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जानी दुश्मन: वो डरावनी कहानी जिसने 1979 में हिला दिया था सिनेमा प्रेमियों को

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  • अखिलेश शुक्ल, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर
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अखिलेश शुक्ला

एक खौफनाक साजिश, एक दुष्ट आत्मा का बदला और लाल साड़ी पहनने वाली दुल्हनों की रहस्यमयी मौतें – आइए जानते हैं उस क्लासिक हॉरर फिल्म की कहानी

जब सितारों की बारात ने डर का ऐसा माहौल रचा…

कल्पना कीजिए, आपकी शादी की रात है। आप लाल साड़ी में सजी-धजी हैं, दुल्हन के रूप में आपकी खूबसूरती देखते ही बनती है। लेकिन अचानक एक खौफनाक साया आपके पास आता है और आप हमेशा के लिए गायब हो जाती हैं। यह कोई साधारण कहानी नहीं है, बल्कि 1979 में बनी हॉरर फिल्म “जानी दुश्मन” का वह डरावना कथानक है, जिसने उस दौर में दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे।

राजकुमार कोहली के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सुनील दत्त, संजीव कुमार, जीतेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद मेहरा, रीना रॉय, रेखा, नीतू सिंह और बिंदिया गोस्वामी जैसे दिग्गज सितारे एक साथ नजर आए थे। इतने बड़े स्टारकास्ट के साथ बनी यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार हॉरर फिल्मों में गिनी जाती है।

शादी की रात से शुरू हुआ खौफनाक सिलसिला

कहानी की शुरुआत होती है ठाकुर ज्वाला प्रसाद की हत्या से। उनकी ही पत्नी ने शादी की रात उनकी हत्या कर दी। मौत के बाद उनकी आत्मा एक दुष्ट शक्ति के रूप में धरती पर लौट आती है और अब उसका एक ही लक्ष्य है – बदला। वह उन सभी नवविवाहित दुल्हनों को मारना चाहता है जो पारंपरिक लाल रंग की साड़ी पहनती हैं।

लेकिन यह आत्मा सीधे हमला नहीं कर सकती। उसे किसी मानव शरीर में प्रवेश करना पड़ता है। जब भी कोई दुल्हन सामने आती है, यह आत्मा उस इंसान पर कब्जा कर लेती है जो उस वक्त दुल्हन के पास होता है। कब्जा करने के बाद वह इंसान देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, लेकिन उसके भीतर दुष्ट आत्मा का वास होता है।

इस आत्मा को खत्म करने का एक ही तरीका है – उस इंसान की छाती में चाकू घोंपना, जिसमें आत्मा ने प्रवेश किया हो। लेकिन यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि यह चालाक आत्मा मरने से पहले ही किसी दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाती है।

दूरदराज के इलाके में रहस्यमयी गायबियां

कहानी आगे बढ़ती है एक सुदूर इलाके में, जहां नवविवाहित दुल्हनें एक विशेष मंदिर में पालकी पहुंचने के बाद लापता हो जाती हैं। उनके शव भी नहीं मिलते, जैसे धरती में समा जाती हों। इस पूरे इलाके पर एक दयालु ठाकुर साहब का राज है।

ठाकुर साहब का बेटा शेरा अहंकारी और धूर्त स्वभाव का है। उसका गांव के एक साहसी युवक लखन से हमेशा झगड़ा होता रहता है। लखन गांव की सुंदरी रेशमा से प्यार करता है और रेशमा भी उससे प्रेम करती है। लेकिन शेरा की भी रेशमा पर बुरी नजर है। इस बीच, शेरा की छोटी बहन शांति लखन से प्यार करती है, जबकि एक और गांव की लड़की चंपा शेरा से प्रेम करती है, उसके बुरे व्यवहार के बावजूद।

शक के घेरे में कौन?

दुल्हनों के लगातार गायब होने से पूरे गांव में दहशत फैल जाती है। हर कोई किसी न किसी पर शक करने लगता है। कोई मानसिक रूप से बीमार आवारा पर शक करता है, कोई मंदिर के पुजारी पर। कुछ लोग शेरा पर भी शक करते हैं क्योंकि वह मनमौजी है। यहां तक कि जब लोग ठाकुर साहब को लाल पोशाक देखकर डरते और टूटते देखते हैं, तो कुछ उन पर भी शक करने लगते हैं।

तभी लखन की छोटी बहन गौरी अपनी ही बारात से लापता हो जाती है। उसकी बाली पुजारी के जूतों के पास मिलती है और पूरा गांव उस पर हत्या का आरोप लगा देता है। लेकिन पुजारी अपनी बेगुनाही साबित कर देता है। बाद में पता चलता है कि गौरी और उसके पूर्व प्रेमी अमर ने साथ न रह पाने के कारण आत्महत्या कर ली थी। यह घटना लापता दुल्हनों के मामले से अलग थी, लेकिन इसने रहस्य को और गहरा कर दिया।

