- अखिलेश शुक्ला

कल्पना कीजिए, एक ऐसा किरदार जिसके नाम से ही दर्शकों की रूह काँप जाती थी। एक ऐसा अभिनेता जिसने रावण को सिर्फ एक खलनायक नहीं, बल्कि एक विद्वान, एक महान योद्धा और एक जटिल व्यक्तित्व वाला चरित्र बना दिया। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं अरविंद त्रिवेदी की, जिन्होंने रामानंद सागर की ‘रामायण’ में लंकापति रावण का किरदार इतनी शिद्दत से निभाया कि देश की करोड़ों जनता के दिलों पर राज करने लगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह ऐतिहासिक रोल उन्हें एक संयोग और एक ऑडिशन की वजह से मिला था? और जिस रोल के लिए पहले अमरीश पुरी को चुना जाना था? चलिए, आज हम आपको अरविंद त्रिवेदी के इसी शानदार सफर की रोमांचक दास्तान सुनाते हैं।
बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि: एक कलाकार का जन्म
अरविंद त्रिवेदी का जन्म 8 नवंबर, 1938 को इंदौर में हुआ था। उनके पिता, जेठालाल त्रिवेदी, मूल रूप से गुजराती थे। यही वह सांस्कृतिक पृष्ठभूमि थी जिसने अरविंद को हिंदी और गुजराती, दोनों ही संस्कृतियों की समझ दी। लेकिन अरविंद के जीवन पर सबसे गहरा प्रभाव उनके बड़े भाई, उपेंद्र त्रिवेदी का था। उपेंद्र पहले से ही एक स्थापित अभिनेता थे, जो हिंदी और गुजराती फिल्मों के साथ-साथ रंगमंच से भी गहराई से जुड़े हुए थे।
भाई के नक्शेकदम पर चलते हुए, अरविंद ने भी अपने करियर की शुरुआत थिएटर से की। यहीं से उन्होंने अभिनय के गुर सीखे और दर्शकों के सामने अपने हुनर को पॉलिश किया। थिएटर की इस ट्रेनिंग ने ही उनमें वह मजबूत आधार तैयार किया, जिस पर आगे चलकर उन्होंने अपने शानदार फिल्मी और टीवी करियर की इमारत खड़ी की।
फिल्मों का सफर: हिंदी और गुजराती सिनेमा में धूम
थिएटर में हाथ आजमाने के बाद, अरविंद त्रिवेदी ने फिल्मों में कदम रखा। उन्होंने हिंदी और गुजराती, दोनों ही भाषाओं की फिल्मों में काम किया। गुजराती फिल्मों में तो अरविंद और उपेंद्र त्रिवेदी की जोड़ी को जबरदस्त सफलता मिली। उनकी अदाकारी और स्क्रीन पर दिखने वाली केमिस्ट्री ने दर्शकों का दिल जीत लिया। अपने पूरे करियर में उन्होंने 300 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा आंकड़ा है और उनकी लगन और मेहनत को दर्शाता है।
वह ऐतिहासिक ऑडिशन: कैसे बने अरविंद त्रिवेदी ‘रावण’?
साल 1984 की बात है। अरविंद त्रिवेदी उस समय गुजरात में थे। उन्हें पता चला कि प्रसिद्ध निर्देशक रामानंद सागर ‘रामायण’ बना रहे हैं और उसमें फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज कलाकार काम कर रहे हैं। अरविंद के मन में भी इस महान ग्रंथ का हिस्सा बनने की इच्छा जागी। उन दिनों शो में ‘केवट’ का रोल खाली था। केवट का रोल करने का ख्याल लेकर वह ऑडिशन देने मुंबई पहुँच गए।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
दरअसल, रावण के किरदार के लिए रामानंद सागर सबसे पहले अमरीश पुरी को ही चाहते थे। अरुण गोविल (जिन्होंने राम का किरदार निभाया) ने भी अमरीश पुरी का नाम सुझाया था। लेकिन अमरीश पुरी ने यह रोल करने से इनकार कर दिया। इसके पीछे दो मुख्य वजहें थीं: पहली, अमरीश पुरी उस समय फिल्मों में एक सफल विलेन के तौर पर स्थापित हो रहे थे और वह टीवी की बजाय फिल्मों पर फोकस करना चाहते थे। दूसरी, और शायद बड़ी वजह थी, पैसा। रामायण में मिलने वाली फीस उन्हें फिल्मों के मुकाबले कम लग रही थी। अमरीश पुरी के इनकार के बाद रावण की भूमिका खाली थी।
