अखिलेश शुक्ला,सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

बचपन के सपने अक्सर हवा में उड़ जाते हैं, लेकिन कभी-कभी एक तमाचा उन सपनों को इतनी मजबूती से अंतर्मन को जकड़ लेता है कि वह एक सच्चाई बनकर ही उभरता है। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता प्रेमनाथ की जिंदगी का यह किस्सा किसी सिनेमा की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। यह एक ऐसी कहानी है जहाँ एक अपमान ने एक जुनून पैदा किया, और उस जुनून ने इतिहास रच दिया।
जबलपुर का वो चंचल किशोर और एम्पायर टॉकीज की कुर्सी
प्रेमनाथ, जो आगे चलकर बॉलीवुड के ‘दबंग’ अभिनेता बने, अपने जमाने के जबरदस्त कलाकार थे। लेकिन उनकी शुरुआत जबलपुर के एक साधारण स्कूली छात्र के रूप में हुई। उन दिनों जबलपुर में एम्पायर टॉकीज नाम का एक शानदार सिनेमा घर था। यह अंग्रेजों के समय में बना था। हर किशोर की तरह प्रेमनाथ को भी सिनेमा का शौक था, लेकिन पॉकेट मनी हमेशा साथ नहीं देती थी। एक दिन, सिनेमा देखने का जुनून इतना हावी हुआ कि युवा प्रेमनाथ ने एक ‘मास्टर प्लान’ बनाया। उन्होंने एम्पायर टॉकीज की दीवार फाँदकर बिना टिकट के अंदर घुसने का फैसला किया। और वो सफल रहे! वो बिना किसी की नजर में आए अंदर पहुँच गए और एक सीट पर बैठकर फिल्म का आनंद लेने लगे।
वह भिड़ंत जिसने तय कर दिया भविष्य
तभी टिकट चेकर आ पहुँचा। जब उसने प्रेमनाथ से टिकट माँगा, तो इस निडर किशोर ने झूठ बोलने की बजाय सच उगल दिया। उन्होंने बिना हिचकिचाहट कबूल किया, “मेरे पास टिकट नहीं है। मैं दीवार फाँदकर अंदर आया हूँ।” यह सुनना था कि टिकट चेकर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने न सिर्फ प्रेमनाथ को एक जोरदार झापड़ जड़ा, बल्कि उन्हें पकड़कर बाहर ले गया और व्यंग्य से बोला, “जिस तरह दीवार फाँदकर आए थे, उसी तरह फाँदकर बाहर भागो!” लेकिन प्रेमनाथ ने हार नहीं मानी। बाहर जाते-जाते उन्होंने अपनी आँखों में चमक और आवाज में लहजा भरकर उस टिकट चेकर से कहा, “एक दिन देखना, मैं ही इस सिनेमा घर का मालिक बनूँगा!” उस वक्त टिकट चेकर ने शायद इस बात को हँसी में उड़ा दिया होगा। लेकिन प्रेमनाथ ने उस लक्ष्य को अपने दिल में गाँठ की तरह बाँध लिया।
सपने को पंख लगे: बॉलीवुड की ओर रुख किया
बड़े होकर प्रेमनाथ ने अपने पिता की इच्छा के विपरीत अभिनय को अपना करियर चुना और मुंबई की ओर रुख किया। अपने दमदार अभिनय, खास अंदाज और मजबूत इरादों की बदौलत उन्होंने बॉलीवुड में एक मजबूत पहचान बनाई। वो सिर्फ एक अभिनेता ही नहीं, बल्कि निर्देशक, निर्माता और गीतकार भी बने। और फिर वो ऐतिहासिक पल आया साल 1952 में। प्रेमनाथ ने सचमुच एम्पायर टॉकीज को खरीद लिया! उस सिनेमा घर का, जिसकी दीवार उन्होंने बचपन में फाँदी थी, अब वो उसके मालिक बन चुके थे। यह सिर्फ एक संपत्ति का सौदा नहीं, बल्कि एक बचपन के वादे को पूरा करने जैसा था।
वह शानदार ‘उद्घाटन’ जिसने दिखा दी ‘जिद्दी प्रेमनाथ’ की असली पहचान
मालिक बनने के बाद एम्पायर टॉकीज के उद्घाटन का दिन आया। शानदार तैयारी थी। लेकिन प्रेमनाथ ने जो किया, उसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उद्घाटन के दिन, प्रेमनाथ ने मुख्य दरवाजे से अंदर न जाकर, बिल्कुल उसी तरह दीवार फाँदकर टॉकीज के अंदर प्रवेश किया, जैसे वो किशोरावस्था में किया करते थे! यह उनके जिद्दी, जोशीले और अपने अतीत से गहरा जुड़ाव रखने वाले व्यक्तित्व का बेमिसाल उदाहरण था। और फिर, संयोग देखिए कि वही टिकट चेकर अब भी वहाँ काम कर रहा था। प्रेमनाथ ने उसे बुलाया। वह टिकट चेकर डर के मारे काँप रहा था। उसे लग रहा होगा कि अब मालिक बने प्रेमनाथ उससे बदला लेंगे।
लेकिन जो हुआ, वह सबके लिए एक सदाबहार सबक बन गया।
प्रेमनाथ उसी कुर्सी पर बैठे थे, जहाँ से सालों पहले उन्हें बेदखल किया गया था। कुर्सी से उठकर उन्होंने टिकट चेकर को वहीं बिठाया। उसके गले में फूलों की माला डाली, उसका स्वागत किया और मिठाई खिलाई। फिर उसे गले से लगाते हुए प्रेमनाथ ने कहा:”अगर तुमने उस दिन मुझे झापड़ मारकर भगाया नहीं होता, तो आज मैं एम्पायर टॉकीज का मालिक नहीं बनता। उस एक घटना ने मेरे अंदर इतनी जिद पैदा कर दी कि मैंने यह लक्ष्य हासिल करने की ठान ली।”
निष्कर्ष: एक तमाचा नहीं, प्रेरणा
प्रेमनाथ की यह कहानी सिर्फ एक बॉलीवुड स्टार की सफलता की दास्तान नहीं है। यह जीवन का एक बड़ा सबक है। यह सिखाती है कि अपमान या असफलता को गुस्से या निराशा में बदलने की बजाय, उसे अपनी सफलता की ईंधन कैसे बनाया जाए। उस टिकट चेकर का तमाचा एक ‘सेटबैक’ नहीं, बल्कि एक ‘सेटअप’ साबित हुआ।
यह कहानी हमें प्रेमनाथ के दिलदार और महान इंसान होने का भी एहसास कराती है। सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी उन्होंने अपने अतीत को नहीं भुलाया और उस इंसान को सम्मान दिया, जिसने अनजाने में उनके जीवन की दिशा बदल दी। ऐसे थे जबलपुर के गौरव, अमर प्रेमनाथ – जिनकी जिद ने उन्हें सिर्फ फिल्मों का स्टार ही नहीं, बल्कि अपने सपनों के साम्राज्य का बादशाह बना दिया।
क्या आपको भी जीवन में कभी ऐसा ‘झापड़’ मिला है, जिसने आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा दी? नीचे कमेंट में जरूर बताएँ।









