समीक्षा ‘ औरत ‘ : डॉ . प्रतिभा सिंह परमार राठौड़

डॉ . प्रतिभा सिंह परमार राठौड़ ने अपने लेखन से बहुत ही अल्प समय में न केवल मध्यप्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है । उनका जन्म भगवानपुरा , खण्डवा ( माखनलाल जी चतुर्वेदी की कर्मभूमि ) में हुआ तो माखननगर ( माखन दादा की जन्म भूमि ) उनकी कर्मभूमि बनी । इस अद् भुत संयोग ने उनकी सृजनशीलता को जन्म दिया तो पिता स्व. श्री मनोहर सिंह परमार ने उन्हें निरन्तर प्रोत्साहित कर उनको इस मुकाम तक पहुंचाया । ‘अंतरा शब्दशक्ति प्रकाशन ‘ द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह ‘ औरत ‘ में डॉ. प्रतिभा सिंह की नई कविताओं का समावेश किया गया है । विराम , शून्य , राख , हुकूमत , पानी , बदले तो सिर्फ ‘ तुम ‘ , मैं और मेरी ‘ चुप ‘ , आईना , वेदना , पलाश , मैं स्वयं ही मेवासा हूं , हो सके तो आदि ऐसी ही रचनायें हैं जो उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को प्रतिबिंबित करती हैं ।
‘ विराम ‘ उनकी बहुचर्चित कविता है जो भावनात्मक स्तर पर बेहद प्रभावित करती है । वे सभी विधाओं में लिखती हैं लेकिन प्रतिभा जी की ये कविता एकबारगी तो स्तब्ध कर देती है –

तुम भी कहो
रुक – रुक कर
गर
विरामों को जानते हो ।

संग्रह में सम्मिलित् उनकी हर कविता उनके लेखन की सार्थकता को साबित करती है । उदाहरण के लिए डॉ . प्रतिभा सिंह परमार राठौड़ की एक अन्य प्रतिनिधि कविता ‘ शून्य ‘ उनकी दार्शनिकता का बोध कराती चलती है । ‘ शून्य ‘ से शुरू एक यात्रा को अन्ततः ‘ मेवासा ‘ पर खत्म कर निश्चित ही उन्होंने ‘ औरत ‘ को सर्वशक्तिमान होने का अहसास कराया है क्योंकि इसी औरत में न केवल उसमें अनन्त बह्मांड समाया हुआ है बल्कि वह समूची सृष्टि को भी अपने में समेटे हुए है । इन सबका अस्तित्व भी तो ‘औरत ‘ के वजूद पर ही टिका हुआ है । आप देखेंगे कि डॉ. प्रतिभा सिंह कितनी आसानी से ‘ शून्य ‘ शीर्षक से उनकी कविता में अपने को सामने रखकर एक ‘औरत ‘ को उसका खोया हुआ सम्मान ये कहकर वापस कर देती हैं कि –

‘ मैं भले ही शून्य हूं लेकिन मैं ही सत्य हूं , मैं शिव हूं , मैं शक्ति हूं तो मैं ही सुंदरम् भी हूं । ‘

डॉ . प्रतिभा सिंह परमार राठौड़ की सृजन यात्रा में उक्त कविता एक मील के पत्थर की भांति उनको स्थापित करती है । इस कविता के पीछे छिपी उनकी सहजता , सरलता , गांभीर्य ही उनकी असल पहचान है । यही वजह है कि ‘ स्त्री विमर्श ‘ की सबसे बड़ी पैरोकार मेहरुन्निसा जी परवेज़ जैसी स्थापित लेखिका भी उनसे ये कहने में पीछे नहीं हटतीं कि – ‘ प्रतिभा आप कहीं नहीं हैं क्योंकि आप अपनी कविताओं में मौजूद हैं और वही आपकी सही जगह भी है । ‘ इतना ही नहीं इधर अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक अनुराधा शंकर सिंह ने भी उनके लेखन की सराहना करते हुए हमेशा उनका हौंसला बढ़ाया है । सुप्रसिद्ध गीतकार संतोष जैन इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उनके बारे में अपनी बेबाक राय कुछ इस तरह ज़ाहिर करते हैं – ” प्रतिभा यथा नाम तथा गुण हैं । भले ही शेक्सपीयर ये कहें कि ‘ नाम में क्या रखा है ‘ लेकिन यहां तो जो कुछ भी है सब डॉ . प्रतिभा सिंह परमार राठौड़ के नाम में ही है। ” इसी तरह उनकी अन्य कविताओं में भी वे अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराती हैं ।
अपने पिता के प्रति वे बहुत संवेदनशील हैं । उनके संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कविता ‘ राख ‘ में डॉ. प्रतिभा सिंह बेहद भावुक नज़र आती हैं –

माँ जब भी खड़ी होती है
दर्पण के आगे
तो
मालूम है मुझे कि …
उस दर्पण में
एक अक्स पहले उभरता होगा ।

