इटारसी। क्षेत्र के समीपस्थ ग्राम खटामा में होली का पर्व अपनी प्राचीन परंपराओं और लोक संस्कृति के अनूठे संगम के साथ मनाया गया। आधुनिकता के दौर में भी यहाँ के ग्रामीणों ने अपनी जड़ों को थामे रखा है, जहाँ ‘फागुन गीतों’ की गूँज और सामाजिक समरसता की मिसाल देखने को मिली।
परंपरागत विधि से होलिका स्थापना
ग्रामीण विनोद वारिवा ने बताया कि गांव में होली खड़ी करने की प्रक्रिया अत्यंत श्रद्धापूर्ण होती है। होलिका दहन से पूर्व समस्त ग्रामवासी जंगल जाते हैं, जहाँ ‘सेमर’ की लकड़ी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। परंपरा अनुसार लकड़ी पर एक रुपया और सुपारी अर्पित कर उसे ससम्मान गांव लाया जाता है, जिसके बाद ही होली खड़ी की जाती है।
संवेदना और सरोकार: दुःख में सहभागिता
खटामा गांव की सबसे प्रेरक परंपरा यह है कि रंग खेलने की शुरुआत उन घरों से होती है, जहाँ बीते वर्ष कोई गमी (मृत्यु) हुई हो। ग्रामीण सबसे पहले उन परिवारों के पास पहुँचते हैं जिनका यह ‘पहला त्यौहार’ होता है। वहां ढोलक, टिमकी और मंजीरे की थाप पर फागुन गीत गाकर और नृत्य कर परिवार के दुःख को कम करने का प्रयास किया जाता है
मिट गई दूरियां, गले मिले ग्रामीण
- होलिका दहन: रात्रि में शुभ मुहूर्त पर लकड़ी और कंडों के ढेर का दहन किया गया।
- फागुन का उल्लास: दिन भर फागुन गीतों की टोली गांव की गलियों में निकली।
- क्षमा और प्रेम: वर्षों पुरानी आपसी बुराइयों और मनमुटाव को भुलाकर ग्रामीणों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाया और गले मिलकर ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ का संदेश दिया।