शेरा की चाल और सच का खुलासा

शेरा रेशमा से शादी करना चाहता है। वह अपने पिता से रेशमा के पिता वैद्यजी के पास शादी का प्रस्ताव लेकर जाने को कहता है, लेकिन रेशमा इनकार कर देती है। तब शेरा को पता चलता है कि वैद्यजी असल में अंधे नहीं हैं, बल्कि चोर हैं। वह इस जानकारी से रेशमा को ब्लैकमेल करना चाहता है, लेकिन वैद्यजी सबके सामने सच उगल देते हैं, जिससे शेरा के हाथ कुछ नहीं लगता।

वैद्यजी लखन और रेशमा की शादी करवाने का फैसला करते हैं और दोनों खुशी से मान जाते हैं। इसी बीच ठाकुर साहब की बेटी शांति की शादी तय हो जाती है। वह इसके लिए राजी हो जाती है क्योंकि उसे एहसास होता है कि लखन सिर्फ रेशमा से प्यार करता है। लखन उसकी सुरक्षा के लिए पालकी में उसके साथ जाता है और शांति सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच जाती है। असल वजह यह थी कि उसने अपने पिता के डर के कारण लाल दुल्हन की साड़ी नहीं पहनी थी।

सच्चाई की गुफा में खौफनाक मुलाकात

अब सबका शक ठाकुर साहब पर जाता है, क्योंकि उनकी बेटी बच गई जबकि बाकी दुल्हनें गायब हो गईं। ठाकुर साहब आत्महत्या की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी पत्नी बताती है कि शेरा को भी शांति की सुरक्षा योजना के बारे में पता था। ठाकुर साहब वादा करते हैं कि दोषी को सजा दिलवाएंगे, चाहे वह उनका अपना बेटा ही क्यों न हो।

शेरा रेशमा का अपहरण करके भागने की कोशिश करता है, लेकिन लखन उसे रोक लेता है। आग में जलते हुए शेरा को बचाने के लिए चंपा कूद पड़ती है और शेरा को अपनी गलती का एहसास होता है। वह चंपा की वफादारी को स्वीकार करता है।

आखिरकार, लखन और रेशमा की शादी होती है। रेशमा की पालकी मंदिर पहुंचती है और एक भयानक राक्षस उसका अपहरण कर लेता है। लखन उनका पीछा करते हुए एक गुफा में पहुंचता है। वहां उसे शेरा भी मिलता है, जो उसी राक्षस का पीछा कर रहा था। स्थानीय आवारा भी वहीं मिलता है, जो असल में लापता दुल्हनों के मामले की जांच कर रहा एक पुलिसवाला था।

अंतिम खुलासा और आत्मा का शांत होना

तीनों मिलकर उस राक्षस से लड़ते हैं और लखन उसकी छाती में चाकू घोंप देता है। तब पता चलता है कि यह राक्षस कोई और नहीं, बल्कि ठाकुर साहब थे। लेकिन यह भी सच था कि ठाकुर साहब एक अच्छे इंसान थे। असल में, ज्वाला प्रसाद की बुरी आत्मा ने ठाकुर साहब के शरीर पर कब्जा कर लिया था।

अपने अंतिम क्षणों में ठाकुर साहब की आत्मा ज्वाला प्रसाद की बुरी आत्मा को किसी और पर कब्जा करने से रोकने की कोशिश करती है। वह तब तक संघर्ष करते हैं, जब तक कि ज्वाला प्रसाद अपने प्रतिशोध के रास्ते को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो जाता। अंत में, ठाकुर साहब बुरी आत्मा को हमेशा के लिए भगाने के बाद दम तोड़ देते हैं।

प्रेरणादायक निष्कर्ष

‘जानी दुश्मन’ सिर्फ एक डरावनी फिल्म नहीं है, बल्कि इसके भीतर एक गहरा संदेश छिपा है। यह कहानी हमें सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, अच्छाई की जीत हमेशा होती है। ठाकुर साहब का बलिदान बताता है कि एक अच्छा इंसान मृत्यु के बाद भी बुराई से लड़ सकता है।

यह फिल्म प्रेम, बलिदान और धैर्य का पाठ पढ़ाती है। चंपा का शेरा के प्रति प्रेम, लखन का अपनी बहन और प्रेमिका के लिए संघर्ष, और ठाकुर साहब का अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण – ये सभी हमें जीवन के असली मूल्य सिखाते हैं।

आज भी, चार दशक बाद, यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि सच्चाई और निस्वार्थ प्रेम ही सबसे बड़ी शक्ति हैं। चाहे कितनी भी भयावह परिस्थितियां क्यों न हों, अगर हम सच्चाई के साथ खड़े हैं, तो जीत हमारी ही होगी।

तो अगली बार जब कोई लाल साड़ी में दुल्हन आपको दिखे, तो याद रखिएगा – वह सिर्फ एक खूबसूरत दुल्हन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपरा की वो ताकत है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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