के बच्चे और नौजवान आज अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और अच्छा व्यवसाय कर अभी आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी सुरक्षित कर रहे हैं और इन बाहर बसे गांव की खास बात यह भी है कि इनका नाम आज भी आज की उनके पुराने गांव के नाम पर ही रखा गया।

इंसानी बस्ती से न जाने कितने ही दूर बीच घने जंगल में बसे गांव आज विस्थापित हो गए। पीछे छोड़ गए हैं बस अपनी यादें जो हमें आज भी बीते कल की याद दिलाते गांव के। जंगलों में गावों के विस्थापन के साथ ही साथ काम शुरू हुआ सतपुड़ा को उसकी पहचान देने का और फिर सन 2000 में सतपुड़ा के जंगलों को टाइगर रिजर्व का दर्जा भी प्राप्त हुआ।

बोरी के जंगल और कुछ ही दूरी पर स्थित चूरना के मैदानी इलाके तवा बैकवॉटर पर बसा मढ़ई का जंगल और पचमढ़ी का पहाड़ी इलाका मिलकर निर्माण करता है। सतपुड़ा के अद्भुत जंगलों का जो शायद ही भारत के किसी और जंगल में देखने मिलता होगा । और यही कारण है जो सतपुड़ा को मध्य भारत का सबसे सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व बनाता है।

सतपुड़ा में अगर चूरना के जंगलों की बात करें तो यह जंगल सतपुड़ा के बाकी इलाकों से बिल्कुल अलग है, घने जंगल होने के साथ-साथ गर्मियों में बांध का पानी उतरते ही बड़े बड़े मैदानी इलाके भी बन जाते हैं। जो शाकाहारी जीवो को बेहद पसंद आते है। वही ये भी तो सत्य है कि जहा शिकार वही शिकारी तभी इन जीवो के लालच में बाघ भी यह अक्सर चले आते है।

इसीलिए ही सतपुड़ा में ज्यादातर बाघों की संख्या भी चूरना के क्षेत्रों में ही देखने को मिलती है। और अगर यहां आपका सामना बाघ से हुआ तो आप उसको देखते देखते जरूर थक जाएंगे पर बाघ अपना दीदार देते देते नहीं थकेगा और हो भी क्यों ना 50 से अधिक बाघ जो है सतपुड़ा के जंगलों में हैं यह सब मुमकिन हो पाता है।

दिन-रात जंगलों की निगरानी से पर सतपुड़ा में 24 घंटे जंगलों के साथ-साथ बाघों पर नजर रखना भी हमेशा से वन विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती रही है। कारण है यहां का पहाड़ी क्षेत्र, तवा बैकवॉटर और इतने बड़े क्षेत्रफल को संभालना भी आसान काम नही हे जहा हर मोड़ पर रोज एक नई चुनौती वन रक्षकों का इंतजार करती है।

तवा बैकवॉटर से नौका पर दिन-रात वन कर्मी जंगल पर नजर रखते हैं, मैदानी इलाकों में गाड़ी से गस्ती, और जहां गाड़ी से जाना संभव होता है वहां यह हाथी वन रक्षकों का पूरा साथ तो देते ही है । साथ ही साथ पैदल गश्त इस काम को और भी खतरनाक बना देती है। पर यह वन कर्मियों का साहसी है जो इन बेजुबान जीवो के लिए दिन रात एक कर देते हैं।

गश्ती के दौरान खतरा बस बाघों से सामने का नही होता। यह पहाड़ी क्षेत्र बाघों के लिए अनुकूल आवास तो बनाते हैं और साथ ही साथ तेंदुए और भालू जैसे खतरनाक जानवरों को भी काफी रास आते हैं। मढ़ई और चूरना के जंगलों में बाघों के साथ-साथ तेंदुए और भालू जैसे जीव की आसानी से देखने को मिल जाते हैं।

पर इसके साथ एक ऐसा जीव भी है जो कई सालों पहले यहां से विलुप्त हो गया था, पर आज वन विभाग की मेहनत से सतपुड़ा के जंगलों में आजादी से अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। बारहसिंघा, एक दशक से भी कम समय में कान्हा के बारहसिंघा समूह ने अपने नए घर को पूरी तरह से अपना लिया। अपनी विलुप्ति के लगभग 100 साल बाद सतपुड़ा के घने जंगलों में से 100 से अधिक बारासिंघा मुक्त रूप से विचरण करते देखे जा सकते हैं।

