इटारसी। लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाएं न केवल भक्तों को हास्य और आनंद प्रदान करती हैं, बल्कि इनमें जीवन का गहरा शिक्षाप्रद ज्ञान भी निहित है। यह उद्गार भागवत आचार्य पंडित विनय कृष्ण शास्त्री ने नाला मोहल्ला भगत सिंह नगर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिवस पर उपस्थित श्रोताओं के समक्ष व्यक्त किए।
गोवर्धन प्रसंग और एकता का संदेश
आचार्य श्री ने कथा के दौरान गोवर्धन प्रसंग का संगीतमय वर्णन करते हुए कहा कि वृंदावन के लोग भयवश इंद्र की पूजा करते थे, जबकि उनके वास्तविक देव गोवर्धन पर्वत थे। उन्होंने बताया कि श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर सभी ग्वालवासियों को एकजुटता का ज्ञान प्रदान किया और यह संदेश दिया कि हमें भय के बजाय अपने सच्चे देव की पूजा करनी चाहिए।
चीर हरण लीला का उल्लेख
आचार्य शास्त्री ने चीर हरण लीला का उल्लेख करते हुए कहा कि वृंदावन की गोपियां यमुना जी में नग्न स्नान करती थीं। श्री बालकृष्ण ने उनके वस्त्र उठाकर यह संदेश दिया कि पवित्र नदियों और तालाबों में निरस्त्र (वस्त्रहीन) स्नान करना देव एवं देवी रूपी जल स्रोतों का अपमान है। उन्होंने कहा कि इससे मनुष्य की अज्ञानता और फूहड़ता भी झलकती है। 56 भोग का महत्व आचार्य श्री ने छप्पन भोग के महत्व को भी प्रतिपादित किया। उन्होंने बताया कि जब श्री कृष्ण ने 7 दिनों तक गोवर्धन पर्वत को धारण किया, तो माता यशोदा चिंतित हुईं कि उनके पुत्र ने आठ पहर भोजन करने के बावजूद सात दिनों से कुछ नहीं खाया है। तब ग्वालवासियों ने सातू (7) और आठू (8) का गुणा-भाग कर श्री बालकृष्ण को 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित किया। तभी से भगवान श्री कृष्ण को छप्पन भोग अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है।
कथा का समापन पांचवें दिवस की कथा के अंतिम पहर में, श्री दुर्गा मंदिर समिति महिला मंडल ने श्रीमती संगीता भदोरिया के नेतृत्व में गोबर और रंगोली से भगवान श्री कृष्ण की गोवर्धन पर्वत धारण किए हुए सुंदर प्रतिमा बनाई और उन्हें 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया गया। कथा के अंत में श्री गिरिराज भगवान की महा आरती एवं छप्पन भोग का प्रसाद श्रोताओं में वितरित किया गया। पांचवें दिवस में भी भारी संख्या में आए श्रद्धालुओं का कार्यक्रम संयोजक धीरू सिंह भदोरिया ने आभार व्यक्त किया।









