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राजश्री प्रोडक्शन: भारतीय सिनेमा का वो सदाबहार पेड़ जिसकी जड़ें हैं संस्कार

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अखिलेश शुक्ला

भारतीय सिनेमा के विशाल और चमकदार जंगल में जहाँ एक तरफ एक्शन, थ्रिलर और विशेष EFFECTS वाली फिल्मों का बोलबाला है, वहीं एक कोना ऐसा भी है जहाँ शांति, सद्भाव, पारिवारिक मूल्य और अटूट विश्वास का एक सदाबहार पेड़ खड़ा है। इस पेड़ की शाखाएं पीढ़ियों तक फैली हैं, इसकी जड़ें इतनी मजबूत हैं कि हर बदलते दौर का सामना करके भी यह हरा-भरा है। इस पेड़ का नाम है ‘राजश्री प्रोडक्शन’ और इसकी मजबूत जड़ों में से एक हैं ताराचंद बड़जात्या। एक ऐसा नाम जो परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सुनहरा सेतु बना हुआ है।

एक सपना और एक सिनेमाघर

राजश्री की कहानी सिनेमा से नहीं, बल्कि एक सिनेमाघर से शुरू होती है। साल 1948 की बात है। देश आज़ाद हुआ ही था। ताराचंद बड़जात्या के पिता, ताराचंद बड़जात्या सीनियर, एक व्यवसायी थे। उन्होंने राजस्थान के भीलवाड़ा में ‘राजश्री सिनेमा’ नाम से एक थियेटर खरीदा। यही नाम आगे चलकर भारतीय सिनेमा की एक अमिट पहचान बन गया। थियेटर चलाने के दौरान ही फिल्मों के प्रति गहरा लगाव और दर्शकों की पसंद को समझने की समझ विकसित हुई। 15 अगस्त, 1962 को श्री ताराचंद बड़जात्या सीनियर और उनके बेटे ताराचंद बड़जात्या (जो उस समय महज 16-17 साल के थे) ने मिलकर राजश्री प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की। उनका मकसद साफ था, ऐसी फिल्में बनाना जो पारिवारिक मूल्यों को केंद्र में रखते हुए मनोरंजन कर सकें।

राजश्री की पहली फिल्म थी 1963 में आई ‘आरती’। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की और राजश्री के सफर की शुरुआत कर दी।

विरासत के संरक्षक और विस्तारक

ताराचंद बड़जात्या (जन्म: 1945) ने बचपन से ही फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं। वह सच्चे अर्थों में एक ‘फिल्ममेकर’ थे, जो फिल्म के हर पहलू – कहानी, कास्टिंग, संगीत, मार्केटिंग से लेकर वितरण तक पर गहरी नजर रखते थे। उनके नेतृत्व में राजश्री ने 70 और 80 का दशक छा लिया। उनकी खासियत यह थी कि उन्होंने कभी भी फिल्मों को सिर्फ एक ‘प्रोडक्ट’ नहीं माना। वह इसे एक ‘संदेश’ और ‘पारिवारिक अनुभव’ के तौर पर देखते थे। उनकी इसी सोच ने राजश्री को एक ‘ब्रांड’ बना दिया।

दर्शकों को विश्वास था कि राजश्री की फिल्म देखकर आएंगे तो उन्हें अच्छा, साफ-सुथरा और दिल को छू लेने वाला मनोरंजन मिलेगा।सुनहरे दौर की अमर फिल्में और बॉक्स ऑफिस सफलताताराचंद जी के नेतृत्व में राजश्री ने भारतीय सिनेमा को कुछ ऐसी कालजयी फिल्में दीं, जो आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।