इधर, अरविंद त्रिवेदी मुंबई पहुँचे और सीधे रामानंद सागर के ऑफिस पहुँच गए। उन्हें ऑडिशन के लिए स्क्रिप्ट दी गई। अरविंद ने पूरी लगन के साथ डायलॉग पढ़े। जब वह पढ़कर खत्म हुए तो पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। अरविंद को लगा कि शायद उनका ऑडिशन अच्छा नहीं रहा। निराश होकर वह स्क्रिप्ट वापस करके चलने लगे। तभी अचानक रामानंद सागर अपनी कुर्सी से उठे और उनके पास आकर बोले, “रुकिए! मुझे लंकेश मिल गया है। अब तुम ही रामायण में रावण का किरदार निभाओगे।”
अरविंद हैरान रह गए। उनकी हैरानी देखकर रामानंद सागर ने आगे कहा, “तुम्हारी बॉडी लैंग्वेज और तुम्हारे अंदाज से ही मैं समझ गया था कि तुम इस रोल के लिए परफेक्ट हो। मुझे एक ऐसा एक्टर चाहिए था जो बुद्धिमान भी लगे और बलवान भी। तुममें ये सारी खूबियाँ हैं।” और इस तरह, केवट बनने की जगह, अरविंद त्रिवेदी रामायण के सबसे महत्वपूर्ण खलनायक ‘लंकापति रावण’ बन गए।
रावण को एक नई पहचान दी
अरविंद त्रिवेदी के रावण ने सिर्फ डर ही नहीं पैदा किया, बल्कि दर्शकों के मन में एक अलग तरह का सम्मान भी हासिल किया। उन्होंने रावण के अहंकार, उसकी बुद्धिमत्ता, उसके शौर्य और उसकी तपस्या को स्क्रीन पर जीवंत कर दिया। उनकी आवाज़ में जब डायलॉग गूँजते थे, तो दर्शक स्तब्ध रह जाते थे। उनका रावण एक ‘खलनायक’ से कहीं बढ़कर था; वह एक ऐसा पात्र था जिसमें दोष भी थे और गुण भी। यह अरविंद त्रिवेदी की अदाकारी का ही कमाल था कि आज भी रामायण के रावण की छवि हमारे जेहन में उन्हीं के चेहरे के साथ अंकित है।
निजी जीवन और राजनीतिक सफर
अपने व्यस्त करियर के बीच अरविंद त्रिवेदी ने एक स्थिर निजी जीवन भी बनाया। उन्होंने 4 जून, 1966 को नलिनी त्रिवेदी से शादी की और इस दंपति की तीन बेटियाँ हुईं। अभिनय के अलावा, अरविंद त्रिवेदी ने राजनीति में भी अपना भाग्य आजमाया। 1991 में गुजरात की साबरकाठा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद बने। बाद में, 2002 में, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उन्हें सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) यानी सेंसर बोर्ड का चेयरमैन नियुक्त किया गया। इस पद पर वह लगभग एक साल तक रहे। गुजराती सिनेमा में उनके अतुल्य योगदान के लिए उन्हें गुजरात सरकार की ओर से सात बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला।
अंतिम समय और विरासत
6 अक्टूबर, 2021 को अरविंद त्रिवेदी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने से सिनेमा जगत और उनके करोड़ों प्रशंसकों में एक शून्य पैदा हो गया।
निष्कर्ष: एक अमिट छाप
अरविंद त्रिवेदी का जीवन एक ऐसी प्रेरणा है जो सिखाती है कि अवसर कभी भी और कहीं से भी मिल सकते हैं। वह एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने केवट के रोल के लिए गए ऑडिशन में रावण का किरदार हासिल कर लिया और फिर उसे इतिहास बना दिया। वह सिर्फ एक एक्टर ही नहीं, एक सफल सांसद और एक जिम्मेदार प्रशासक भी थे।
उनकी कहानी हमें यह एहसास दिलाती है कि असली सफलता उम्र, पृष्ठभूमि या मौके की प्रतीक्षा नहीं देखती। बल्कि, यह आपके जुनून, आपकी लगन और आपके हौसले पर निर्भर करती है। अरविंद त्रिवेदी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन रामायण के पर्दे पर रावण के रूप में, और दर्शकों के दिलों में एक महान कलाकार के रूप में, वह हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए हैं। उनका काम हमेशा हमें याद दिलाता रहेगा कि जो किरदार आप निभाते हैं, वह सिर्फ एक रोल नहीं, एक विरासत बन सकता है।
अखिलेश शुक्ला
सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर










