- अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक, ब्लॉगर

अगर आपने हिंदी सिनेमा देखा है, तो एक आवाज़ आपके दिमाग में गूँज जाएगी — कर्कश, स्पष्ट और ज़रा सी भी समझौता न करने वाली। वह आवाज़ है नाना पाटेकर की। फिल्मी पर्दे पर वो अक्सर गुस्सैल, जिद्दी और धारदार किरदार निभाते दिखते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पर्दे के पीछे का नाना उस किरदार से कहीं ज़्यादा मजबूत, संघर्षशील और सादगी भरा है? उनकी ज़िंदगी एक ऐसी स्क्रिप्ट है, जिसमें दर्द, प्रेम, त्याग और अटूट ईमानदारी के दृश्य बिना किसी निर्देशक के लिखे गए हैं। चलिए, डूबते हैं इस अनोखे अभिनेता और और भी अनोखे इंसान की कहानी में।
एक छोटे कस्बे से निकलकर बड़े सपने लेकर
नाना का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा जैसे छोटे से कस्बे में हुआ। उनकी माँ ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया — बच्चों को मुंबई की अपराधिक गलियों से दूर, गाँव की सादगी में पालना। यह फैसला नाना की ज़िंदगी का पहला और सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। नहीं तो, उनके अपने ही रिश्तेदार, कुख्यात गैंगस्टर मन्या सुर्वे के रास्ते पर चल पड़ने का खतरा था। माँ की दूरदर्शिता ने एक अभिनेता को जन्म दिया, एक गुंडे को नहीं।
वह पाठशाला जहाँ ज़िंदगी और अभिनय सीखा
फिल्मों में छा जाने से पहले, नाना की पहचान थिएटर के मंच से थी। यहीं उन्होंने अनुशासन, समय की पाबंदी और दर्शकों के प्रति ज़िम्मेदारी सीखी। थिएटर सिर्फ एक कला नहीं, उनके लिए तपस्या थी। और इसी मंच पर उनकी मुलाकात उनकी जीवन संगिनी, नीलकांति से हुई। नीलकांति भी एक अभिनेत्री और लेखिका थीं। दो कलाकारों का मिलन, जिसकी नींव सादगी और सम्मान पर टिकी थी।
जहाँ प्यार की कीमत सोने से नहीं, विश्वास से तौली गई
आज के दौर में करोड़ों रुपये की शादियों के विपरीत, नाना-नीलकांति की शादी एक सादगी भरी मिसाल बन गई। साल 1978। नाना थिएटर के एक शो के 50 रुपये कमाते थे। महीने के 15 शो मिले तो कुल 750 रुपये। नीलकांति बैंक अफसर थीं और 2500 रुपये कमाती थीं। दोनों की कुल आय 3250 रुपये। और शादी का कुल खर्च? बस वही 750 रुपये! शादी के बाद बचे 24 रुपये से उन्होंने गोल्ड स्पॉट खरीदकर मेहमानों को पिलाया। यह किस्सा बताता है कि नाना के लिए रिश्तों की नींव पैसे के ढेर पर नहीं, बल्कि साझा सपनों और समर्पण पर टिकी होती है।
पुत्र और एक कलाकार का दर्द
नाना के जीवन का सबसे मार्मिक और कठिन दिन वह था जब उनके पिता का निधन हुआ। उसी दिन शाम को उनके नाटक के दो शो थे। एक सामान्य इंसान के लिए शो रद्द करना स्वाभाविक था। लेकिन नाना एक सामान्य इंसान नहीं थे। उन्होंने एक कलाकार की ज़िम्मेदारी निभाई। उन्होंने पिता की अंतिम यात्रा और मंच की ज़िम्मेदारी के बीच एक असंभव संतुलन बनाया। दो शो के बीच के समय में उन्होंने पिता का अंतिम संस्कार किया और वापस लौटकर नाटक पूरा किया। उनका कहना था, “मैं अपने आँसू कैमरे के सामने बेचता हूँ, असल ज़िंदगी में नहीं।” यह एक अभिनेता का नहीं, एक लोहे के इरादों वाले इंसान का स्टेटमेंट था।
अधूरा नहीं, अलग रहने वाला रिश्ता
ज़िंदगी ने उनकी परीक्षा ली। शादी के बाद दो बेटे हुए, लेकिन दुर्भाग्य से एक का निधन हो गया। आज नाना और नीलकांति साथ नहीं रहते, लेकिन उन्होंने कभी तलाक नहीं लिया। यह रिश्ता एक अजीबोगरीब खामोशी में साँस लेता है। यह टूटा नहीं, बल्कि दो स्वतंत्र आत्माओं के रूप में अलग-अलग रास्तों पर चलने का फैसला है। यह उनकी ज़िंदगी का एक ऐसा पन्ना है जो बिना किसी स्पष्टीकरण के, सिर्फ सम्मान के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए।
राजेश खन्ना की याद और एक चेतावनी
नाना मानते हैं कि चमकता स्टारडम एक दिन ढल जाता है और अभिनेता अक्सर अकेला रह जाता है। वो राजेश खन्ना का उदाहरण देते हैं, जिनकी शोहरत की चमक के पीछे का अकेलापन बहुत कम लोग समझ पाए। नाना कहते हैं, एक अभिनेता इतना अपने किरदारों में रम जाता है कि अपनी असल ज़िंदगी को भूलने लगता है। और जब होश आता है, तब तक मंच की रोशनी बुझ चुकी होती है, दर्शकों की तालियाँ खामोश हो चुकी होती हैं।
तन्हाई का साथी
नाना का रिश्ता समुद्र से बहुत गहरा है। गोवा में समंदर किनारे बैठकर वो कविताएँ लिखते हैं। यही वो जगह है जहाँ वो खुद से रूबरू होते हैं। उनके मशहूर डायलॉग, जैसे “एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है”, उनकी खुद की लेखनी की देन हैं। वो कहते हैं कि उनके घर में अगर छह लोग हैं, तो वो हैं — चार दीवारें, एक छत और वो खुद। यही उनकी दुनिया है, यही उनका सुकून।
गुस्सा नहीं, ईमानदारी का विद्रोह
सेट पर नाना के गुस्से के किस्से मशहूर हैं। डायरेक्टरों से बहस, अपने किरदार को लेकर अड़ जाना — यह सब उनकी छवि का हिस्सा है। लेकिन यह गुस्सा नहीं, बल्कि काम के प्रति एक जुनून और ईमानदारी है। वो समझौता नहीं करते। चाहे इसकी कीमत कुछ भी हो। उनके और निर्देशक अनीस बज्मी के विवाद इसी सिद्धांत की लड़ाई थे। वो मानते हैं कि ईमानदारी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
दोस्ती में अमीर, ज़िंदगी में सादगी
नाना पाटेकर कहते हैं, वो पैसे से नहीं, दोस्तों से अमीर हैं। उनके पुराने दोस्त आज भी उनके साथ हैं। दोस्त की मदद के लिए उन्होंने अपना घर तक गिरवी रख दिया था। मुंबई की चकाचौंध उन्हें कभी भाती नहीं रही। उनका दिल हमेशा गाँव की मिट्टी, खेतों की हरियाली और समंदर की लहरों में बसता है। यही उनकी असली दुनिया है।
नाना पाटेकर के बारे में रोचक तथ्य
- सम्मान: उन्हें फिल्म ‘प्रहार’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और साल 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
- यादगार फिल्में: ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘थानेदार’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अपहरण’, ‘गंगाजल’, ‘अभिमन्यु’, ‘राजू चाचा’, ‘तिरंगा’।
- मराठी सिनेमा में योगदान: उन्होंने मराठी थिएटर और सिनेमा को भी समृद्ध किया है।
- आवाज़ का जादू: उनकी खास आवाज़ ने हर किरदार को एक अलग पहचान दी है।
निष्कर्ष
नाना पाटेकर की कहानी सिर्फ एक सफल अभिनेता की सफलता की दास्तान नहीं है। यह एक ऐसे इंसान की कहानी है जिसने हर मोड़ पर अपने सिद्धांतों, अपनी सादगी और अपनी ईमानदारी को सर्वोपरि रखा। उन्होंने सिखाया कि शोहरत की मार्केट में भी इंसानियत की कीमत कायम रह सकती है। उनकी ज़िंदगी के फैसले — चाहे वो 750 रुपये की शादी हो या पिता के निधन के दिन मंच पर डटे रहना — यह बताते हैं कि ज़िम्मेदारी और जुनून किसे कहते हैं।
वो पर्दे पर भले ही गुस्सैल नज़र आएँ, लेकिन असल ज़िंदगी में वो एक संवेदनशील कवि, एक वफादार दोस्त और एक जमीन से जुड़ा इंसान हैं। नाना पाटेकर सिर्फ एक नाम नहीं, एक ‘अटिट्यूड’ हैं। एक ऐसा अटिट्यूड जो कहता है — चाहे जो हो जाए, अपने सच के साथ खड़े रहो। और शायद यही वजह है कि 75 साल की उम्र में भी उनकी आवाज़ में वही धार, आँखों में वही आग और ज़िंदगी में वही सादगी कायम है। वो भीड़ से अलग अपनी राह पर चलते एक ऐसे सितारे हैं, जिसकी चमक कभी कम नहीं होगी।









