हरतालिका तीज का पावन पर्व हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
हरतालिका तीज 2025 : शुभ मुहूर्त और तिथि
इस वर्ष हरतालिका तीज का व्रत मंगलवार, 26 अगस्त 2025 को किया जाएगा।
तृतीया तिथि प्रारंभ : 25 अगस्त 2025, रात्रि 11:24 बजे से
तृतीया तिथि समाप्त : 26 अगस्त 2025, रात्रि 10:18 बजे तक
यह व्रत मुख्य रूप से तीन प्रहर की पूजा के लिए जाना जाता है।
पूजा की सामग्री
हरतालिका तीज की पूजा के लिए कुछ आवश्यक सामग्री इस प्रकार हैं।
- भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मिट्टी की प्रतिमाएं।
- फूल, फल, बेलपत्र, शमी के पत्ते, केले के पत्ते, धतूरा और आक के फूल।
- सिंदूर, कुमकुम, हल्दी, मेहंदी, चूडिय़ां, बिंदी और अन्य सुहाग की वस्तुएं।
- एक चौकी, गंगाजल, घी का दीपक, धूप और कपूर।
- नारियल, पान-सुपारी, और विभिन्न प्रकार के मिष्ठान।
पूजा विधि
- हरतालिका तीज का व्रत बेहद कठिन माना जाता है, क्योंकि यह दिन भर निर्जल रहकर किया जाता है। व्रत का पालन करने वाली महिलाएं इस प्रकार पूजा कर सकती हैं।
- व्रत का संकल्प : सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद, साफ वस्त्र पहनें और पूजा के लिए तैयार हों। सबसे पहले हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें।
- पूजा की तैयारी : पूजा स्थल पर एक चौकी रखें और उसे केले के पत्तों और फूलों से सजाएं। उसके बाद, मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाएं। आप चाहें तो बाजार से बनी हुई प्रतिमाएं भी ला सकती हैं।
- पूजा का प्रारंभ : सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें। फिर, भगवान शिव और माता पार्वती को भोग लगाएं और सुहाग की सामग्री अर्पित करें।
- व्रत कथा का पाठ : पूजा के दौरान हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनना या पढऩा बहुत शुभ माना जाता है।
- रात्रि जागरण : इस व्रत में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। रात भर भजन-कीर्तन कर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें।
- पारण : व्रत का पारण अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद ही किया जाता है, जब आप स्नान और पूजा के बाद भोजन ग्रहण करती हैं।
हरतालिका तीज का महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। हरतालिका तीज के दिन ही भगवान शिव ने माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इसलिए, इस दिन व्रत रखने से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है, और अविवाहित कन्याओं को मनचाहा जीवनसाथी मिलता है। यह व्रत पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम और समर्पण को बढ़ाता है।









