- अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

किसी भी भारतीय शादी की बात हो और ‘आज मेरे यार की शादी है’ का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। चाहे वह पंजाब की हो या बंगाल की, गुजरात की हो या बिहार की, इस गाने ने हर बरात में अपनी जगह बनाई है। और जब बेटी की विदाई का वक्त आता है, तो ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ सुनकर कठोर से कठोर दिल भी पिघल जाता है। पिता की आंखें भर आती हैं और मानो सालों से रुका हर दर्द एक साथ बह निकलता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये दोनों गाने, जो एक तरफ जश्न का प्रतीक हैं और दूसरी तरफ विदाई की गहरी पीड़ा, एक ही संगीतकार की देन हैं? और सबसे खास बात यह कि ये गाने सिर्फ हिंदू परिवारों में ही नहीं, बल्कि मुस्लिम बारातों में भी उतने ही धूमधाम से बजते हैं। ऐसे गाने जो दो समुदायों की बरातों को एक सुर में बांध दें, बहुत कम बने हैं।
यह कहानी है उस शख्स की, जिसने अपने संगीत से न सिर्फ फिल्मों को अमर बनाया, बल्कि हर भारतीय के घर की खुशियों और गमों का हिस्सा बन गया। यह कहानी है संगीतकार रवि की।
मलाड स्टेशन की उन रातों से निकलकर…
रवि का सफर आसान नहीं था। वह गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे थे। पैसे नहीं थे, ठिकाना नहीं था। शुरुआती दिनों में उन्होंने मलाड रेलवे स्टेशन पर रातें गुजारीं। लेकिन जिनमें हुनर हो, उन्हें ज्यादा दिन इंतजार नहीं करना पड़ता।
रवि ने हारमोनियम बजाना सीखा। संगीत की कोई औपचारिक तालीम नहीं थी, सिर्फ पिता के भजन सुनकर जो मिला था, वही पूंजी थी। दिल्ली में एक मुलाकात में मोहम्मद रफी ने उन्हें संगीत सीखने के बाद मुंबई आने को कहा था। रवि ने वह बात मानी और हारमोनियम को अपना सबसे करीबी दोस्त बना लिया।
पहला ब्रेक तब मिला जब एस डी बर्मन ने उन्हें फिल्म ‘नौजवान’ (1951) के गीत “झनक झनक झन झन ना…” के कोरस में शामिल किया। फिर हेमंत कुमार ने उन्हें ‘आनंद मठ’ (1952) के ‘वंदे मातरम्’ के कोरस में लिया और बाद में अपना सहायक बना लिया। यहीं से रवि के संगीत यात्रा की नींव पड़ी।
वो गाने जो हर दिल के करीब हैं
रवि ने एक से बढ़कर एक गाने दिए। लेकिन शादी से जुड़े उनके गानों का जादू कुछ अलग ही है। ‘मेरा यार बना है दूल्हा’ हो या ‘डोली चढ़ के दुल्हन ससुराल चली’, हर गाने में एक अलग रंग है। ‘आज मेरे यार की शादी है’ आज भी किसी भी बारात में सबसे ज्यादा बजने वाला गाना है। यह वह गाना है जिसने 1977 में फिल्म ‘आदमी सड़क का’ से सफर शुरू किया और फिर कभी रुका नहीं।
और ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’… इस गाने ने शायद हर उस पिता को रुलाया होगा, जिसने अपनी बेटी की विदाई देखी है। इतना सरल, इतना गहरा, और इतना दर्द भरा गाना बहुत कम बने हैं।
लेकिन रवि सिर्फ शादी के गानों तक सीमित नहीं थे। उन्होंने बच्चों के लिए भी गाने बनाए। ‘वचन’ फिल्म में आशा भोसले का गाया “चंदामामा दूर के, पुए पकाएं बूर के” उन्हीं की देन थी। यह उनकी पहली फिल्म थी एक संगीतकार के तौर पर।
बीआर फिल्म्स और साहिर के साथ सुनहरा सफर
रवि का सबसे उल्लेखनीय काम बीआर फिल्म्स के साथ रहा। ‘गुमराह’ से उन्होंने गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ काम करना शुरू किया और यह जोड़ी इतिहास रच गई। ‘वक़्त’, ‘हमराज़’, ‘आदमी और इंसान’, ‘धुंध’, ‘निकाह’ और ‘दहलीज़’ – ये सारी फिल्में आज भी अपने संगीत के लिए याद की जाती हैं।
रवि और साहिर की जोड़ी ने जादू बिखेरा। ‘चौदहवीं का चाँद’, ‘दो बदन’, ‘आँखें’ जैसी फिल्मों में उनके संगीत ने साहिर की शायरी को और ऊंचाई दी। रवि खुद कहते थे कि वह साहिर के साथ बहुत सहज महसूस करते थे और उनकी शायरी को समझने में उन्हें कभी परेशानी नहीं हुई।
‘काजल’, ‘नीलकमल’, ‘दो कलियाँ’, ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ और ‘एक महल हो सपनों का’ – इन फिल्मों में भी रवि का संगीत अपने पूरे शबाब पर था।
कल्याणजी के साथ वो अनजाना किस्सा
