इटारसी। शहर के विस्तार और यातायात व्यवस्था को सुधारने के नाम पर पुराना बस स्टैंड बंद करने का फैसला अब प्रशासन के लिए गले की हड्डी बनता जा रहा है। स्टेशन और मुख्य बाजार से सटे इस स्टैंड के बंद होने से आम आदमी की जेब और समय दोनों पर भारी चोट पहुंची है। विशेषकर छात्र, मजदूर और बुजुर्ग यात्री इस नई व्यवस्था के चक्रव्यूह में फंसकर रह गए हैं।
व्यवस्था की वेदी पर आम आदमी की बलि क्यों?
प्रशासन को यह समझना होगा कि नियम जनता की सुविधा के लिए बनते हैं, जनता नियमों के बोझ तले दबने के लिए नहीं। इटारसी का यह जन-असंतोष एक चेतावनी है कि यदि विकास के पहिए आम आदमी की सांसों को रोकने लगें, तो उस पर पुनर्विचार की तत्काल आवश्यकता होती है। जब नीति और नियति में तालमेल न हो, तो सुधार भी सजा बन जाते हैं।
छात्रों और मजदूरों पर किराया कर
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष पंकज राठौर और प्रबुद्ध नागरिक मनीष जोशी ने इस निर्णय को जनविरोधी बताया है। ग्रामीण क्षेत्रों तरौंदा, सनखेड़ा, भीलाखेड़ी से आने वाले छात्र 10 रुपए किराया देकर इटारसी पहुंचते थे, लेकिन अब नए स्टैंड से शहर के भीतर आने के लिए उन्हें 30 रुपए तक ऑटो किराया देना पड़ रहा है। यह अतिरिक्त भार उनके मासिक बजट को बिगाड़ रहा है।
जनता के व्यावहारिक सुझाव, समाधान का रास्ता

- पिक एंड ड्रॉप : बानापुरा, सोनतलाई और ऑर्डिनेंस फैक्ट्री की बसों को पुराने स्टैंड तक आने की छूट मिले।
- अनिवार्य हॉल्ट : लंबी दूरी की बसें कम से कम 5 मिनट पुराने स्टैंड पर रुकें, विशेषकर रात 10 बजे के बाद।
- किराया नियंत्रण : ऑटो चालकों की मनमानी रोकने के लिए प्रशासन तत्काल रेट लिस्ट चस्पा करे।
- विकेंद्रीकरण : पूर्व सुधार न्यास अध्यक्ष अरविंद मालवीय के अनुसार, तीन बंगला तरफ की रेलवे भूमि नपा को मिले ताकि शहर का सही विस्तार हो सके।
व्यापार और सुरक्षा पर संकट
नया बस स्टैंड शहर से दूर होने के कारण रात के समय महिला यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। साथ ही, मुख्य बाजार से बस स्टैंड हटने के कारण व्यापारियों ने भी व्यापार मंदा होने की शिकायत की है। लोगों का कहना है कि प्रशासन नियमों में लचीलापन लाए ताकि शहर का विकास जनता की बर्बादी का कारण न बने।









