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सूफी के लिए, सूफी बनना पडता है : डॉ. भारती

सूफी के लिए, सूफी बनना पडता है : डॉ. भारती

डॉ. भारती बंधु की मंजूराज ठाकुर, भूपेंद्र विश्वकर्मा से बातचीत

डॉ. भारती बंधु की मंजूराज ठाकुर, भूपेंद्र विश्वकर्मा से बातचीत
डॉ. भारती बंधु ने कबीर की रचनाओं को भजन में ढालकर एक अलग पहचान कायम की है। उनका पूरा परिवार कबीरमय है। इनकी कबीरशैली अद्भुत है। तन पर सफेद कुरता और लुंगी, सिर पर हिमाचली टोपी सादगी के साथ जब स्वर लहरियां जुड़ती हैं तो माहौल कबीरमय हो उठता है।

संगीत की दुनिया से सूफी को चुनना, और उसमें से भी सिर्फ कबीर इसकी वजह ?
हम पांचवी जनरेशन में है। हमारा परिवार निर्गुणधारा के उपासक हैं। संगीत मुझे विरासत में मिला। हमने देखा कि सूफी संगीत बहुत आकर्षक संगीत है। लोगो को मोहब्बत के मार्ग पर ले जा रहा है और कबीर ने जब हमारे अंदर प्रवेश किया तो हमें कबीर में अपनापन मिला। उनमें कोई जात नहीं, कोई मजहब नहीं, कोई बंधन नहीं, कबीर ने हमको अपना कर लिया। वो सिर्फ एक विशुद्ध परमात्मा की बात करते हैं, पाखंड से दूर रहने की बात करते है, समानता और सदभावना की बात करते हैं। वो हमको ज्यादा आकर्षण लगा और जैसे हम गोता लगाते गए हम कबीर के हो गए।

सूफी सही मायने में है क्या ?
मैंने विधिवत सूफी संगीत 15 वर्ष सीखा है। जो हमने सीखा है उसमें प्रेम के, अध्यात्म के कलाम होते थे। संतों ने जो वाणी कही उसकी बात होती थी। एक रूप वो है जो तोहीद, नाद शरीफ गाते हैं। यह सारी बातें हमने विधिवत सीखी। सूफी शब्द का सही मायने जो हमने सीखा य जो हमने तलाश किया है, वो है जैसे हम अपने जिस्म की सफाई करते हैं, उसी तरह जितना जरूरी हमारी शरीर की सफाई है उससे ज्यादा जरूरी हमारी रूह की सफाई है और अंदर की जो सफाई की प्रक्रिया है उसे कहते हैं सूफी। सफा शब्द से सूफी बना है जो अंदर की सफाई करें वो है सूफी।

आज का सूफी संगीत आपकी नजर में ?
वो सूफी नहीं कुल्फी है, मैं खुलकर उसका विरोध करता हूं। क्योंकि सूफी में तो यार से यार मिलाने की बात होती है, दिल में चोट लगने की, दिल में गहराई से उतरने की बात होती है, अपना भान खोने की बात होती है। जबकि आज सूफी में गाया कुछ ओर जा रहा है उसका ऑडियो, वीडियों कुछ बोलता है हम परिवार के साथ नहीं देख सकते, उसके मायने बदलते रहते है। ये सूफी नहीं है। सूफी के लिए सूफी बनना पडता है। जब तब किसी बुजुर्ग की नजरें इनायत नहीं होगी तब तक बात आपमें नहीं आयेगी ये हमारा तुर्जुबा है।
सूफी के लिए एक फार्मेट है उसकी एक मर्यादा है जिससे हम बाहर नहीं जा सकते। इस बात से इंकार नहीं है कि सूफी को जानने, पेश करने वाले नहीं है पर ज्यादातर सूफी के नाम से कुल्फी बेची जा रही है। सूफी के लिए विधिवत आपको सूफी सीखना पडेगा।

कबीर की बानी से सूफियाना हुआ समां
इटारसी। स्पिक मैके अध्याय इटारसी एवं लायंस क्लब इटारसी सुदर्शन के तत्वावधान में साईं कृष्णा रिसोर्ट सभागार में आयोजित कार्यक्रम में कबीरबानी, सूफी एवं गजल के ख्यातिलब्ध गायक डॉ. भारती बंधु ने कबीर के भक्ति पद दमा दम मस्तक कलंदर…, छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के.., और जैसे सूरज की गर्मी से…, बंदिशें पेश की।
स्पिकमैके की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कबीर के पदों के रहस्य, गायकी के माध्यम से भारती बंधुओं ने अपनी गायन शैली में दिखाए। डॉ. भारती ने कबीर व रहीम के दोहे प्रस्तुत कर समां बांध दिया। आज कार्यक्रम में गोपी भारती एवं पारस भारती सहगायक, अनुभव भारती तबला वादक, मितेश भारती सहयोगी थे।
कार्यक्रम का शुभारंभ नगर पालिका परिषद की अध्यक्ष श्रीमती सुधा अग्रवाल ने किया। इस अवसर पर ग्रेन मर्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेन्द्र अग्रवाल, स्पिक मैके अध्यक्ष हेमंत शुक्ला वरिष्ठं उपाध्यएक्ष अधिकारी सुरेश दुबे, भाजपा से डा नीरज जैन, कार्यक्रम समन्वयक सुनील बाजपेयी, लायंस अध्यक्ष मो.अयूब खान, सांस्कृतिक समन्यवक भारतभूषण गांधी सहित लायंस क्लब और स्पिक मैके के सभी पदाधिकारी एवं गणमान्य नागरिक मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन समन्वयक सुनील बाजपेयी ने किया।

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