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दुर्गा अष्टमी सुकर्मा योग में कल महागौरी की पूजा होगी

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इटारसी। मां चामुण्डा दरबार भोपाल के पुजारी गुरू पं. रामजीवन दुबे ने बतया कि आज आश्विन शुल पक्ष दुर्गा महाष्टमी बुधवार 13 अक्टूबर को सुकर्मा योग (Sukarma Yog) में पूजा-पाठ, हवन-आरती  प्रसाद वितरण, कन्या भोज होगा दुर्गा अष्टमी (Durga Astami) तक व्रत करने वालों के वत पूर्ण होंगे।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को पाने के लिए कई वर्षों तक मां पार्वती ने कठोर तप किया था, जिससे उनके शरीर का रंग काला हो गया था। जब भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न  हुए तो उन्होंने उनको गौर वर्ण का वरदान भी दिया। इससे मां पार्वती महागौरी भी कहलाईं। महाष्टमी या दुर्गा अष्टमी (Mahashtami or Durga Ashtami) को वत करने और मां महागौरी की आराधना करने से व्यक्ति को सुख, सौभाग्य और समृद्धि भी मिलत्ी है। सब पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
सुकर्मा योग में दुर्गा अष्टमी- दुर्गा अष्टमी सुकर्मा योग में है। सुकर्मा योग को मांगलिक कार्यों के लिए उत्तम माना जाता है।

दुर्गा अष्टमी व्रत एवं पूजा विधि-
अष्टमी के दिन खाना आदि से निवृत होकर आप स्वच्छ वस्त्र धारण करें। उसके बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर दुर्गा अष्टमी व्रत करने तथा मां महागौरी की पूजा करने का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थान पर मां महागौरी या दुर्गा जी की मूर्ति तस्वीर स्थापित कर दें। कलश स्थापना किया है, तो वहीं पूजा करें। पूजा में मां महागौरी को सफेद और पीले फूल अर्पित करें। नारियल का भोग लगाएं। ऐसा करने से देवी महागौरी प्रसन्न होती हैं। नारियल का भोग लगाने से संतान संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। पूजा के समय महागौरी बीज मंत्र का जाप करें और अंत में मां महागौरी की आरती करें।
बीज मंत्र- श्री क्लीं हीं वरदायै नम:।

अन्य मंत्र-
माहेश्वरी वष आरूढ़ कौमारी शिखिवाहना।
श्वेत रूप धरा देवी ईश्वरी वृष वाहना।।
या-
ओम देवी महागौर्य नम:।

दुर्गा अष्टमी का हवन
कई स्थानों पर दुर्गा अष्टमी के दिन नौ दुर्गा के लिए हवन किया जात है। आरती के बाद हवन सामग्री अपने पास रखें। कर्पूर से आम की सूखी लकडिय़ों को जला लें। अग्नि प्रज्वलित होने पर हवन सामग्री की आहुत दें।

कन्या पूजा
आपके यहां दुर्गा अष्टमी को ही कन्या पूजन होता है, तो आप हवन के बाद कन्याओं का अपनी क्षमता के अनुसार पूजन, दान, दक्षिणा और भोजन कराएं। उनका आशीष् लें। इसके बाद दिन भर फलाहार रहते हुए दुर्गा अष्टमी का व्रत करें। रात्रि के समय माता का जागरण करें। अगले दिन सुबह नवमी को पूजा के बाद पारण करके व्रत को पूरा करें।

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