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कलेक्टर किस्सा गोई: जब साहब बहादुर ने करवाई फ्रीस्टाइल कुश्ती

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झरोखा/पंकज पटेरिया। गौर वर्ण उन्नत भाल सलीके से एक तरफ मांग निकली कंघी, गहरी बड़ी-बड़ी आंखें, लंबी सीधी मूछें, भोहो के ठीक मध्य गोल लाल तिलक, औसत ऊंचाई, मंद स्मित, केजुअल शर्ट, पेंट पोशाक, और रौबदार खनकती आवाज, कुल जमा एक रायल पर्सनॉलिटी लगते थे, साहब बहादुर कीर्ति शेष कलेक्टर आरसी सक्सेना। होशंगाबाद आने से पूर्व आपकी शोहरत की खुशबू यहां की फिजाओं में फेल गई थी। छत्तीसगढ़ के किसी जिले में हुए बड़े आंदोलन से सख्ती से निपटने के कारण वे राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खी बने थे, लिहाजा खुशबू की दस्तक का पहले होना लाजमी था। बहरहाल हुजूर ने धमकेदार आमद दर्ज कर जिले की बागडोर संभाली। पूरे जिले का दौरा कर यहां की नब्ज जानी विश्वत कर्मठ अफसरों की टीम बनाई और जुट गए कर्म क्षेत्र की कमान अपने प्रशानिक हाथो में थाम कर। सक्सेना जी की जिले का विकास, और जनसाधारण की तकलीफों की ईमानदारी से निदान सर्वोच्च प्राथमिकता थी। अपने सख्त रुख की वजह से बेहद कम समय में कलेक्टर का दबदबा कायम हो गया था। वे अपने एक हाथ में पुरस्कार और एक हाथ में सजा रखते थे। इस मामले में वे बहुत कठोर थे, किसी तरह की मुरव्वत नहीं बरतते थे। ऐसे भी उदाहरण देखने में आए थे की जो अफसर ठीक-ठाक अपनी परफॉरमेंस नहीं दे पा रहे अथवा उनकी ट्यूनिंग नहीं सेट हो रही है, तो वे ऐसे अफसरों को रुखसत कर देते थे।

निष्ठावान ईमानदार कोई भी हो वे उसकी मदद करने में अथवा पुरस्कृत करने में कोई कोताही नहीं बरतते थे। बहरहाल जिले की प्रगति और विकास में खूबसूरती के चार चांद टांक ने की अपनी कोशिश में कलेक्टर सक्सेना ने दुनिया भर के मशहूर फ्री स्टाइल पहलवानों का जमावड़ा यहां इक_ा कर दिया था। जिनमें विश्व प्रसिद्ध हिंद केसरी दारा सिंह, रंधावा सहित इंग्लैंड अमेरिका आदि पश्चिमी देशों के मशहूर पहलवान होशंगाबाद आए थे। इन पहलवानों की शानदार कुश्ती टिकट से एसएनजी के स्टेडियम में आयोजित की गई थी। कलेक्टर साहब की योजना थी की कुश्ती आयोजन से जमा राशि से बदहाल स्टेडियम का पुनर्निर्माण किया जाएगा। कुश्ती में भारत की शान विश्व चैंपियन दारा सिंह ने शानदार मुकाबले में बड़े-बड़े पहलवानों को शिरकत देकर देश का मस्तक उन्नत किया था। उस राशि से जितने भी बन पाए थे विकास के कार्य किए गए थे।

वे प्रेस पब्लिक के हिमायती थे और उनकी कार्यशैली निष्पक्ष तथा पारदर्शी थी। ऐसे कई घटना प्रसंग भी उस दौर में आए थे जब शांति एवं कानून व्यवस्था शिथिल लगी हो, लेकिन उन्होंने बेहतरीन ढंग से स्थिति को संभाला तथा शानदार प्रशासकीय दक्षता का परिचय दिया। कलेक्टर साहब खासा राजनैतिक प्रभाव भी रखते थे, लेकिन उसकी वजह उनकी प्रशासनिक पहचान थी, कोई चाटुकारिता नहीं। जनता पार्टी सरकार का कार्यकाल था, राष्ट्रपति शासन के दौर में भी वे कार्यरत रहे। अपने अधीनस्थ अफसरों और लिपिकों के बीच उनकी एक अत्यंत आत्मीय छवि थी। वह अफसरों और लिपिक आदि को सीधे नाम से पुकारते थे, यथा।

एसपी आनंद मोहन शुक्ला को मोहन फूड ऑफिसर शंकर बड़ोदिया को शंकर एसडीएम, आनंद सक्सेना को आनंद, इसी तरह लिपिकों को उनके नाम से पुकारना अथवा पीआरओ पत्रकारों को भी वे अपनेपन से नाम से ही पुकारा करते थे। अपने लिखने पढऩे की शैली के कारण मुझे भी उनका बहुत स्नेह प्राप्त होता था। उनके एटीट्यूड का एक मजेदार किस्सा है, किसी नेता जी ने उनसे कोई गलत काम करवाना चाहा तो कलेक्टर ने मना ही कर दी, तब नेता जी ने पब्लिक मंच से जनसभा कर उन्हें उस जमाने के पाकिस्तान के राष्ट्रपति जियाउल हक कहकर नवाजा, यह खबर जब साहब बहादुर तक पहुंची तो उन्होंने भी विनोद से टिप्पणी कर दी कि, मैं उन्हें भुट्टो बना दूंगा। वे यकीनन जरूरतमंद लोगों की नियम कायदों से परेेह जाकर मदद करने में पीछे नहीं हटते थे। अपना शानदार कार्यकाल पूरा कर उनका तबादला इंदौर हो गया था, इंदौर ज्वॉइनिंग करने के 2 दिन पूर्व से इंदौर के एक प्रमुख दैनिक ने उनके आगमन की बेहतरीन खबर छापी थी। वहां भी अपनी कर्मठता का परिचय देते हुए कलेक्टर सक्सेना, पदोन्नत होकर पंचायत कमिश्नर बंन कर भोपाल आ गए थे, और कुछ समय बाद उनका निधन हो गया। अच्छों के साथ अच्छे और बुरे के साथ बुरे बेहद खुशमिजाज सक्सेना जी की यादें आज भी लोगों के ज़हन में महक ती रहती हैं। उनकी स्मृति को नमन। नर्मदे हर।

Pankaj Pateriya

पंकज पटेरिया, वरिष्ठ पत्रकार साहित्य कार
संपादक शब्द ध्वज, ज्योतिष सलाहकार
93 40244352,9407505691

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