- अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर
धुरंधर: वो दुर्लभ सिनेमाई अनुभव जहाँ हर सेकंड दिल की धड़कन बढ़ जाए“फिल्म तीन घंटे चौंतीस मिनट की है।”यह सुनते ही आधुनिक, छोटे अटेंशन स्पैन और एक मिनट की रील वाले दौर में कई दर्शकों के मन में एक हल्की आशंका उठती है। क्या इतने लंबे रन टाइम में धैर्य टिकेगा? कहीं बोरियत न घेर ले? लेकिन ‘धुरंधर’ के साथ ठीक उल्टा होता है।
थिएटर से बाहर कदम रखते वक्त मन में एक ही ख्याल गूंजता है: “काश यह और लंबी होती! काश यह अनुभव थोड़ा और जारी रहता!” यही अदित्य धर के निर्देशन का जादू है, एक ऐसा कमाल जिसने बॉलीवुड के स्पाई थ्रिलर जेनर को न केवल रीडिफाइन किया है, बल्कि उसे एक उच्च सिनेमाई कला का दर्जा दे दिया है।
‘धुरंधर’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक “सिनेमैटिक इमर्शन” है। यह आपको 1999 के कंधार हाइजैकिंग के दंश से लेकर 2008 के समय तक, भारत-पाकिस्तान की जटिल राजनीतिक और जासूसी उलझनों के बीच खींच ले जाती है। और इस यात्रा का हर पल आपको बांधे रखता है
तकनीकी चमत्कार: जब स्क्रीन एक जिंदा, सांस लेती दुनिया बन जाए। फिल्म की शुरुआत से ही आपको एहसास हो जाता है कि आप किसी मामूली प्रोडक्शन नहीं, बल्कि एक विजुअल महाकाव्य का हिस्सा बन रहे हैं। सुधीर पी. चौधरी की सिनेमैटोग्राफी सिर्फ ‘देखने लायक’ नहीं है, वह ‘महसूस करने लायक’ है।
कराची की तंग, धूल-भरी गलियों की गर्मी आपको लगती है। ल्यारी (कराची का इलाका) की रातों में छाई सन्नाटे की ठंड आपकी रूह तक काँप जाती है। लो-लाइट शॉट्स में इतनी डिटेल है कि अंधेरे में भी तनाव के हर भाव साफ नजर आते हैं। यह कैमरा केवल घटनाओं को दिखाता नहीं, वह उनकी ‘गंध’ और ‘बुनावट’ को कैद कर लेता है – बारूद की गंध, खून की गाढ़ी महक, और साजिश की चिपचिपी हवा।और इस विजुअल ट्रीट को पूरा करती है शिवकुमार वी. पंचापाकेशन की टाइट एडिटिंग। 214 मिनट में एक भी फ्रेम फालतू नहीं लगता। हर सीन, हर डायलॉग, हर सस्पेंसफुल पॉज एक दूसरे से इस कदर जुड़े हैं कि समय का अहसास ही खत्म हो जाता है। यह वही दुर्लभ कला है जो बड़ी कहानियों को बिना बोझिल बनाए, उन्हें दमदार पेसिंग देती है।
ध्वनि का जादू: संगीत जो रोमांच की नसों में दौड़ जाए‘धुरंधर’ की आत्मा उसके बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन में बसती है। संगीतकार (जिनका नाम इस समीक्षा में नहीं है, लेकिन उनका काम स्टैंडअलोन है) ने सेवेंटीज और एटीज के क्लासिक गानों को न केवल बैकड्रॉप के तौर पर इस्तेमाल किया है, बल्कि उन्हें कथा का एक सक्रिय पात्र बना दिया है।
‘रंभा हो… हो… हो’ या ‘हवा हवा’ जैसे गीत सिर्फ याद दिलाते नहीं, वे उस दौर की भावनात्मक और सांस्कृतिक धड़कन बन जाते हैं, रोमांच को कई गुना बढ़ा देते हैं।पर असली मास्टरस्ट्रोक है वह थीम मोटिफ – एक ऐसा संगीतमय विषय जो फिल्म में बार-बार लौटता है, हर बार थोड़ा बदलता हुआ, चरित्रों के आंतरिक संघर्ष और मिशन की गंभीरता को उकेरता है। यह तकनीक हॉलीवुड के महानों (जैसे हंस ज़िमर के ‘इनसेप्शन’ के ‘ब्रैम’ स्कोर) की याद दिलाती है।
क्लाइमेक्स के दृश्यों में, जब रणवीर सिंह अपने अंतिम लक्ष्य पर कदम बढ़ाते हैं, तो एकल वायलिन की करुण धुन और ड्रम्स की गर्जना मिलकर एक ऐसा ‘गूजबम्प्स मोमेंट’ पैदा करते हैं कि दर्शक स्तब्ध रह जाते हैं – एक सामूहिक सांस रुकने का अनुभव।अभिनय का उत्सव: जहाँ हर चेहरा एक कहानी कहता हैयहाँ हम उस कोर पर आते हैं, जिसके लिए ‘धुरंधर’ लंबे समय तक याद रखी जाएगी – उसके दमदार अभिनय संयोजन के लिए।