यकीनन ये अक्स उनके पिता का है जिनकी हथेलियों का स्पर्श आज भी वे अपने माथे पर महसूस करती हैं । यहां तक कि पिता की अस्थियों और राख को भी वे उसकी सम्पूर्णता के साथ आशीर्वाद की भांति ग्रहण करती हैं । यहां प्रतिभा जी सांसारिक न होकर एक दार्शनिक की तरह खड़ीं नज़र आती हैं ।
पर्यावरण के लिए उनके मन में गहरी चिंता है । तभी तो वे ‘ पानी ‘ जैसी कविता की रचना कर पाती हैं । इस कविता में डॉ. प्रतिभा सिंह परमार राठौड़ ‘ पानी ‘ बचाने के प्रति कृत संकल्पित दिखाई देती हैं । वे और उनकी कवितायें भी पानी की तरह निर्मल , स्वच्छ , अविचल , अविरल हैं । उनमें कहीं कोई दुराव-छिपाव , छल – कपट नहीं । डॉ. प्रतिभा सिंह बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात कहने का साहस रखती हैं । यही साहस उन्हें अपने समकालीन लेखक / लेखिकाओं से अलग खड़ा कर देता है । ये तय है कि केवल समय ही उनकी कविताओं का आकलन करने की क्षमता रखता है । उनका सवाल इसका सबसे बड़ा प्रमाण है –

मनुज !
तुझसे
एक ही सवाल
क्यों लूट रहे हो
पोखर ताल ?
प्रतिभा जी की वेदना उनकी ‘ वेदना ‘ शीर्षक से कविता में पूरी तरह उभर कर सामने आई है –
वेदना के
अनुबद्ध संगीत में
अनायास ही
थिरकते पग उसके
सन्नाटे के साहचर्य में
क्षण-प्रतिक्षण
रीतते दिन उसके …
डॉ. प्रतिभा सिंह परमार राठौड़ के पिता स्व. श्री मनोहर सिंह परमार फारेस्ट ऑफिसर रहे हैं इसलिये प्रकृति से प्रतिभा जी का भी बचपन से नाता रहा । उन्होंने अपने आप को हमेशा प्रकृति के करीब पाया है । वही सब कुछ उनकी कविता में कब उतर आया उन्हें भी इसका अहसास नहीं । देखिये न कितनी सहजता और सरलता से वे अपनी कविता ‘ पलाश ‘ में प्रकृति से संवाद कर रही हैं –
सुनो पलाश !
कहाँ से लाते हो
ये अंदाज़ , ये सुर्ख रंग
ये टेसुओं का उन्माद ?

मैं सही मायने में डॉ. प्रतिभा सिंह की ” मैं स्वयं ही मेवासा हूँ ” शीर्षक से कविता को उनकी प्रतिनिधि कविता मानता हूं । इस कविता से हिन्दी साहित्य जगत में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है । कविता की एक बानगी आप स्वयं देखिये –

एक रक्त राजपूत है मुझमें
भीतर मेरे हैं कई सेनायें
अंतर्मन में जयघोष सदा
अंतर्निहित जयगाथायें .
संग्रह की अंतिम कविता ‘ हो सके तो ‘ में उनकी निराशा , उनकी बेचैनी , उनकी छटपटाहट , उनकी अपेक्षायें उनके जीवन के अधूरेपन की ओर इशारा करती हैं । लगता है ज़िंदगी में जैसे उनसे काफी कुछ छूट गया है । प्रतिभा जी की तरह मांगते तो हम भी सारा ‘ संसार ‘ ही हैं परंतु मिलता हमें वही है जो हमारा प्रारब्ध तय करता है । जो हमारी नियति है । इसलिये तो निदा फ़ाज़ली भी कहते हैं – ‘ कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ‘ । भले ही हम भी डॉ. प्रतिभा सिंह की भांति ‘ हो सके तो ‘ मैं सिमटकर रह जाते हैं मगर ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जिसकी वे कामना करती हैं उन्हें वह सब कुछ मिले क्योंकि इस कविता में प्रतिभा जी एक जगह कहती भी तो हैं –
हो सके तो
मुझे
माँग लेना तुम
किन्तु
जानती हूँ
बात
होने की नहीं
हो सकने की है ।

अंत में इतना ही कि मात्रा की थोड़ी बहुत त्रुटियों के बावजूद ‘ अंतर शब्द शक्ति प्रकाशन ‘ के माध्यम से डॉ. प्रीति खुराना का प्रयास निश्चित ही सराहनीय है । हालांकि कविता में मात्रा की अशुद्धियां उसकी गम्भीरता को प्रभावित करती हैं । डॉ. प्रतिभा सिंह की ‘ अपनी बात ‘ तथा उनके ‘ व्यक्तित्व दर्पण ‘ तक में इस तरह की त्रुटियां देखने को मिलतीं हैं । भूमिका का अभाव अखरता है । हालांकि कहना तो संदीप सोनी द्वारा ‘ बनाये गए ‘ आवरण चित्र के विषय में भी बहुत कुछ था परंतु मेरे लेखन की अपनी सीमायें और मर्यादायें हैं जिनका अतिक्रमण करना मेरे संस्कारों में नहीं । मैं औरों की तरह नहीं । इसलिये मेरी समीक्षा भी निष्पक्ष रहती है । कुल मिलाकर ‘ अंतरा शब्द शक्ति प्रकाशन ‘ द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह ‘ औरत ‘ पठनीय बन पड़ा है । वैसे इस संग्रह को पढ़ने के लिए डॉ. प्रतिभा सिंह परमार राठौड़ का नाम ही पर्याप्त है । उनके नाम के आगे जुड़े स्थान माखननगर और खंडवा ‘ एक भारतीय आत्मा ‘ पं. माखन लाल चतुर्वेदी का स्मरण कराते हैं । डॉ. प्रतिभा सिंह उनकी परम्परा की ही लेखिका हैं ।

विनोद कुशवाहा, संपादक, ‘ मानसरोवर ‘ इटारसी

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