इटारसी। शहर के बीचों-बीच अग्रवाल भवन के पीछे नजूल की जमीन पर खड़ी हुईं 11 दुकानें महज लोहे का ढांचा नहीं हैं, बल्कि ये इटारसी प्रशासन की इकबालिया ताकत को सरेआम दी गई चुनौती हैं। सवाल यह नहीं है कि ये दुकानें अवैध हैं, यह तो दस्तावेजों में सिद्ध हो चुका है। सवाल यह है कि क्या तहसीलदार के आदेश का हथौड़ा इन दुकानों पर चलेगा, या फिर रसूखदारों के गांधी छाप रंगीन कागज एक बार फिर कानून की आंखों पर पट्टी बांध देंगे?
तहसीलदार का आदेश, सीएमओ का इंतजार
वर्तमान स्थिति किसी प्रहसन से कम नहीं है। तहसीलदार सुनीता साहनी ने दावा किया है कि उन्होंने 21 जनवरी को नगर पालिका सीएमओ को इन गुमटियों को हटाने का लिखित आदेश जारी कर दिया है। दूसरी तरफ, सीएमओ रितु मेहरा का कहना है कि उनके पास अब तक कोई पत्र नहीं पहुंचा है। प्रशासनिक गलियारों में चल रही यह नूरा-कुश्ती जनता की समझ से परे नहीं है। जब रातों-रात निर्माण हो रहा था, तब प्रशासन मौन था। अब जब हाईकोर्ट के निर्देशों और आरटीआई एक्टिविस्ट के दबाव में आदेश जारी हुए हैं, तो फाइलें कछुआ चाल से चल रही हैं। आखिर यह देरी किसलिए की जा रही है?
दिन-दहाड़े ढेंगा दिखाता निर्माण
अग्रवाल भवन के पीछे 800 वर्गफीट पर जिस रफ्तार से 11 दुकानें तानी गईं, उसने साबित कर दिया कि निर्माणकर्ता को न तो कलेक्टर के आदेश का डर था, जिन्होंने मई 2024 में पट्टा खारिज कर दिया था, और न ही हाईकोर्ट की जनहित याचिका का।
चर्चा का बाजार गर्म : नगर में चर्चा है कि इस अवैध साम्राज्य के पीछे किसी ऐसे रसूखदार का हाथ है, जिसकी पहुंच ऊपर तक है।
प्रशासन का मजाक : दिन-दहाड़े शटर ठोंके गए, लेकिन नजूल और नगर पालिका का अमला धृतराष्ट्र बना रहा।
टूटेगा अतिक्रमण या मरेगा कानून?
अब गेंद नगर पालिका के पाले में है। तहसीलदार के आदेश के बाद नगर पालिका के पास बहाने बनाने की गुंजाइश खत्म हो गई है। लेकिन इटारसी का पिछला इतिहास गवाह है कि कई बार फाइलें टेबल के नीचे दबकर दम तोड़ देती हैं।
बड़ा सवाल क्या एसडीएम नीलेश शर्मा और तहसीलदार सुनीता साहनी अपने आदेश को अमली जामा पहना पाएंगे? क्या मुख्यमंत्री के बुलडोजर न्याय वाली छवि इटारसी में बरकरार रहेगी, या फिर रसूखदारों के रंगीन कागज सरकारी मशीनरी को फिर से जाम कर देंगे?