रणवीर सिंह एक जासूस की भूमिका में हैं जो नामहीन है, पर अमिट है। यहाँ वह अपनी सामान्य उर्जावान छवि से हटकर हैं। उनका किरदार खामोशी का महाकाव्य है। बातें कम, नजरें ज्यादा बोलती हैं। एक झलक में डर, दृढ़ता, चालाकी और दर्द सब कुछ व्यक्त हो जाता है। यह उनका करियर बेस्ट परफॉर्मेंस है जो साबित करता है कि शोर न मचाकर भी एक एक्टर स्क्रीन पर धमाका कर सकता है।संजय दत्त और आर. माधवन जैसे दिग्गज अपनी-अपनी भूमिकाओं में पूरी तरह डूबे हुए हैं, परफेक्शन के साथ अपने किरदारों को क्रेडिबिलिटी देते हैं।
विलेन की नई परिभाषा: अक्षय खन्ना का ऐतिहासिक प्रदर्शन और अब, उस शख्स की बारी जिसने इस फिल्म को यादगार बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया है – अक्षय खन्ना। अगर रणवीर सिंह फिल्म का दिल हैं, तो अक्षय खन्ना उसकी रूह की गहरी, अंधेरी और खतरनाक धड़कन हैं।अक्षय खन्ना का रोल सिर्फ एक ‘खलनायक’ नहीं है; वह एक विचारधारा, एक संस्था और एक मानसिकता का प्रतीक है। पाकिस्तानी एजेंसियों से जुड़े इस किरदार में खन्ना ने जो शांत, संयत और विषैला अभिनय दिया है, वह भारतीय सिनेमा के खलनायकों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।
मुस्कुराहट में छुपा खौफ: उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘स्टिलनेस’ है। वह चीखते-चिल्लाते नहीं, बल्कि एक मामूली सी मुस्कान से ही दर्शकों की रीढ़ में ठंडक घुसा देते हैं। यह मुस्कान अहंकार की है, योजना की है, और एक भयानक निश्चय की है।
आँखों की भाषा: उनकी आँखें किसी गहरी खाई की तरह हैं – शांत दिखती हैं, लेकिन अंदर क्या-क्या छुपा है, कोई नहीं जानता। एक नजर में वह पूरी साजिश, पूरा खेल समझा देते हैं।
डायलॉग डिलीवरी: उनका बोलने का अंदाज लहरों की तरह शांत पर स्टील जैसा मजबूत है। हर लाइन वजनदार है, हर शब्द सोच-समझकर बोला गया लगता है। वह विलेन के क्लिचेड डायलॉग से मीलों दूर एक रियलिस्टिक और डरावने अंदाज में अपनी बात कहते हैं।
उपस्थिति: जब भी वह स्क्रीन पर आते हैं, पूरे वातावरण का दबाव बदल जाता है। उनकी मौजूदगी ही संघर्ष और खतरे का प्रतीक बन जाती है। अक्षय खन्ना ने इस भूमिका के जरिये यह साबित कर दिया है कि वह भारतीय सिनेमा के सबसे सूक्ष्म और प्रभावशाली अभिनेताओं में से एक हैं। उनका यह विलेन दर्शकों के दिमाग से लंबे समय तक नहीं उतरेगा।
निष्कर्ष: एक ऐसी फिल्म जो सिनेमा के प्रति प्रेम को पुनर्जीवित कर देगी‘धुरंधर’ केवल एक फिल्म नहीं है। यह एक घोषणा है कि बॉलीवुड जब दमदार कहानी, निर्देशकीय दृष्टि और बेहतरीन अभिनय को एक साथ लाता है, तो वह विश्व स्तरीय सिनेमा का निर्माण कर सकता है। यह फिल्म आपको देशभक्ति की भावना से सराबोर करती है, लेकिन उसे झंडे लहराकर या जोशीले नारों से नहीं, बल्कि मूक बलिदान, अदृश्य युद्ध और नाम न लिए जाने वाले हीरोज की कहानी दिखाकर।
यह फिल्म आपको थिएटर में बैठाकर एक भावनात्मक और बौद्धिक रोलर कोस्टर की सवारी कराती है। तकनीकी रूप से शानदार, कथात्मक रूप से मजबूत और अभिनय से परिपूर्ण – ‘धुरंधर’ 2023 की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है, और निसंदेह, अदित्य धर और अक्षय खन्ना की मास्टरक्लास।तो अगली बार जब कोई कहे कि ‘हिंदी फिल्में लंबी और उबाऊ होती हैं’, तो बस उन्हें ‘धुरंधर’ दिखाने का वादा करें। क्योंकि यह वो फिल्म है जो न सिर्फ आपका मनोरंजन करती है, बल्कि आपके अंदर के सिनेमा-प्रेमी को एक गहरा आलिंगन देती है और थिएटर से निकलते वक्त एक संतुष्टि की गर्माहट छोड़ जाती है – वो संतुष्टि जो सिर्फ एक संपूर्ण सिनेमाई अनुभव ही दे सकता है।

अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर
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