इटारसी। शासकीय महाविद्यालय सुखतवा मंगलवार को भारतीय ज्ञान परंपरा के गहन मंथन का केंद्र बना, जहां स्पीक मैके चैप्टर इटारसी के तत्वावधान में दिल्ली की सुविख्यात कथक नृत्यांगना अभिशिक्ता मुखोपाध्याय ने अपनी कला से आत्मिक और सांस्कृतिक चेतना को जाग्रत किया। यह आयोजन केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी को उनकी जड़ों से जोडऩे का एक वैचारिक प्रयास था।
दार्शनिक आधार
आत्मिक अभिव्यक्ति और धरोहर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ प्राचार्य डॉ. नीता राजपूत, स्पीक मैके समन्वयक श्री सुनील बाजपेई, और नृत्यांगना अभिषिकता मुखोपाध्याय द्वारा दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुआ। प्राचार्य डॉ. नीता राजपूत ने अपने स्वागत उद्बोधन में इस आयोजन के दार्शनिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ‘नृत्य केवल शारीरिक गति नहीं है, यह अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है, जो हमें भीतर से जोड़ता है। शास्त्रीय नृत्य, विशेषकर कथक, हमारी वह अनमोल धरोहर है जो समय के प्रवाह में भी अपनी आत्मा को सहेजे हुए है।’ समन्वयक सुनील बाजपेई ने संस्था के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि स्पीक मैके का लक्ष्य युवा पीढ़ी को उस भारतीय संस्कृति की शाश्वत कलाओं से परिचित कराना है, जो उन्हें जीवन के सत्यों और सौंदर्य से जोड़ती है।
कथक : भाव, मुद्रा और समर्पण का योग

नृत्यांगना अभिशिक्ता मुखोपाध्याय ने कथक के बोल, मुद्राओं, भावों और मात्राओं की सूक्ष्मता से विद्यार्थियों को परिचित कराया। उन्होंने बताया कि कथक एक गणितीय परिशुद्धता और भावनात्मक गहराई का योग है। उनकी प्रस्तुति ने कृष्ण भक्ति के गहरे भावों को मूर्त रूप दिया। ‘आवत श्याम ठुमरी’ पर बाल कृष्ण की अटखेलियों का जीवंत नृत्य, केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सगुण भक्ति की दार्शनिक अभिव्यक्ति थी, जहाँ भक्त अपने आराध्य के सहज रूप में ही परम आनंद की अनुभूति करता है। इसी क्रम में ‘यमुना किनारे नाचत कन्हैया’ कवित्त और ‘दर्शन दे श्याम’ के माध्यम से कथक की मुद्राओं ने आत्मा और परमात्मा के मिलन की आतुरता को दर्शाया।
सफलता का मार्ग लगन और समर्पण
प्रस्तुति के उपरांत, अभिषिकता मुखोपाध्याय ने विद्यार्थियों को संबोधित किया। उन्होंने केवल नृत्य ही नहीं, बल्कि जीवन के दर्शन से भी प्रेरणा दी। उन्होंने कहा, मेहनत और लगन केवल कला में ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की कुंजी है। समर्पण ही वह शक्ति है जिससे हर मंजिल को पाया जा सकता है। यह संदेश कला के माध्यम से कर्म और निष्ठा के भारतीय मूल्यों को स्थापित करता है। महाविद्यालय परिवार ने अभिषिकता मुखोपाध्याय को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। संचालन डॉ. सौरभ तिवारी ने किया और आभार डॉ. सतीश ठाकरे ने व्यक्त किया।