एक दिलचस्प किस्सा आपको बताता हूं। फिल्म ‘नागिन’ का गाना “तन डोले मेरा मन डोले” आपने जरूर सुना होगा। इसमें जो बीन बजती है, वह असल में कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी के कल्याणजी ने बजाई थी। उन्होंने फ्रेंच तकनीशियन कॉनस्टैंट मार्टिन का बनाया साज ‘क्लैवियोलिना’ इस्तेमाल किया था।
लेकिन कम लोग जानते हैं कि कल्याणजी के साथ इस नए साज की संगत में अपना हारमोनियम लेकर बैठने वाले संगीतकार रवि ही थे। यह तस्वीर बताती है कि रवि उस दौर में भी, जब वह खुद एक नाम बन चुके थे, दूसरों के साथ मिलकर संगीत सृजन में लगे रहते थे। उनका हारमोनियम हमेशा उनके साथ रहा।
सम्मान और पुरस्कारों का सफर
रवि को उनके काम के लिए कई सम्मान मिले। ‘घराना’ (1961) और ‘खानदान’ (1965) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। ‘चौदहवीं का चाँद’ (1960), ‘दो बदन’ (1966), ‘हमराज़’ (1967), ‘आँखें’ (1968) और ‘निकाह’ (1982) के लिए भी उन्हें नामांकन मिले।
भारत सरकार ने 1971 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। मलयालम फिल्म ‘सुकृतम्’ (1994) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
आशा भोसले और महेंद्र कपूर को नई दिशा
रवि ने आशा भोसले के करियर को भी नई दिशा दी। “तोरा मन दर्पण कहलाए”, “आगे भी जाने न तू” और “सुन ले पुकार आई” जैसे गाने आज भी आशा की बेहतरीन रिकॉर्डिंग्स में गिने जाते हैं। वहीं, महेंद्र कपूर को लोकप्रिय गायक बनाने में भी रवि के गीतों का बड़ा योगदान रहा।
मलयालम सिनेमा में ‘बॉम्बे रवि’ का पुनर्जन्म
1970 से 1982 के बीच रवि ने हिंदी फिल्मों से लंबा विराम लिया। 1982 में उन्होंने ‘निकाह’ के लिए संगीत दिया, जिसमें “दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गए” गाने के लिए सलमा आगा को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
लेकिन असली वापसी मलयालम सिनेमा में हुई। 1986 में निर्देशक हरिहरन ने उन्हें ‘पंचाग्नि’ के लिए राजी किया। इस फिल्म के गीत “सागरंगलें” और “आ रात्री माञ्जु पोयी” (येसुदास और चित्रा द्वारा गाए गए) सुपरहिट रहे।
उसी साल ‘नखक्षथंगल’ आई और चित्रा को इसके गीत “मंजलप्रसादवुम” के लिए दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 1989 में ‘वैसाली’ के सभी गीत सुपरहिट रहे और चित्रा को “इंदुपुष्पम चूड़ी निलकुम” के लिए तीसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
रवि और हरिहरन की जोड़ी मलयालम सिनेमा की सबसे बेहतरीन जोड़ियों में गिनी जाती है।
उनकी याद में
3 मार्च 2026 को रवि की जन्मशती थी। उन्हें इस धरती पर आए सौ साल पूरे हो गए। लेकिन सवाल है – क्या हम उन्हें याद कर रहे हैं? क्या फिल्मी गानों की रॉयल्टी के लिए जुटी संस्थाएं उनके लिए एक शानदार जलसा कर रही हैं? क्या कोई म्यूजिक कंपनी उन्हें याद कर रही है? शायद नहीं। लेकिन जब भी किसी बारात में ‘आज मेरे यार की शादी है’ बजेगा, जब भी किसी विदाई में ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ सुनाई देगा, जब भी कोई मां अपने बच्चे को ‘चंदामामा’ सुनाएगी, रवि जिंदा रहेंगे।
निष्कर्ष
रवि सिर्फ एक संगीतकार नहीं थे। वह हर उस भावना के संगीतकार थे, जो एक भारतीय परिवार से जुड़ी है। उनके गानों में खुशी है, दर्द है, जश्न है और विदाई का गम है। सबसे बड़ी बात, उनके गानों ने हिंदू और मुस्लिम की बरातों को एक ही सुर में बांधा। वह सेतु बने दो समुदायों के बीच, बिना किसी ढिंढोरा पीटे।
3 मार्च 2012 को वह इस दुनिया को अलविदा कह गए। भगवान की महफिल में अब वह अपना हारमोनियम लेकर बैठ गए हैं। लेकिन उनकी धुनें आज भी हमारे बीच हैं, हर शादी में, हर विदाई में, हर उस पल में जब दिल को छू लेने वाला संगीत चाहिए।
इस जन्मशती वर्ष में, आइए हम सब मिलकर उस महान संगीतकार को याद करें, जिसने हर घर की खुशियों को अपनी धुन दी। जिसने दिखाया कि संगीत की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता। वह तो बस दिल से निकलता है और सीधे दिल में उतर जाता है।
रवि को शत-शत नमन।









