इटारसी। लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा आज इटारसी में भी पारंपरिक श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया गया। शहर के पथरोटा नहर पर उत्तर भारतीय परिवारों के तीन से चार सौ से अधिक परिवारों ने एकत्र होकर छठ पर्व के मुख्य दिन, यानी संध्या अघ्र्य के अवसर पर नहर के जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य देव को अर्घ्य दिया। परिवारों ने इस दौरान छठी मैया और सूर्य देव की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि और संतान के दीर्घायु की कामना की। छठ व्रतियों के भक्तिमय लोकगीतों से पूरा वातावरण गूंज उठा।
आज रात जागरण और भजन-कीर्तन
अर्घ्य देने के उपरांत, उत्तर भारतीय परिवारों द्वारा पथरोटा नहर के किनारे रातभर भजन-कीर्तन और जागरण किया जाएगा। कल सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद इस 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण किया जाएगा। पथरोटा नहर के अलावा, शहर के ऑर्डनेंस फैक्ट्री और नयायार्ड जैसे क्षेत्रों में भी छठ पर्व पर कार्यक्रम किए जाते हैं।
छठ पर्व : आज संध्या अर्घ्य


छठ पूजा, मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित चार दिनों का महापर्व है, जिसकी शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है और यह ‘उषा अर्घ्य ’ के साथ समाप्त होता है। आज, पर्व का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है, जिसे संध्या अर्घ्य या सांझ के अरग के नाम से जाना जाता है। सूर्यास्त के समय, व्रती महिलाएं नदी या नहर के पानी में कमर तक खड़ी होती हैं। वे सूप या टोकरी में रखे प्रसाद को लेकर सूर्य देव की ओर मुख करती हैं। इसके बाद दूध और जल को एक तांबे के पात्र (लोटा) से धीरे-धीरे डूबते हुए सूर्य को अर्पित किया जाता है, जिसे अर्घ्य कहा जाता है। यह अर्घ्य मुख्य रूप से सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा (संध्या की किरण) को समर्पित होता है, जो आभार और संतुलन का प्रतीक है।
निर्जला व्रत (36 घंटे का उपवास)
व्रती महिलाएं (और पुरुष) दूसरे दिन ‘खरना’ के प्रसाद ग्रहण करने के बाद से 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। इस दौरान वे अन्न और जल का त्याग करती हैं। व्रती परिवार घाट (नदी, तालाब या नहर) पर जाता है। बांस की टोकरियों (सूप और डलिया) में ठेकुआ, चावल के लड्डू (कसार), गन्ना, सिंघाड़ा, मूली, नींबू, नारियल, हल्दी, अदरक, और विभिन्न मौसमी फल सहित विशेष प्रसाद सजाया जाता है। पवित्रता बनाए रखने के लिए प्रसाद को बहुत ही सावधानी और पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है।
रात भर जागरण और कोसी भरना
संध्या अर्घ्य के बाद, कई स्थानों पर व्रती रात भर घाट पर ही जागकर या घर आकर कोसी (छठी मैया के प्रतीक स्वरूप दीपों से भरा कलश) भरकर भजन-कीर्तन करते हैं। यह जागरण पूरी रात चलता है, जिसमें छठी मैया की कथाएं सुनी जाती हैं और लोकगीत गाए जाते हैं। यह महापर्व कठोर नियमों, पवित्रता और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने की भावना के लिए जाना जाता है। कल (चौथे दिन) उगते सूर्य (ऊषा अर्घ्य ) को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण (समापन) होगा।








