इटारसी। मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम के अंतर्गत आने वाले पशु आहार संयंत्र एवं नेशनल कामधेनु ब्रीडिंग सेंटर कीरतपुर में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), इंदौर की एक टीम ने दौरा किया। इस टीम में एक असिस्टेंट प्रोफेसर के साथ चार शोधार्थी (रिसर्चर) शामिल थे, जिन्होंने कृषि और पशुपालन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की।
गोवंश और कृषि अपशिष्ट पर गहन मंथन
आईआईटी की टीम ने सबसे पहले नेशनल कामधेनु ब्रीडिंग सेंटर का भ्रमण किया, जहां डॉ. पवन सिसोदिया ने उन्हें केंद्र के अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) और भारतीय नस्लों के संरक्षण पर हो रहे कार्यों की जानकारी दी। इस दौरान डॉ. सिसोदिया और आईआईटी की टीम के बीच अपशिष्ट के बेहतर उपयोग पर गहन चर्चा हुई। इसके बाद, टीम ने पशु आहार संयंत्र कीरतपुर का दौरा किया और वहां पशु आहार निर्माण की पूरी प्रक्रिया, उसकी गुणवत्ता और पशुओं के लिए उसके लाभों को समझा। आईआईटी के शोधकर्ताओं ने बताया कि उनकी टीम नरवाई (फसल कटाई के बाद बचे हुए डंठल) की आग को रोकने के तरीकों पर भी शोध कर रही है, जो कि किसानों और पर्यावरण दोनों के लिए एक बड़ी समस्या है।
भूसा प्रबंधन और आत्मनिर्भरता पर जोर
चर्चा के दौरान, डॉ. सुनील कुमार चौधरी ने भूसा प्रबंधन को लेकर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि यदि भूसे को दबाकर उसके ब्लॉक बना दिए जाएं, तो इससे उसके भंडारण और परिवहन की लागत में काफी कमी आएगी। इससे किसानों को भूसे को बेचने में भी आसानी होगी। डॉ. चौधरी ने यह भी सुझाव दिया कि यदि भूसे को कुछ तत्वों से ट्रीट किया जाए, तो उसकी पौष्टिकता बढ़ सकती है, जिससे पशुओं के दूध उत्पादन में वृद्धि होगी।
आईआईटी की टीम ने पशु आहार संयंत्र की आर्थिक स्थिति के बारे में भी जानकारी ली। उन्हें बताया गया कि यह संयंत्र वर्ष 2017 से पूरी तरह से आत्मनिर्भर है और इसे अब शासन से किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता नहीं मिलती है। इस दौरे से यह स्पष्ट हुआ कि कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में वैज्ञानिक नवाचारों को बढ़ावा देकर किसानों और पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है। यह सहयोग भविष्य में कृषि अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन और पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार की दिशा में नए रास्ते खोल सकता है।









