- अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

अगर आपने 90s की कल्ट फिल्म ‘करन अर्जुन’ देखी है (और कौन नहीं देखता जब वह टीवी पर आती ही रहती है!), तो आप उस बातूनी, थोड़े डरपोक, लेकिन दिल के अच्छे मुंशी को ज़रूर याद करेंगे। वही मुंशी जो बार-बार अपने ठाकुर से हाथ जोड़कर कहता है, “ठाकुर तो गियो!”
उस मुंशी का असली नाम है अशोक सराफ। और हैरानी की बात यह है कि यह शख्स सिर्फ एक फिल्म का किरदार नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के पिछले 50 सालों का एक जीता-जागता, चमकता हुआ इतिहास है। वह हीरा जिसकी चमक शायद हिंदी सिनेमा ने पूरी तरह नहीं पहचानी, लेकिन जिसने अपनी हंसी और अपने अदाकारी के जादू से करोड़ों दिलों पर राज किया है।
चलिए, आज हम इसी मामा (जी हाँ, लोग उन्हें प्यार से मामा ही बुलाते हैं!) की ज़िंदगी की मस्ती भरी और संघर्षों भरी दास्तां सुनते हैं।
वो बच्चा जो पढ़ाई छोड़ स्टेज पर आ टपका
अशोक सराफ का जन्म 4 जून 1947 को मुंबई के चिखलवाड़ी इलाके में एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहां बिजनेस को ही असली पढ़ाई माना जाता था। उनके पिता इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का कारोबार करते थे। उनका सपना था कि उनका बेटा पढ़-लिखकर एक ‘अच्छी नौकरी’ करे। एक सुरक्षित, तनख्वाह वाली नौकरी।
लेकिन अशोक सराफ का दिल तो बचपन से ही एक और दुनिया में धड़कता था – अभिनय की दुनिया। वह पढ़ाई से ज्यादा नाटकों में दिलचस्पी रखते थे। उनका पहला नाटक महान मराठी लेखक विष्णु सखाराम खांडेकर के महाकाव्य ‘ययाति’ पर आधारित था। और हैरान करने वाली बात? उस नाटक में उन्होंने एक ‘विदूषक’ यानी जोकर का रोल किया था। शायद तभी से उनकी किस्मत में लोगों को हंसाना लिखा था।
उस वक्त ना तो उनके पिता को यह अंदाजा था और ना ही शायद खुद अशोक को, कि यह जोकर वाला रोल आगे चलकर उन्हें करोड़ों लोगों का चहेता ‘मामा’ बना देगा।
छोटे-छोटे रोल और बड़े-बड़े सपने
नाटकों में अपनी धाक जमाने के बाद अशोक सराफ का रुख फिल्मों की तरफ हुआ। मराठी सिनेमा के मशहूर डायरेक्टर गजानन जागीरदार ने उन्हें अपनी एक फिल्म में एक छोटा सा रोल दिया। वह रोल इतना छोटा था कि उससे ना तो नाम मिला, ना ही शोहरत, और ना ही खास पैसे।
लेकिन अशोक सराफ हार मानने वालों में से नहीं थे। वह चार साल तक लगातार छोटे-मोटे रोल करते रहे। मेहनत और इंतज़ार का फल 1975 में आया, जब मराठी फिल्म ‘पांडू हवलदार’ रिलीज़ हुई। इस फिल्म में दादा कोंडके जैसे दिग्गजों के साथ काम करके अशोक सराफ ने सबका ध्यान खींचा। यह फिल्म एक जबर्दस्त हिट साबित हुई और आज भी इसे मराठी सिनेमा की एक आइकॉनिक फिल्म माना जाता है। इसी फिल्म के साथ अशोक सराफ की किस्मत की गाड़ी आखिरकार पटरी पर चढ़ गई।
हिंदी सिनेमा का वो ‘अनसुना’ सितारा
अशोक सराफ ने हिंदी फिल्मों में भी काम किया, बहुत काम किया। लेकिन एक दुखद सच्चाई यह है कि हिंदी सिनेमा ने उनकी प्रतिभा को कभी पूरी तरह से नहीं पहचाना। उन्हें अक्सर ‘कॉमेडियन’ के एक खास दायरे में बांधकर रख दिया गया। उन्हें वो गंभीर और मुख्य भूमिकाएं कभी नहीं मिलीं, जिनके वह हकदार थे।
लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी छाप नहीं छोड़ी? बिल्कुल नहीं! उन्होंने हर छोटे-बड़े रोल में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनके कुछ किरदार तो आज भी याद किए जाते हैं।
- · करन अर्जुन (1995): “ठाकुर तो गियो!” वाला मुंशी। यह डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।
- · यस बॉस (1997): शाहरुख खान के दोस्त की भूमिका में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने फिल्म को और भी मजेदार बना दिया।
- · जोरू का गुलाम (1998): गोविंदा के मामा बनकर उन्होंने ऐसी धूम मचाई कि दर्शक ठहाके लगाते हुए थक गए।
- · सिंघम (2011): इस एक्शन फिल्म में भी उनके ‘हेड कॉन्स्टेबल’ के किरदार ने कॉमेडी का तड़का लगा दिया।
यानी, हिंदी सिनेमा ने चाहे जितना कम मौका दिया, अशोक सराफ ने हर मौके को यादगार बना दिया।
कैसे बने ‘मामा’? एक मज़ेदार किस्सा
अशोक सराफ के ‘मामा’ बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। यह सिलसिला 70 के दशक के अंत में शुरू हुआ। कोल्हापुर में एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी। उस यूनिट के एक कैमरामैन, प्रकाश शिंदे, अक्सर अपनी छोटी बेटी को सेट पर लेकर आते थे। वह बच्ची को अशोक सराफ को दिखाकर कहते, “देखो, वो रहे तुम्हारे अशोक मामा!”
धीरे-धीरे यह मजाक पूरी यूनिट में फैल गया। सबने अशोक सराफ को ‘मामा’ कहना शुरू कर दिया। और फिर क्या था, यह नाम इतना प्यारा लगा कि अशोक सराफ पूरी मराठी फिल्म इंडस्ट्री के ‘मामा’ बन गए। आज भी पूरी इंडस्ट्री उन्हें इसी प्यार भरे नाम से बुलाती है।
छोटे पर्दे पर भी जलता रहा दीया
अशोक सराफ का जादू सिर्फ बड़े पर्दे तक ही सीमित नहीं रहा। 90s के दशक में जब टीवी धारावाहिकों का स्वर्ण युग था, उन्होंने छोटे पर्दे पर भी वही धूम मचाई।
- · हम पांच (1995): दूरदर्शन पर आने वाले इस कल्ट शो में उन्होंने पांच बेटियों के पिता, मिस्टर माथुर की भूमिका निभाई। उनकी परेशानियां और उन पर किया गया उनका कॉमिक अभिनय लोगों के दिलों को छू गया।
- · डोंट वरी हो जाएगा: सहारा टीवी का यह शो भी बेहद लोकप्रिय हुआ। दिलचस्प बात यह है कि इस शो को उनकी पत्नी, निवेदिता जोशी सराफ ने प्रोड्यूस किया था।
वो भयंकर हादसा जिसमें बच गई थी जान
साल 2012 की बात है। मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे पर टालेगांव के पास अशोक सराफ की कार का भयंकर एक्सीडेंट हो गया। कार बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई थी। कार की हालत देखकर किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि कोई व्यक्ति इस हादसे में बच भी सकता है। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अशोक सराफ उस भयानक हादसे में चमत्कारिक रूप से बच गए। उस वक्त हर किसी ने कहा कि अभी तो इस मामा को दर्शकों का खूब मनोरंजन करना है। भगवान ने उन्हें इसलिए बचा लिया।
निष्कर्ष
अशोक सराफ का सफर सिर्फ एक एक्टर की कहानी नहीं है। यह जुनून, लगन और विनम्रता की मिसाल है। उन्होंने कभी भी अपनी तारीफों का शोर नहीं मचाया, ना ही कभी रोल को लेकर कोई मांगें कीं। उन्होंने जो भी मौका मिला, उसे पूरे जोश और मेहनत से निभाया।
वह उन विरल कलाकारों में से हैं जिन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। ‘ठाकुर तो गियो’ जैसा डायलॉग उनकी आवाज़ और अदायगी के कारण ही अमर हो गया। वह सिर्फ एक कॉमेडियन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण अभिनेता हैं, जिन्होंने ड्रामा से लेकर कॉमेडी तक हर विधा में अपना लोहा मनवाया।
आज पांच दशक बाद भी, अशोक सराफ सक्रिय हैं और दर्शकों का दिल जीत रहे हैं। वह हमें यह सबक देते हैं कि सफलता के लिए बड़े-बड़े बैनर या ऊंचे पद की जरूरत नहीं होती। अगर आपमें प्रतिभा है और कुछ कर गुजरने का जुनून है, तो एक छोटा सा रोल, एक छोटा सा डायलॉग भी आपको लोगों के दिलों में हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर सकता है।
तो अगली बार जब आप ‘करन अर्जुन’ में उस मुंशी को देखें, तो याद रखिएगा, आप सिर्फ एक किरदार को नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की एक जीवित विरासत को देख रहे हैं। हमारे प्यारे मामा, अशोक सराफ को।