कुछ बारासिंघा बोरी के जंगलों से लगभग 50 किलोमीटर दूर चुरना के मैदानी क्षेत्रों में भी देखने को मिल जाते हैं। सतपुड़ा के जंगलों में एक जीव ऐसा भी है जो शायद ही मध्य भारत की किसी और क्षेत्र में देखने मिलेगा। “इंडियन जायंट स्क्विरल” जिसे यहा के लोग प्यार से नन्ही के नाम से जाना जाता है। जो सतपुड़ा के टाइगर रिजर्व की मैस्कॉट भी है। आप चाहे पंचमढ़ी में हो या चूरना के मैदानी इलाकों में या पहाड़ी जंगलों में ये नन्ही कही न कही खेलते मिल ही जायेगी।

पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से यहां इंडियन गौर भी काफी भरी मात्रा में देखने को मिल जाते है। चूरना से कुछ किलोमीटर दूर ही है मढ़ई हैं, जो ठीक तवा बैक वाटर से सटा हुआ है। यह कि सफारी के लिए आपको नदी पार कर के आना पड़ता है और यही से असली रोमांच होता है। मढई के घने जंगलों के बीच बना ये किला कभी यहां पर राज करने वाले गोंड राजा भबूत सिंह का हुआ करता था। कहा जाता ही उनकी मौत अंग्रेज सैनिको से लड़ते वक्त हुई थी जो यह उनके क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे।

उसी तरह जंगली के बीचों बीच बना ये जिंजनी महल हमे ये सोचने पर मजबूर कर देता है की कैसे इस महल का निर्माण इस वक्त इस घने जंगल में किया गया था। आज भी इस बात का कोई भी पुख्ता सबूत नहीं की इस महल का निर्माण कब और किसके द्वारा करवाया गया था। जो इस महल को और भी रहस्यमई बना देता ।है न जाने एसी कितनी ही जगह है सतपुड़ा में जिसके इतिहास की खोज आज भी जारी है। सतपुड़ा में सालाना सैलानियों की गिनती भी कुछ कम नहीं है।

जंगलों में सफारी का आनंद तो आपने कई राष्ट्रीय उद्यानों में लिया होगा पर सफारी के साथ-साथ वोट सफारी, पैदल सफारी करने का अनुभव कुछ अलग ही है । जो आपको सिर्फ सतपुड़ा मैं ही महसूस हो सकता है। दिन में वन्यजीवों का मजा तो है ही पर रात में सतपुड़ा के बफर जंगलों में बाघ, भालू या तेंदुए का दीदार हो जाए तो आपकी सांसे थमना भी मुमकिन है। सोचे दिन भर की थका देने वाली जंगल सफरी के बाद रात में खुले आसमान तारों के नीचे बोनफायर में कैंपिंग का रोमांच लेना। क्या कुछ मुमकिन नहीं यह जो आपके बफर में सफर को और भी यादगार बना देगा।

हाल ही में सतपुड़ा के जंगलों को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में भी सम्मिलित किया गया है। जिससे गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है। आज चाहे बात यहां के ग्रामीणों को नई जिंदगी देने की हो,या इन जंगलों को सुरक्षित रखने की, चाहे बारहसिंघा को पुनः बसाने की हो , या यहां बाघों की लगातार बढ़ती संख्या की हो।

सतपुड़ा की सफलता की कहानी खुद ब खुद बयां होती है। बलिदान कहने में भले ही आसान सा शब्द लगता हो, कर पाने का जज्बा अटूट साहस और हिम्मत मांगता है। जंगल और यहां बसने वाले जीवो के लिए अपनी जमीन देना भी एक ऐसा ही बलिदान था। जो इन ग्रामीणों ने किया, इन जंगलों की सुरक्षा में दिन रात तैनात हमारे वनरक्षक और वरिष्ठ अधिकारी, जिन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर ना जाने कितने ही ऐसे बलिदान दिए।

जिसने आज सतपुड़ा को वह रूप दिया जिसे आज हम देख और निहार पा रहे हैं। नमन है उन लोगों को जो आज भी अपनी पूरी निष्ठा और कर्मठता से इन जंगलों की रक्षा के लिए दिन-रात तत्पर है।

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