इटारसी। कन्याकुमारी से शुरू हुई ‘किसान जागृति यात्रा’ जब आज इटारसी के जयस्तंभ चौक पहुंची, तो वहां केवल जिंदाबाद के नारे नहीं थे, बल्कि उन सात लाख परिवारों की सिसकियां भी थीं जिन्होंने कर्ज की बलिबेदी पर अपने अपनों को खो दिया। संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले जुटी इस महापंचायत ने साबित कर दिया कि नर्मदापुरम, हरदा और नरसिंहपुर की मिट्टी का दर्द भी वही है जो पंजाब और हरियाणा का है।
हम खालिस्तानी नहीं, खाली पेट वाले किसान हैं
आंदोलन का चेहरा बने बुजुर्ग नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल की आवाज में उम्र की थकान नहीं, बल्कि एक गहरी टीस थी। उन्होंने उन आरोपों का जवाब दिया जो अक्सर किसानों पर मढ़े जाते हैं। डल्लेवाल ने भावुक होते हुए कहा, ‘जब हम हक मांगते हैं, तो सरकार हमें ‘खालिस्तानी’ कह देती है। क्या मैं आपको खालिस्तानी दिखता हूं? मैं एक किसान हूं जो 7 फरवरी से सिर्फ तीन-चार रोटी खाकर शरीर की आखिरी ताकत तक लड़ रहा हूं ताकि मेरे पोतों को वह दिन न देखना पड़े जो आज का किसान देख रहा है।
पूंजीपतियों पर मेहरबानी और किसान की खाली थाली
हरियाणा से आए युवा नेता अभिमन्यु कोहार ने सत्ता के दोहरे मापदंडों पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि राजनैतिक दल विपक्ष में रहते हुए किसान के पैर धोते हैं और सत्ता में आते ही 180 डिग्री का ‘यू-टर्न’ ले लेते हैं। कोहार ने सीधे तौर पर चुनौती देते हुए कहा, सरकार की जेब उद्योगपतियों का लाखों करोड़ का कर्ज माफ करने के लिए हमेशा भरी रहती है, लेकिन जब बात एमएसपी की आती है, तो खजाना खाली हो जाता है।
तीन प्रमुख स्तंभ : किसानों की आवाज
- –जगजीत सिंह डल्लेवाल – कर्ज के कारण पिता को खोने वाले बच्चों और संघर्ष करती माताओं का दुख अब और नहीं देखा जाता।
- – अभिमन्यु कोहार : अमेरिका-भारत ट्रेड डील देश के लिए धीमा जहर है। सरकार मंत्रियों को हमसे खुली बहस के लिए भेजें।
- – लीलाधर राजपूत : 40 साल पहले बोया गया संघर्ष का बीज अब क्रांतिकारी किसान मजदूर संगठन का विशाल वृक्ष बन चुका है।
दर्द की दास्तां : क्यों जरूरी है यह आंदोलन?
- कर्ज की जंजीरें : किसान नेताओं ने साफ कहा कि 7 लाख किसानों की आत्महत्या कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र पर धब्बा है। कर्ज मुक्ति ही एकमात्र रास्ता है।
- विदेशी दखल का डर : अमेरिका के साथ होने वाली ट्रेड डील को लेकर चेतावनी दी गई कि वहां की जीएम क्रॉप्स भारतीय नागरिकों में कैंसर जैसी बीमारियां और वातावरण में असंतुलन पैदा करेंगी।
- लोकतंत्र पर सवाल : डल्लेवाल ने पूछा कि जिस किसान के अनाज से सरकार गरीबों का पेट भरती है, उसी किसान को दिल्ली जाने से रोकने के लिए कीलें और पुलिस क्यों लगाई जाती है?
अगला पड़ाव : 19 मार्च, दिल्ली कूच
मंच से सोनू ओलकर और इंद्रजीत पन्नीवाला ने एकजुटता का आह्वान करते हुए कहा कि किसान परिवारों को नेताओं ने बांटने की कोशिश की है, लेकिन अब समय एक होने का है। उन्होंने 19 मार्च को दिल्ली में होने वाली बड़ी महापंचायत के लिए हर घर से एक भाई, एक बहन के निकलने की अपील की। इटारसी की सभा से यह संदेश साफ चला गया है कि किसान अब लाठियों और गोलियों से नहीं डरता। उनकी लड़ाई अब सिर्फ फसल के दाम की नहीं, बल्कि अपनी अगली पीढ़ी की नस्ल बचाने की है।