प्रमुख फिल्मों का विवरण

  • दोस्ती (1964): दो अलग-अलग धर्मों के बच्चों की दोस्ती पर आधारित इस फिल्म ने फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवॉर्ड जीता। इसने सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया।
  • उपहार (1971): यह फिल्म वर्ष 1971 में रिलीज हुई। इसमें स्वरूप दत्त, कामिनी कौशल और जया भादुड़ी नजर आईं। इस फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के तहत 45वें अकादमी पुरस्कारों में प्रवेश किया, लेकिन दुर्भाग्य से इसे नहीं चुना गया।
  • चितचोर (1976): बच्चों के बीच की दोस्ती और उनके सपनों की इस मासूम कहानी को आज तक याद किया जाता है। इसके गाने आज भी लोकप्रिय हैं।
  • अंखियों के झरोखों से, (1978): यह भी राजश्री की सफल और प्रशंसित फिल्मों में से एक है, जिसने दर्शकों के बीच खासी पहचान बनाई।
  • नदिया के पार (1982): यह फिल्म राजश्री की एक क्लासिक फिल्म है, जिसमें सचिन मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म को अपने समय में काफी पसंद किया गया था और इसके गाने आज भी याद किए जाते हैं।
  • सारांश (1984): यह 1984 में आई हिंदी ड्रामा फिल्म है। इसका निर्देशन महेश भट्ट ने किया। इस फिल्म में अनुपम खेर और रोहिणी हट्टंगड़ी, मदन जैन, निलू फूले, सुहास भालेकर और सोनी राजदान ने मुख्य भूमिका निभाई। यह फिल्म एक ऐसे मराठी जोड़े के जीवन पर आधारित है, जिसे न्यूयॉर्क में अपने इकलौते बेटे की मौत के बारे में पता चलता है। इस फिल्म के जरिए अनुपम खेर ने स्क्रीन डेब्यू किया।
  • मैंने प्यार किया (1989): यह फिल्म राजश्री की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है और इसने एक नए युग की शुरुआत की। सलमान खान और भाग्यश्री की जोड़ी, सूरज बड़जात्या का निर्देशन और राम-लक्ष्मण का संगीत। इस फिल्म ने रोमांस की नई परिभाषा लिखी और ‘दिल दीवाना..’, ‘कबूतर जा जा…’ जैसे गाने अमर हो गए।

आधुनिक दौर की फिल्में और निरंतर सफलता

  • ताराचंद बड़जात्या के बाद उनके बेटे सूरज बड़जात्या ने राजश्री की कमान संभाली और नए जमाने के साथ कदम मिलाकर चलते हुए भी संस्कारों की धारा को बहते रखा।हम आपके हैं कौन..! (1994): यह फिल्म एक सांस्कृतिक परिघटना बन गई। इसने 100 करोड़ का आंकड़ा पार किया और उस समय की सबसे बड़ी हिट साबित हुई। माधुरी दीक्षित और सलमान खान की जोड़ी, यादगार संगीत और एक भव्य पारिवारिक कहानी ने इसे अमर बना दिया।
  • हम साथ-साथ हैं (1999): एक संयुक्त परिवार की चुनौतियों और उसके बिखराव और फिर से जुड़ने की इस कहानी ने दर्शकों का दिल जीत लिया। यह फिल्म भी एक बड़ी सफलता थी।
  • विवाह (2006): वर्ष 2006 में आई यह एक म्यूजिकल रोमांटिक फिल्म है। इस फिल्म में शाहिद कपूर और अमृता राव ने मुख्य भूमिका निभाई है। फिल्म में दोनों की जोड़ी की सगाई से लेकर शादी तक की यात्रा को खूबसूरती से दिखाया गया है। इस फिल्म को उस साल जबरदस्त सफलता मिली। यह इकलौती ऐसी फिल्म थी, जो सिनेमा के साथ-साथ इंटरनेट पर भी एक साथ रिलीज हुई।
  • बाबुल (2006): वर्ष 2006 में आई इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, सलमान खान, रानी मुखर्जी और जॉन अब्राहम ने मुख्य भूमिका अदा की। रवि चोपड़ा निर्देशित यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भले ही सफलता हासिल नहीं कर पाई, लेकिन दर्शकों ने इसे काफी पसंद किया।
  • प्रेम रतन धन पायो (2015): यह फिल्म 2015 में रिलीज हुई। इस फिल्म में सलमान खान और सोनम कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई है। इस फिल्म की कहानी एक राजघराने और उसके टूटे परिवार पर आधारित है। फिल्म का संगीत भी काफी पसंद किया गया और यह बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही।
  • ऊंचाई (2022): सूरज बड़जात्या द्वारा निर्देशित यह फिल्म राजश्री प्रोडक्शंस की नवीनतम फिल्मों में से एक है, जो आधुनिक परिवेश में पारिवारिक मूल्यों को दर्शाती है।

