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सच्चाई का आईना : अस्पताल और इंश्योरेंस

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पंकज पटेरिया :
जिस तरह बुढ़ापे में पुरानी चोटे कुलमुलाने लगती, घुटने की हड्डियां बजने लगती ठीक इसी तरन्नुम पर संगत करने लगती कोई पीर पुरानी यादों के रस रूप गंध के तमाम अनुलोम विलोम करने के बाद भी देर रात कोई भी गीत की पंक्ति या गजल के पांव की हल्की पैजनिया नहीं बजी। अंधेरा गहराने लगा, यकायक बिजली तड़की और बिस्तर के सामने के आईने से अपना साक्षात्कार हो गया। मैं सहसा सकपका गया। इसीलिए शायद कहा जाता सोते समय चेहरे के सामने आईना नहीं होना चाहिए। क्योंकि आईना सच बोलता है, कभी झूठ नहीं बोलता।

लिहाजा आईना शुरू हो गया, देखो भाई कितनी कितनी डुप्लेक्स ट्रिपलेक्स की खिड़कियों के पल्ले आप,आंखों की पलकों से पोछते रहे मगर पल को भी कभी नहीं खुले और हर बार गहरे सदमे से आकर आप कोई गीत, गजल के लिए कवायत करने लगते। तभी एक दिन खिड़की खुलती और आप देखते हो कोई आइना हाथ में लिए अपने बालों को करीने से काड़ बीच मांग में सिंदूर भर रही होती है।

यह मंजर आपके हृदय को चीर देता है। आपके अरमानों का सिंदूर आपरेशन हो जाता है। ऐसा आपके साथ हमेशा होता है,लेकिन पड़ोसी मुल्क की तरह आप अपनी हरकत से बाज नहीं आते। लो अब जब उम्मीद की खिड़की दर खिड़की अपनी मांग सिंदूर से भरने लगी है। आपके बालों से हेयर ड्राय के अंतरंग मिलन के बाबजुद सफेदी ढलती उम्र आईना दिखा जाती है। ३२ में २६ बचे है कुल दांत ।बाकी भी कब जाने गुड वाय कर दे। लिहाजा सावधान रहने में भलाई है। मैं मन ही मन कोशिश कर आईने से बोलता हूं वो पूंछ लेते मिजाज मेरा, कितना आसान था इलाज मेरा। लेकिन नहीं! तुम भी उपदेशक बन गए। इस मुल्क में क्या कमी है उपदेशकों की। प्रिंट मीडिया से लेकर दूरदर्शन तक। पर तुम तो भाई अपने अक्स हो तुम तो कम से कम कोई आइनमेंट हमदर्दी का बताते।

खैर दुर्भाग्य अपने जन्म से चस्पा है। उधर जब रात रात भर नींद गायब रही। तो पत्नी जी की सहेली की दी गई सलाह पर अपने राम अस्पताल पहुंच गए। सुबह से हमने दस्तक दे दी, फोकट में पूरा दिन टूटा। रजिस्ट्रेशन के बाद डॉक्टर साहब से भेंट हुई । उन्होंने देखते ही अपना मास्क लगाया और हालचाल जाने, वायो डाटा लिया। फिर पूछा इंश्योरेंस है क्या इस सवाल पर वीपी सूट हो गया था। हमने कहा नहीं सर । बाद में पता लगा वे पड़ोसी बीमा करने वाले भाई साहब के बहनोई साहब है, बोले करवा ले अच्छा रहता है आड़े गाढ़े वक्त में। डॉ साहब बोले फिर भी ये जांच, वो जांच एक्सरे जरूर करवा ले, अच्छा रहता है। जांच करवाई, टेक्नीशियन बोले जांच रिपोर्ट ४ घंटे बाद आयेगी। निराश बैठ गए बेंच पर। पांच बज गए, संबंधित डॉ साहब रवाना हो गए।


रिपोर्ट के लिए फिर सभी काउंटर पर हाजिर हुए। अब कल आओ। रिपोर्ट डाक्टर के पास सीधे पहुंच जाएगी। क्या करते, वापिस लौट घर बुद्धू आए। आते ही सबसे पहले मेडिकल इंश्योरेंस करने वाले भाई साहब से अपना और पत्नी का ऑनलाइन इंश्योरेंस करवा लिया और फिर दूसरे दिन हाजिर हुए अस्पताल। १.३० घंटे बाद नंबर आया डॉ साहब को सूचना दी सर इंश्योरेंस भी करवा लिया। वे बोले अरे वैरी गुड, रिपोर्ट देखी। सब नार्मल है, बस ये तीन गोलियां रोज चलने दी जाए। १५ दिन बाद फिर दिखाए। काउंटर से दवाएं ली क्योंकि इन्हीं के काउंटर दवाएं लेना जरूरी होता है। दवाओं का पैकेट उठा चलने को हुए ही थे कि एक चांदी की घंटी सी मधुर ध्वनि कानों को छू गई अरे सर बाकी पैसे तो लीजिए। सुन कर तबीयत बाग बाग हो गई। सारे सारे रोग शोक जैसे भाग गए। लगा तबीयत बिल्कुल अच्छी होगई। यानि हम चंगे हो गए।

दौड़कर काउंटर खिड़की पर गए। उस बुलाने वाली मोहिनी सूरत की आंखों से लगभग आरती उतारी और हमने अपनी जात का तारुफ देते उसी नजाकत से कहा जी कुछ फरमाया महजमी आपने ? उस के चेहरे पर कुछ क्या बोले?, महजमी शब्द पर खिंचाव आया।तुरंत खतरे को भाप हम खुद को वापिस कंट्रोल करते कहा आपने आवाज दी थी। हा यह पैसे तो वापिस ले जाइए। हमने बाकी पैसे समेटे और लौट आए। दिल तो हुआ था, कह दे, रहने दीजिए बल्कि हमें भी जमा कर लीजिए। लेकिन महजबी लब्ज़ का रिटर्न करंट का झटका सीधे बैक टू पवेलियन ले आया। पर लौटे हम वैसे ही जैसे पराजित मुल्क के सैनिक बैरकों में लौट यह पोज देते है जैसे वे युद्ध जीत कर अपने वतन लौटे हो। क्या करोगे, पुरानी बीमारी है। पत्नी जी बेचारी दौड़ी दौड़ी आई बोली क्या बताया। हमारा उत्तर था कुछ भी नहीं, एवरी थिंक इस ओके, नो प्रॉब्लम। पत्नी जी चिहुंक कर बोली अरे डॉक्टर को बता दिया न, बीमा करा लिया। मैने कहा हां बता दिया। पत्नी जी बोली पहले ही करवा लेते, पर तुम मेरी सुनते कहां हो। खैर मैं जानती थी कुछ नहीं निकलेगा। पर वो है न जो मेरे साथ जुंबा जाती हैं। उसी ने परेशान करने मुझे यह सलाह दी। मैं जानती हूं जलती है।

Pankaj Pateriya

पंकज पटेरिया
वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार
ज्योतिष सलाहकार

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