इटारसी। नगर पालिका परिषद इटारसी के तत्वावधान में आयोजित श्रीरामलीला दशहरा महोत्सव आज आध्यात्म और भक्ति के गहरे रंगों में डूब गया। गांधी मैदान और वीर सावरकर मैदान, दोनों ही स्थानों पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन के उन महत्वपूर्ण प्रसंगों का मंचन किया गया, जो हमें जीवन-मूल्यों, मित्रता और धर्म की स्थापना का संदेश देते हैं।
आज के श्रीरामलीला मंचन की शुरुआत स्थानीय गणमान्य नागरिकों नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पंकज चौरे, जसवीर छाबड़ा, भरत वर्मा, जिला कांग्रेस अध्यक्ष शिवाकांत पांडेय, सम्राट तिवारी, अनिल रैकवार, मोहन मालवीय, जितेंद्र सरियाम, गौरव गोल्डी चौधरी, मोती सिंह राजपूत, धर्मेश सोलंकी, रोहित तोमर, नितिन राजपूत, मंजू ठाकुर, दीपक दुगाया, कुणाल सराठे, छबिराज सोनी, कुलदीप पटेल, महिला मोर्चा इटारसी मंडल, जाग्रति भदौरिया सरला लोट, रानी रजक, रानी वर्मा, संगीता मालवीय, पूजा मसके द्वारा पूजा-अर्चना करके कराई गई, जिसके बाद कलाकारों ने एक-एक कर उन प्रसंगों को जीवंत किया, जो हमारे भीतर की बुराई पर अच्छाई की विजय का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
धर्म, मित्रता और त्याग का दर्शन
मंच पर सबसे पहले सीता हरण के मार्मिक प्रसंग का मंचन हुआ। यह घटना दर्शाती है कि आसक्ति और माया (स्वर्ण मृग) किस प्रकार धर्म के मार्ग से विचलित कर सकती है, और कैसे अहंकार (रावण का) विनाश का कारण बनता है। इसके बाद सुग्रीव-श्रीराम मित्रता का मंचन किया गया, जो सिखाता है कि जीवन में सच्चा साथ और विश्वास सबसे बड़ी शक्ति है। भगवान श्रीराम ने निस्वार्थ भाव से सुग्रीव को उनका राज्य दिलवाया, जो इस बात का प्रतीक है कि जब हम धर्म के मार्ग पर चलते हैं, तो ईश्वर स्वयं हमारी सहायता के लिए तत्पर होते हैं।
अगले क्रम में बाली वध का प्रसंग हुआ, जो न्याय और अन्याय के बीच के सूक्ष्म अंतर को उजागर करता है। तत्पश्चात, जटायू मोक्ष का मंचन किया गया, जिसने दर्शकों को भक्ति और निस्वार्थ सेवा के महत्व से परिचित कराया। जटायू ने माता सीता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, और उन्हें स्वयं भगवान के हाथों मोक्ष मिला, जो यह सिद्ध करता है कि धर्म की रक्षा में किया गया छोटा सा प्रयास भी हमें सर्वोच्च गति प्रदान करता है।
लंका दहन : बुराई के अंत का प्रतीक
पूरे मंचन के दौरान, सीता की खोज और हनुमान जी के अद्भुत शौर्य से भरे प्रसंगों ने दर्शकों को भावविभोर किया। परंतु, लंका दहन का प्रसंग देखने के लिए श्रद्धालु देर रात तक अपनी जगह पर डटे रहे। यह प्रसंग केवल एक शहर को जलाने की घटना नहीं है, बल्कि यह अहंकार, मोह और पाप के प्रतीक लंका को जलाने का आध्यात्मिक संकेत है।
लंका दहन यह संदेश देता है कि जब भक्त (हनुमान) के भीतर निष्ठा और अटूट विश्वास हो, तो वह बड़ी से बड़ी बुराई (रावण का साम्राज्य) को भस्म करने की शक्ति रखता है। यह एक आध्यात्मिक विजय है, जहां आत्म-शक्ति द्वारा काम, क्रोध और लोभ रूपी लंका का नाश किया जाता है।
यह श्रीरामलीला महोत्सव इटारसी के लोगों को केवल मनोरंजन ही नहीं दे रहा, बल्कि जीवन के आध्यात्मिक सिद्धांतों और सनातनी मूल्यों को सहज ढंग से समझने का अवसर भी प्रदान कर रहा है।