रोचक तथ्य और अनछुए पहलू

पारिवारिक सूत्र: राजश्री प्रोडक्शन एक पारिवारिक व्यवसाय की तरह चलता आया है। ताराचंद जी के बेटे, सूरज बड़जात्या, आज इसकी कमान संभाल रहे हैं।

नए कलाकारों की खोज: राजश्री ने हमेशा नए चेहरों को मौका देने पर जोर दिया। आलोक नाथ, मोहनिश बहल, भाग्यश्री, माधुरी दीक्षित (हम आपके हैं कौन..! उनकी पहली बड़ी हिट थी) जैसे कलाकारों के करियर को शुरुआती बुलंदियां दीं।

संगीत की धुन: राजश्री की फिल्मों की एक पहचान उनका यादगार संगीत भी रहा है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और राम-लक्ष्मण जैसे संगीतकारों ने यहाँ ऐसे गाने दिए जो कई पीढ़ियों तक गुनगुनाए जाते हैं।

हैप्पी एंडिंग” का राजा: एक जमाने में राजश्री की फिल्मों की पहचान उनकी ‘हैप्पी एंडिंग’ से थी। दर्शक जानते थे कि फिल्म का अंत अच्छा ही होगा, फिर भी वे पूरी कहानी का आनंद लेते थे।

बदलते दौर में राजश्री की प्रासंगिकता

90 के दशक के अंत और 2000 के बाद से भारतीय सिनेमा का स्वरूप बदला। यथार्थवादी, एंग्री यंग मैन और नए जमाने की रोमांटिक फिल्मों का दौर आया। ऐसे में राजश्री की ‘आदर्शवादी’ ‘परिवार वादी’ फिल्मों पर सवाल उठने लगे। लेकिन ताराचंद बड़जात्या और उनके परिवार ने कभी भी अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया

।उन्होंने नए जमाने के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश की, लेकिन अपनी पहचान नहीं छोड़ी। ‘हम आपके हैं कौन..!’ और ‘हम साथ-साथ हैं…’ जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया कि अगर कंटेंट मजबूत हो तो पारिवारिक मूल्यों वाली फिल्में भी सुपर-डुपर हिट हो सकती हैं। आज भी टीवी पर इन फिल्मों की लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि भारतीय दर्शक अब भी अच्छी कहानियों को पसंद करते हैं।

निष्कर्ष

ताराचंद बड़जात्या जी सिर्फ एक फिल्म निर्माता नहीं थे, वे एक विचार, एक दर्शन और एक संस्कृति के संरक्षक थे। उन्होंने दिखाया कि सिनेमा सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि समाज को दिशा देने का एक शक्तिशाली माध्यम भी है। उनकी विरासत आज उनके बेटे सूरज बड़जात्या और पोते-पोतियों के जरिए आगे बढ़ रही है, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म के जमाने में भी राजश्री के ‘कल्याण’ के सिद्धांत को बनाए हुए हैं।

राजश्री प्रोडक्शन भारतीय सिनेमा का वो ध्रुवतारा है जो हमेशा से अपनी चमक बिखेरता रहा है और आगे भी बिखेरता रहेगा। ताराचंद बड़जात्या जी का यह मानना था कि “जीवन में सबसे ज़रूरी चीज़ है रिश्ते” और उनकी हर फिल्म इसी सच्चाई को बड़े पर्दे पर उकेरती नजर आती है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत और सबक है, न सिर्फ सिनेमा के लिए, बल्कि जिंदगी के लिए भी।

  • अखिलेश शुक्ला, सेवा निवृत्त प्राचार्य, लेखक ब्लॉगर

Rohit Nage

Rohit Nage has 30 years' experience in the field of journalism. He has vast experience of writing articles, news story, sports news, political news.

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